भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1048, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1048

१०१६ भैषज्यरत्नावली । [ सद्योव्रण-

तिलोंकी भस्म और जौकी भस्म इन दोनोंको एकत्र मिलाकर लेप करनेसे अग्निद्वारा जलाहुआ व्रण सूख जाता है ॥ ७ ॥

तिलतैलैर्यवान्दग्ध्वा समं कृत्वा तु लेपयेत् ।
तेनैव लेपनादाशु वह्निदग्धः सुखी भवेत् ॥ ८ ॥

जौकी भस्म और तिलका तेल इन दोनोंके समान भागको एकत्र मिलाकर प्रलेप करनेसे अग्निसे जलाहुआ व्यक्ति शीघ्र आरोग्य होता है ॥ ८ ॥

सद्योदग्धं च मधुना लेपं कृत्वा भिषग्वरः ।
तत्पृष्ठे यवचूर्णेन लेपः स्याद्दाहशान्तये ॥ ९ ॥

जलेहुए व्रणपर तत्काल शहदका लेप करके ऊपरसे जौका चूर्ण बुरका देवे, इससे व्रणकी जलन दूर होती है ॥ ९ ॥

महिषीनवनीतेन क्षीरेण पेषयेत्तिलम् ।
तेन लेपेन दग्धाङ्गः सदाहं सुखमश्नुते ॥ १० ॥

तिलोंको भैंसके दूधमें पीसकर और भैंसके ही नैनीघीमें मिलाकर लेप करनेसे जलेहुए अङ्गकी दाह दूर होकर रोगी शीघ्र सुखभोग करता है ॥ १० ॥

महाराष्ट्रीजटालेपाद्दग्धपिष्टावचूर्णनम् ।
जीर्णगेहतृणाच्चूर्णं दग्धव्रणहरं परम् ॥ ११ ॥

जलपीपलकी जडको अथवा जलपीपलकी भुनीहुई पिष्टीके चूर्णको किंवा घरके पुराने फूसकी भस्मको पीसकर लगानेसे अग्निदग्धक्षत तत्काल भरजाता है ॥ ११ ॥

कालीयफलताम्रास्थिहेमकालारसोत्तमैः ।
लेपः सगोमयरसः सवर्णीकरणः परः ॥ १२ ॥
चतुष्पदां हि लोमत्वक्खुरशृङ्गास्थिभस्मना ।
तैलाक्ता लेपिता भूमिर्भवेद्रोमवती पुनः ॥ १३ ॥

पीलाचन्दन, फूलप्रियंगु, आमकी गुठली, नागकेशर और मंजीठ इन औषधियोंके समान भाग मिश्रित रसोंमें गौके गोबरका रस मिलाकर लेप करनेसे घावके सूखजानेपर उसकी त्वचा समानवर्णवाली होजाती है । चौपाये जानवरोंके रोम, खाल, खुर, सींग और हड्डी इन सबोंकी भस्मोंको तिलके तेलमें मिलाकर मलनेसे शुष्कहुए व्रणके स्थानमें रोम उत्पन्न होते हैं । यदि इन पूर्वोक्त भस्मोंको यथाविधि लेप करे तो भूमिमें भी रोम उत्पन्न होजाते हैं; फिर घावकी कौन कहे ॥ १२ ॥ १३ ॥