भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०१५

सद्योव्रणकी चिकित्सा ।


सद्यःक्षतव्रणं वैद्यः सशूलं परिषेचयेत् ।
यष्टीमधुकयुक्तेन किञ्चिदुष्णेन सर्पिषा ॥ १ ॥
सद्यःक्षत अर्थात् तत्कालके उत्पन्नहुए शूलसहित व्रणमें मुलहठीका चूर्ण मिला-
कर मन्दोष्ण घृतसे सेचन करे ॥ १ ॥

अपामार्गस्य संसिक्तं पत्रोत्थेन रसेन तु ।
सद्योव्रणेषु रक्तं तु प्रवृत्तं परितिष्ठति ॥ २ ॥
सद्योव्रणमें चिरचिटेके पत्तोंका रस सिंचन करनेसे लोहू बहना बन्द होता है॥२॥

कर्पूरपूरितं बद्धं सघृतं संप्ररोहति ।
सद्यःशस्त्रक्षतं पुंसां व्यथापाकविवर्जितम् ॥ ३ ॥
तत्काल शस्त्रादिके लगनेसे उत्पन्नहुए व्रणमें सौबार धोयेहुए घृतके साथ कपूर
मिलाकर भरदेवे और उसको बाँधदेवे तो इससे विशेष पीडा नहीं होती और घाव
पकता नहीं है ॥ ३ ॥

शुनो जिह्वाकृतश्चूर्णः सद्यःक्षतविरोेहणः ॥ ४ ॥
कुत्तेकी जीभको सुखाकर चूर्ण बनालेवे, उस चूर्णको भरनेसे सद्योव्रण भर
जाता है ॥ ४ ॥

इतिसाप्ताहिकं कार्यः सद्योव्रणहितो विधिः ।
साप्ताहात्परतः कुर्याच्छारीरव्रणवत्क्रियाः ॥ ५ ॥
तत्कालजनित घावमें जो चिकित्साविधि कही गई है वे सब एक सप्ताहपर्यन्त
करे । तदनन्तर शारीरिकव्रणकी समान चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ५ ॥

अग्निदग्धव्रणकी चिकित्सा ।

पित्तविद्रधिवीसर्पशमनं लेपनादिकम् ।
अग्निदग्धव्रणे सम्यक् प्रयुञ्जीत चिकित्सकः ॥ ६ ॥
पित्तज विद्रधि और पित्तज विसर्प रोगनाशक प्रलेपादिकोंको अग्निसे जलेहुए
व्रणपर यथाविधि प्रयुक्त करे ॥ ६ ॥

तिलं चैवाग्निना दग्धं यवभस्मसमन्वितम् ।
अग्निदग्धव्रणं नश्येदनेनैवानुलेपनात् ॥ ७ ॥