भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1046
१०१४भैषज्यरत्नावली ।[ व्रणशोथ-

व्रणरोगमें अपथ्य ।

नवानि धान्यानि तिलान्कलायान्माषान्कुलत्थान्कृश-
रान् हिमाम्भः । क्षीरेक्षुजातानिवविधान्विकारान्मद्यानि
शाकानि च पत्रवन्ति ॥६१॥ अजाङ्गलं मांसमसात्म्य-
मन्नं विदाहि विष्टम्भि गुरूणि चापि। कट्वम्लशीतं
लवणं व्यवायमायासमूच्चैः परिभाषणं च ॥ ६२ ॥
प्रियासमालोकनमह्नि निद्रां प्रजागरं चंक्रमणं निता-
न्तम् । सदास्थितिं प्रागधिरोपणं च नस्यानि ताम्बूल-
मजीर्णतां च ॥ ६३ ॥ प्रचण्डवातातपधूमवृष्टिरजोभय-
क्रोधवमिप्रहर्षान् । शोकं विरुद्धाशनमम्बुपानं तीक्ष्णो-
ष्णरूक्षाणि विघट्टनं च ॥६४॥ कण्डूयनं काष्ठनखादि-
तोदं निरन्नभावं विषमोपचारम् । वैद्यश्चिकित्सन्
व्रणशोथरोगं व्रणं च सद्योव्रणमामयं च ॥ नाडीव्रणं
चापि यशोऽभिलाषी विवर्जयेत्सन्ततमप्रमत्तः ॥६५॥

सब प्रकारके नये अन्न, तिल, मटर, उड़द, कुलथी, खिचडी, शीतल जल, भाँतिभाँतिके दूधके बने अथवा ईखके रसके बने पदार्थ, मदिरा, पत्तोंवाले शाक, जङ्गलभिन्न अन्यान्यदेशीय जीवोंका मांस, असात्म्य अन्न, दाहकारक, विष्टम्भकारक, गुरुपाकी; कडवे, खट्टे, शीतल और लवण ( नमकीन, चरपरे ) खाद्य पदार्थ, मैथुन, कसरत करना, जोरसे बोलना, सुन्दरी स्त्रियोंको देखना, दिनमें शयन, रात्रिमें जागरण और हरवक्त टहलना, फोडे फुन्सीको सर्वदा बैठालनेका प्रयत्न करना, व्रणको शुद्ध किये विना ही घावको भरनेवाली औषधि लगाना, नस्य लेना, पान खाना, अजीर्णकारक द्रव्योंका भक्षण, अत्यंत तीक्ष्ण वायु और तीव्रधूपका सेवन, धूम्रपान, वर्षाका जल, धूलि, भय, क्रोध, वमन, अत्यन्त हर्ष, शोक, अपने स्वभावके प्रतिकूल खान पान, तीखे, गरम, रूखे और पिसेहुए द्रव्योंका सेवन, लकडीसे अथवा नाखूनोंसे खुजलाना, लंघन और वैषम्य चिकित्सा करना इन सब अहितकर पदार्थों व क्रियाओंको व्रणशोथ, व्रणरोग, सद्योव्रण और नाडीव्रणादिरोगोंकी चिकित्सा करताहुआ यशको चाहनेवाला वैद्य तत्काल त्यागदेवे ॥ ६१–६५ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां व्रणशोथचिकित्सा ॥