भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०२१
चतुर्गुणेन पयसा तत्तैलं पाचयेत्पुनः ।
एलामंशुमतीं पत्रं जीवन्तीं तुरगं तथा ॥ २० ॥
लोध्रं प्रपौण्डरीकं च तथा कालानुसारिवाम् ।
शैलेयकं क्षीरशुक्लामनन्तां समधूलिकाम् ॥ २१ ॥
पिष्ट्वा शृङ्गाटकं चैव प्रागुक्तान्यौषधानि च ।
एभिस्तद्विपचेत्तैलं शास्त्रविन्मृदुनाऽग्निना ॥ २२ ॥
काले तिलोंको एक स्वच्छ वस्त्रकी पोटलीमें बाँधकर प्रतिदिन रात्रिमें नदी आदि के बहतेहुए जलमें डुबोकर रक्खे और प्रतिदिन प्रातःकाल उनको जलमेंसे निकाल-कर धूपमें सुखाके गोदुग्धमें भावना देवे । इस प्रकार सात दिनतक भावना देवे । फिर पूर्वोक्त अवधितक दूधमें भावना देकर सुखालेवे । फिर उनको खूब बारीक पीसकर चूर्ण करलेवे । इस चूर्णके साथ काकोल्यादि गणकी औषधियाँ, गोखुरू, मंजीठ, सारिवा, कूठ, सफेदराल, बालछड, देवदारु, लालचन्दन और सोया इनको समानभाग लेकर चूर्ण करके मिलादेवे । तदनन्तर तेल निकालनेके लिये समस्त चूर्णको कोल्हूमें डालकर पेले और पेलते समय तेल निकालनेको जल न डाले, किन्तु सम्पूर्ण सुगन्धित पदार्थोंसे सिद्ध किये हुए जलको डालकर तेल निकाले । फिर उस तेलको चौगुने दूध एवं छोटी इलायची, शालपर्णी, तेजपत्र, जीवन्ती, असगन्ध, लोध, पुण्डरीक, तगर, भूरिछरीला, श्वेतविदारीकन्द, अनन्त-मूल, मूर्वा, सिंघाडे और पूर्वोक्त काकोल्यादि गणकी औषधियाँ, इन सबोंके कल्कके साथ शास्त्रविधिको जाननेवाला वैद्य मन्दमन्द अग्निसे पकावे ॥ १६-२२ ॥
एतत्तैलं सदा पथ्यं भग्नानां सर्वकर्मसु ।
आक्षेपके पक्षघाते तालुशोषे तथाऽर्दिते ॥ २३ ॥
मन्यास्तम्भे शिरोरोगे कर्णशूले हनुग्रहे ।
बाधिर्ये तिमिरे चैव ये च स्त्रीषु क्षयं गताः ॥ २४ ॥
पथ्यं पाने तथाऽभ्यङ्गे नस्ये वस्तिषु भोजने ।
ग्रीवास्कन्धोरसां वृद्धिरनेनैवोपजायते ॥ २५ ॥
मुखं च पद्मप्रतिमं ससुगन्धिसमीरणम् ।
गन्धतैलमिदं नाम्ना सर्ववातविकारनुत् ॥ २६ ॥