भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १००९

बृहज्जात्याद्यतैल ।

जातीनिम्बपटोलानां नक्तमालस्य पल्लवाः ।
सिक्थकं मधुकं कुष्ठं द्वे निशे कटुरोहिणी ॥ २९ ॥
मञ्जिष्ठा पद्मकं लोध्रमभया पद्मकेशरम् ।
तुत्थकं शारिवा बीजं नक्तमालस्य दापयेत् ॥ ३० ॥
एतानि समभागानि पिष्ट्वा तैलं विपाचयेत् ॥ ३१ ॥

चमेलीके पत्ते, नीमके पत्ते, परवल, करञ्जके पत्ते, मोम, मुलहठी, कूट, हल्दी, दारुहल्दी, कुटकी, मंजीठ, पद्माख, लोध, हरड, कमलकेशर, नीलाथोथा, अनन्त-मूल और करञ्जके बीज इन सबोंको समान भाग लेकर एकत्र कूटपीस लेवे । फिर इस कल्क और एक सेर तिलके तेलको मिलाकर विधिपूर्वक पकावे ॥ २९-३१ ॥

दद्रुवीसर्परोगेषु कीटरोगेषु सर्वशः ।
विषव्रणे समुत्पन्ने कुष्ठरोगेषु सर्वशः ॥
सद्यः शस्त्रप्रहारेषु दंष्ट्राविद्धेषु चैव हि ॥ ३२ ॥
नखदन्तक्षते देहे दुष्टमांसापकर्षणम् ।
म्रक्षणार्थमिदं तैलं हितं शोधनरोपणम् ॥ ३३ ॥

इस तेलको दाह, बिसर्प, सर्व प्रकारके कृमिरोग, विषयुक्त व्रण, सम्पूर्ण कुष्ठरोग तत्काल शस्त्रसे किये हुए व्रण, दाढ, दाँत, और नखोंसे विद्ध हुए व्रण और भयङ्कर स्फोटकादिके व्रणोंमें लेप करे । यह बिगडे हुए मांसादि समस्त क्षतोंको शुद्ध करके शीघ्र भरदेता है ॥ ३२ ॥ ३३ ॥

गौराद्यघृत और तैल ।

गौरा हरिद्रा मञ्जिष्ठा मांसी मधुकमेव च ।
प्रपौण्डरीकं हीबेरं भद्रमुस्तं सचन्दनम् ॥
जातीनिम्बपटोलं च करञ्जं कटुरोहिणी ॥ ३४ ॥
मधूच्छिष्टं समधुकं महामेदा तथैव च ॥
पञ्चवल्कलतोयेन घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ३५ ॥

बड, गूलर, पीपल, पिलखन और बेंत इन सबोंकी छालको सम भाग लेकर ३२ सेर जलमें पकावे । पकते २ जब ८ सेर जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे । फिर इस क्वाथमें एक प्रस्थ घी अथवा तेल तथा हल्दी, दारुहल्दी, मंजीठ,

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