भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०१९


न्यग्रोधादिगणकी औषधियोंके क्वाथको शीतल करके भग्नस्थानपर सेचन करे । भग्नस्थानमें पीडा होनेपर पञ्चमूलके काढेमें दूधको पकाकर शीतल करके सेचन करें और सुहाते सुहाते तेलकी मालिश कर सेंके । एवं मांस, मांसका रस, घी, दूध और मटरका यूष आदि बृंहण पदार्थ रोगीको भोजन करावे ॥ ५ ॥ ६ ॥

गृष्टिक्षीरं ससर्पिष्कं मधुरौषधसाधितम् ।
शीतलं लाक्षया युक्तं प्रातर्भग्नः पिबेन्नरः ॥ ७ ॥
सघृतेनास्थिसंहारं लाक्षागोधूममर्जुनम् ।
सन्धियुक्तेऽस्थिभग्ने च पिबेत्क्षीरेण मानवः ॥ ८ ॥

भग्नरोगी काकोल्यादिगणोक्त औषधियोंके साथ एकवारकी ब्याईहुई गौका दूध और घी मिलाकर सिद्ध कियाहुआ शीतल दूध अथवा लाखके चूर्णके साथ गौका घी मिलाकर प्रतिदिन प्रातःकाल पान करे । यदि सन्धिस्थानकी हड्डी टूटगई हो तो हडसंहारी, लाख, गेहूँ और अर्जुनवृक्षकी छालको समान भाग पीसकर घी और दूधमें मिलाकर पान करना चाहिये ॥ ७ ॥ ८ ॥

रसोनमधुलाक्षाज्यसिताकल्कं समश्नुताम् ।
छिन्नभिन्नच्युतास्थ्नां च सन्धानमचिराद्भवेत् ॥ ९ ॥

लहसन शहद, लाख, घृत, और मिश्री इनके समान भाग कल्कको एकत्र कर भक्षण करनेसे कटी, टूटी व अपनेस्थानसे हटीहुई हड्डियाँ जुड जाती हैं ॥ ९ ॥

पीतवाराटिकाचूर्णं द्विगुञ्जं वा त्रिगुञ्जकम् ॥
अपक्वक्षीरपीतं स्यादस्थिभग्नप्ररोहणम् ॥ १० ॥

पीलीकौडीकी भस्मके दो या तीन रत्ती चूर्णको कच्चे दूधके साथ मिलाकर पीनेसे टूटीहुई हड्डी जुडती है ॥ १० ॥

क्षीरं सलाक्षामधुकं ससर्पिः स्याज्जीवनीयं च सुखावहं च ।
भग्नः पिबेत्त्वक्पयसाऽर्जुनस्य गोधूमचूर्णं सघृतेन वाथ ॥ ११ ॥

दूध, लाख, मुलहठी, घी और जीवनीयगणकी औषधियाँ इन सबोंको एकत्र पकाकर सुखोष्ण पान करनेसे अथवा अर्जुनवृक्षकी छालके चूर्णको दूधके साथ पीनेसे किंवा गेहूँके आटेको घीमें मिलाकर सेवन करनेसे भग्नरोगी शीघ्र आरोग्य होता है ॥ ११ ॥

सव्रणस्य तु भग्नस्य व्रणं सर्पिर्मधूत्तरैः ।
प्रतिसार्य कषायैश्च शेषं भग्नवदाचरेत् ॥ १२ ॥