भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १००७
सुषवीपत्रपत्तूरकर्णमोटकुठारके ।
पृथगेते प्रलेपेन गम्भीरव्रणरोपणाः ॥ २० ॥
करेलेके पत्ते, शान्तिशाकके पत्ते, बबूरके पत्ते, वनतुलसीके पत्ते इनमेंसे किसी एकको बारीक पीसकर लेप करनेसे अत्यन्त गम्भीर व्रण शीघ्र भरते हैं ॥ २० ॥
लौहकुद्दालके घृष्ट्वा लिम्पाकफलवारिणा ।
श्वेतार्कसम्भवं मूलं लेपं दद्यात्क्षतोपरि ॥
अपि योगशतासाध्यं क्षतं हन्ति न संशयः ॥ २१ ॥
सफेद आककी जडको लिम्पाकफल (एक प्रकारका नींबू) के रससे लोहेके हमामदस्तेमें खरल करके व्रणपर लेप करे । यह औषधि सैकड़ों प्रयोगोंके करनेसे भी सिद्ध न होनेवाले व्रणको निस्सन्देह दूर करती है ॥ २१ ॥
श्वेतकरवीरमूलस्वरसं द्विपलोन्मितम् ।
पलाष्टकमितं गव्यक्षीरमेकत्र मिश्रयेत् ॥ २२ ॥
दधि कृत्वा तदावर्त्त्य निर्मथ्य नवनीतकम् ।
गृहीत्वा तेन लेपेन क्षतं हन्ति चिरोत्थितम् ॥ २३ ॥
सफेद कनेरकी जडका रस ८ तोले और गौका दूध ३२ तोले लेकर एकत्र मिलाकर दही जमादेवे । फिर उस दहीको मथकर नौनी घी निकाले । उस घृतका लेप करनेसे बहुत दिनोंका पुराना घाव शीघ्र नष्ट होता है ॥ २२ ॥ २३ ॥
त्रिफला-गुग्गुलु ।
ये क्लेदपाकस्स्रुतिगन्धवन्तो व्रणाश्चिरोत्थाः सरुजःसशोथाः ।
प्रयान्ति ते गुग्गुलुमिश्रितेन पीतेन शान्तिं त्रिफलारसेन २४
जो बहुत पुराने, पीडायुक्त, सूजनवाले व्रण हों और जिनमें पाक क्लेदयुक्त (अर्थात् गीला) हो, स्राव होय तथा दुर्गन्ध आती हो ऐसे व्रण, शुद्ध गूगल मिले हुए त्रिफलेका रस पीनेसे शीघ्र नष्ट होते हैं ॥ २४ ॥
तिलाष्टक ।
तिलकल्कः सलवणो द्वे हरिद्रे त्रिवृद्धृतम् ।
मधुकं निम्बपत्राणि लेपः स्याद्व्रणशोधनः ॥ २५ ॥
काले तिल, सेंधानमक, हल्दी, दारुहल्दी, निसोत, मुलहठी और नीमके पत्ते इन सबको समान भाग लेवे, फिर एकत्र बारीक पीसकर घृतमें मिलाकर लेप करनेसे व्रण शुद्ध होता है ॥ २५ ॥