भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 1042
१०१०भैषज्यरत्नावली ।[ व्रणशोथ-

जटामांसी, मुलहठी, पौंडा, सुगंधवाला, नागरमोथा, लालचंदन, चमेलीके पत्ते, नीमके पत्ते, परवल, बडी करञ्जके बीज, कुटकी, मोम, महुआ और महामेदा इन औषधियोंके समान भाग मिले हुए कल्कको डालकर यथाविधि पाक करे। जब अच्छे प्रकार पकजाय तब उतारकर उत्तम पात्रमें रखदेवे ॥ ३४ ॥ ३५ ॥

एष गौरो महायोगः सर्वव्रणविशोधनः ॥ ३६ ॥
आगन्तुसहजांश्चैव सुचिरोत्थांश्च ये व्रणाः ।
विषमामपि नाडीं तु शोधयेच्छीघ्रमेव च ।
गौराद्यं जातिकाद्यं च तैलमेवं प्रसाध्यति ।
तैलं सूक्ष्मानने दुष्टे व्रणे गम्भीर एव च ॥ ३८ ॥

यह गौराद्यनामक घृत अथवा तेल सर्व प्रकारके व्रणोंको सुखानेवाला है। आगन्तुक, सहज और बहुत पुराने घाव और विषम नाडीव्रणको बहुत शीघ्र शुद्ध करता है। ये गौराद्य और जातिकाद्य तेल छोटे मुखवाले, अत्यन्त बिगडे हुए और गंभीर व्रणपर लगानेसे शीघ्र उपकार होता है ॥ ३६-३८ ॥

विपरीतमल्लतैल।

सिन्दुरकुष्ठविषहिङ्गुरसोनचित्रबाणांघ्रिलाङ्गलिककल्क-
पक्वसैलम् । प्रासादमन्त्रयुतफूत्कृतलूनफेनं क्लिन्नव्रण-
प्रशमने विपरीतमल्लः ॥ ३९ ॥ खड्गाभिघातगुरुगण्ड-
महोपदंशनाडीव्रणक्षतविचर्चिककुष्ठपामाः । एतान्नि-
हन्ति विपरीतक मल्लनाम तैलं यथेष्टशयनासनभोजनस्य ॥

सिन्दूर, कूठ, शुद्ध मीठातेलिया, हींग, लहसन, लाल चीता, शरफोंकेकी जड और कालिहारीकी जड इन सब औषधियोंके समान भाग मिश्रित कल्कके साथ एक सेर तिलके तेलको ८ सेर जलमें पकावे। पकाते समय इस (ओं ह्राँ ह्रीँ हूँ ह्रौं शिवाय स्वाहा) प्रासाद मंत्रको पढता जावे। यदि पकते हुए तेलमें झाग आवें तो उनको फूँकसे मिटादेवे। जब तेल यथाविधि पककर सिद्ध होजाय तब उत्तम पात्रमें करके रखदेवे। इस तेलको मलनेसे क्लिन्न (ग्लानि) युक्त व्रण शमन होता है। एवं तलवारका घाव, दारुण गण्डरोग, भयङ्कर उपदंश, नाडीव्रण, क्षत, विचर्चिका, कोढ, खुजली आदि रोगोंको यह तेल शीघ्र नष्ट करता है। इसको विपरीतमल्लतैल कहते हैं। इसपर यथेच्छ खान पान और शयनादि कार्य करने चाहिये ॥ ३९ ॥ ४० ॥