भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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१०८४ भैषज्यरत्नावली । [ नाडीव्रण -


स्नुह्यर्कदुग्धेन सहैव कल्को
वर्त्तीकृतो हन्त्यचिरेण नाडीम् ॥ ५ ॥
वनबेरकी छाल, मैनफल, सुपारीकी छाल और सैंधानमक इनके समान भाग चूर्णको थूहरके दूध और आकके दूधमें पीसकर कुछके गरम करके बत्ती बनालेवे। यह बत्ती व्रणमें रखनेसे नासूरको बहुत शीघ्र नष्ट करती है ॥ ५ ॥

वर्त्तीकृतं माक्षिकसंप्रयुक्तं नाडीघ्नमुक्तं लवणोत्तमं वा ।
दुष्टव्रणे यद्विहितं च तैलं तत्सेव्यमानं गतिमाशु हन्ति ॥६॥
सैंधानोन और शहदको एकत्र अग्निमें पकाकर उससे सूतकी बत्ती बनाके व्रणमें रखनेसे नाडीव्रण शुष्क होता है। दुष्टव्रणमें जो तेल कहे हैं उनको प्रयोग करनेसे राधकी गति शीघ्र नष्ट होती है ॥ ६ ॥

जात्यर्कशम्याककरञ्जदन्तीसिन्धूत्थसौवर्चलयावशूकैः ।
वर्त्तिः कृता हन्त्यचिरेण नाडीं स्नुक्क्षीरपिष्टा सहमाक्षिकेण॥
चमेलीके पत्ते, आककी जड, अमलतासके पत्ते, करञ्ज, दन्तीकी जड, सैंधानोन कालानोन और जवाखार इनको बराबर बराबर लेकर थूहरके दूध और शहदमें खरल करके बत्ती बनालेवे। इस बत्तीको व्रणमें प्रवेश करनेसे नासूररोग तत्काल नाश होता है ॥ ७ ॥

माहिषं दधि कोद्रवभक्तमिश्रितं हरति चिरविरूढाम् ।
भक्तं कङ्कुनिकाभवमतिदारुणां नाडीं शमयेत् ॥ ८ ॥
भैंसका दही, कोदोंका चूर्ण और मालकाँगुनीकी जडका चूर्ण इनको सेवन करनेसे चिरकालोत्पन्न दारुण नाडीव्रणरोग शीघ्र शमन होता है ॥ ८ ॥

कृशदुर्बलभीरूणां गतिर्मर्माश्रिता च या ।
क्षारसूत्रेण तां छिन्द्यान्न शस्त्रेण कदाचन ॥ ९ ॥
कृश, निर्बल और डरपोकरोगियोंके उत्पन्न हुए एवं मर्मस्थानोंमें उत्पन्नहुए नाडी-व्रणको क्षारमें भीजे हुए डोरेसे फोडे, किन्तु शस्त्रसे कदापि नहीं चीरे ॥ ९ ॥

एषण्या गतिमन्विष्य क्षारसूत्रानुसारिणीम् ।
सूचीं विदध्याद्गत्यन्ते चोन्नाम्य चाशु निर्हरेत् ॥ १० ॥
सूत्रस्यान्तं समानीय गाढबन्धं समाचरेत् ।
ततः क्षीणबलं वीक्ष्य सूत्रमन्यत्प्रवेशयेत् ॥ ११ ॥