भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०२० भैषज्यरत्नावली । [ भग्न-
भग्नं नैति यथा पाकं प्रयतेत तथा भिषक् ।
वातव्याधिविनिर्दिष्टान् स्नेहानत्र प्रयोजयेत् ॥ १३ ॥
भग्नस्थानमें यदि व्रण होगया हो तो न्यग्रोधादिगणकी औषधोंके काढे या कल्कमें घी और शहद मिलाकर लेप करे, पश्चात् भग्नरोगकी समान चिकित्सा करे । टूटीहुई हड्डी जिसप्रकार पकने न पावे इसपर वैद्यको विशेष लक्ष्य रखना चाहिये । भग्न-रोगमें वातव्याधिरोगोक्त स्नेहद्रव्य ( घृत, तैलादि ) प्रयोग करे ॥
लाक्षागुग्गुलु ।
लाक्षास्थिसंहृतककुभाश्वगन्धाश्चूर्णीकृता नागबला
पुरश्च । सम्भग्नमुक्तास्थिरुजो निहन्यादङ्गानि कुर्यात्
कुलिशोपमानि ॥ १४ ॥
लाख, हडसंहारी, अर्जुनकी छाल, असगन्ध, गंगेरन और शुद्ध गूगल इनकों समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको खानेसे टूटी हुई हड्डीकी पीडा दूर होती है । अस्थि जुडकर अङ्ग वज्रके समान दृढ होय ॥ १४ ॥
आभागुग्गुलु ।
आभाफलत्रिकैर्व्योवैः सर्वैरेभिः समीकृतः ।
तुल्यो गुग्गुलुगयोज्यो भग्नसन्धिप्रसाधकः ॥ १५ ॥
बबुलकी छाल, हरड, बहेडा, आमला, सोंठ, मिरच और पीपल इन सबोंकों समान भाग और सब औषधियोंकी बराबर भाग शुद्ध गूगल लेकर एकत्र बारीक पीसकर चूर्ण करलेवे । यह चूर्ण नियमानुकूल सेवन करनेपर टूटे हुए सन्धिस्था-नोंको जोड देता है ॥ १५ ॥
गन्धतैल ।
रात्रौ रात्रौ तिलान्कृष्णान् वासयेदस्थिरे जले ।
दिवा दिवैवं संशोष्य क्षीरेण परिभावयेत् ॥ १६ ॥
तृतीयं सप्तरात्रं तु भावयेन्मधुकाम्बुना ।
ततः क्षीरं पुनः पीताञ्छुष्कान्सूक्ष्मान्विचूर्णयेत् ॥ १७॥
काकोल्यादि श्वदंष्ट्राह्वं मञ्जिष्ठां सारिवां तथा ।
कुष्ठं सर्जरसं मांसीं सुरदारु सचन्दनम् ॥ १८ ॥
शतपुष्पां च सञ्चूर्ण्य तिलचूर्णानि योजयेत् ।
पीडनार्थं च कर्तव्यं सर्वगन्धैः शृतं पयः ॥ १९ ॥