भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०२३
नाडीव्रणकी चिकित्सा ।
नादीनां गतिमन्विष्य शस्त्रेणापाट्य कर्मवित् ।
सर्वव्रणक्रमं कुर्याच्छोधनं रोपणादिकम् ॥ १ ॥
नाडीव्रण ( नासूर ) की गतिको ( अर्थात् राध कहाँतक फैली है ) जानकर उस स्थानको शस्त्रसे चीरकर सम्पूर्ण राधआदिको निकाल देवे । फिर व्रणरोगमें कही हुई विधिके अनुसार सब प्रकारकी रोपण, शोषण आदि चिकित्सा करे ॥ १ ॥
नाडीं वातकृतां साधु पाटितां लेपयेद्भिषक् ।
प्रत्यक्पुष्पीफलयुतैस्तिलैः पिष्टैः प्रलेपयेत् ॥ २ ॥
पैत्तिकीं तिलमञ्जिष्ठानागदन्तीनिशायुगैः ।
श्लैष्मिकीं तिलयष्ट्याह्वनिकुम्भारिष्टसैन्धवैः ॥
शल्यजां तिलमध्वाज्यैर्लेपयेच्छस्त्रशोधिताम् ॥ ३ ॥
वातजन्य नाडीव्रणको प्रथम शस्त्रसे उत्तम प्रकार चीरकर लेखन क्रिया करे । पश्चात् श्वेत चिरचिटेके बीज और तिलोंको एकत्र पीसकर लेप करे । पित्तज नाडीव्रणमें तिल, मंजीठ, हाथी सुण्डा लता, हल्दी और दारुहल्दी इनको पीसकर लेप करे । कफजनित नाडीव्रणमें तिल, मुलहठी जमालगोटेकी जड, नीमके पत्ते और सैंधानमक इनको पीसकर लेप करे । शल्य ( काटाँ, शस्त्रादि ) के विद्ध होनेसे उत्पन्न हुए नाडीव्रणको शस्त्रसे चीरकर शल्यको निकालकर व्रणके मार्गको शुद्ध करे । फिर तिल, शहद, घी, एकत्र पीसकर लेप करे ॥ २ ॥ ३ ॥
आरग्वधनिशाकालचूर्णाज्यक्षौद्रसंयुता ।
सूत्रवर्त्तिर्व्रणे योज्या शोधिनी गतिनाशिनी ॥ ४ ॥
अमलतासके पत्ते, हल्दी और काकादनीवृक्षकी छाल इन सबोंके १ तोला चूर्णमें घी दो तोले, शहद दो तोले और गोमूत्र ८ तोले डालकर एकत्र पकावे फिर इसमें सूतकी बत्तीको भिगोकर व्रणमें रक्खे । यह बत्ती व्रणको शुद्ध करनेवाली और राधकी गतिको नष्ट करनेवाली है ॥ ४ ॥
घोण्टाफलत्वङ्मदनात्फलानि
पूगस्य च त्वग्लवणं च मुख्यम् ।