भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1044

१०१२ भैषज्यरत्नावली । [ व्रणशोथ-

हल्दी, गेरू और राई इन औषधियोंका चूर्ण एक एक तोला एवं छः माशे पारेकी कज्जली बनाकर उक्त गरम तेलमें मिलादेवे । इस तेलको गरम करके लेप करे । यह तेल खुजली, विचर्चिका, पामा, क्लेदयुक्त व्रण, कठिनतर कुष्ठ, वातरक्त, सर्व प्रकारके व्रण, बडे बडे फोडे, शीतलाके व्रण, दाद और अत्यन्त बढा हुआ सफेद कोढ प्रभृति रोगोंको तत्काल ध्वंस करता है । इसका नाम वृहद्व्रणराक्षस तेल है ॥ ४४-४८ ॥

विडङ्गारिष्ट ।

विडङ्गं ग्रन्थिकं रास्ना कुटजत्वक् फलानि च ।
पाठैलावालुकं धात्री भागान्पञ्चपलान्पृथक् ॥ ४९ ॥
अष्टद्रोणेऽम्भसः पक्त्वा कुर्याद् द्रोणावशेषितम् ।
पूते शीते क्षिपेत्तत्र क्षौद्रं पलशतत्रयम् ॥ ५० ॥
धातकीं विंशतिपलं त्रिजातं द्विपलं तथा ।
प्रियङ्गुकाञ्चनागाणां सलोध्राणां पलं पलम् ॥ ५१ ॥
व्योषस्य च पलान्यष्टौ चूर्णीकृत्य प्रदापयेत् ।
घृतभाण्डे विनिक्षिप्य मासमेकं विधारयेत् ॥ ५२ ॥

वायविडङ्ग, पीपलामूल, रास्ना, कुडेकी छाल और फूल, पाठ, एलुआ और आँवले ये प्रत्येक औषधि बीस तोले लेकर आठ द्रोण जलमें पकावे । पकते पकते जब एक द्रोण जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर शीतल हो जानेपर उसमें शहद तीन सौ पल, धायके फूल २० पल, इलायची, तेजपात, दारचीनी इनका चूर्ण ८ तोले, फूलप्रियंगु, कचनार, लोध प्रत्येक चार चार तोले, सोंठ, मिरच और पीपल इनका चूर्ण ८ पल लेवे और सबोंको एकत्र बारीक कूटपीसकर डाल-देवे । पश्चात् घीके चिकने उत्तम पात्रमें भरकर धानोंकी राशिमें गाडदेवे । और एक महीनेतक इसी प्रकार रखा रहनेदेवे ॥ ४९-५२ ॥

ततः पिबेद्यथार्हं तु जयेद्विद्रधिमुत्थितम् ।
ऊरुस्तम्भाश्मरीमेहान् प्रत्यष्ठीलाभगन्दरान् ॥
गण्डमालां हनुस्तम्भं विडङ्गारिष्टसंज्ञकः ॥ ५३ ॥

एक मासानन्तर उसको निकालकर प्रतिदिन उचित मात्रासे सेवन करे तो यह विडङ्गनामक अरिष्ट विद्रधि, ऊरुस्तम्भ, पथरी, प्रमेह, प्रत्यष्ठीला, भगन्दर, गण्डमाला व्रण और हनुस्तम्भादि विकारोंको शीघ्र दूर करता है ॥ ५३ ॥