भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1057

चिकित्सा । भाषाटीकासहिता । १०२६


क्षाराक्तं मतिमान्वैद्यो यावन्न छिद्यते गतिः ।
भगन्दरेऽप्येष विधिः कार्यो वैद्येन जानता ॥ १२ ॥

एषणी ( लोहेकी सलाई ) से नाडीव्रणकी गतिको जानकर क्षारसूत्र पिरोई हुई सुईको व्रणकी गतिके अन्तमें छेद देवे । फिर सुईको भीतरतक प्रवेश करके बाहर निकाल लेवे और सुईमेंसे डोरेको अलग करके उसके दोनों सिरोंको मिलाकर अच्छे प्रकार गाँठ देकर बाँध देवे । यदि इस क्षारसूत्रसे नाडीव्रणका मार्ग छिन्न न हो तो दूसरा क्षारसूत्र उल्लिखित विधिसे प्रवेश करे । जबतक नाडीकी गति छिन्न भिन्न न होवे तबतक इसी प्रकार बराबर क्षारसूत्र प्रविष्ट करता रहे । वैद्य इस विधिको भगन्दररोगमें भी करे ॥ १०–१२ ॥

अर्बुदादिषु चोत्क्षिप्य मूले सूत्रं निधापयेत् ।
सूचीभिर्यववक्राभिराचितं वा समन्ततः ॥
मूलं सूत्रेण बध्नीयाच्छिन्ने चोपचरेद् व्रणम् ॥ १३ ॥

अर्बुदादि रोगोंमें ग्रंथि रसौली आदिको ऊँचा करके उनकी जडमें क्षारसे भीगा हुआ डोरा बाँधे अथवा जौकी समान मुखवाली सुईसे चारों ओरको छेदकर उसकी मूलको क्षारसूत्रसे बाँध देवे । व्रणके छिदजानेपर व्रणरोगोक्त अन्यान्य चिकित्सा करे ॥ १३ ॥

गुणवतीवर्त्ति ।

तुत्थं सर्वरसं लोध्रं सिन्दूरातिविषे निशा ।
अक्षं कपित्थश्रीवासो गुग्गुलुघृततैलकैः ॥ १४ ॥
तुल्यांशं पेषयेत्पिण्डं तत्तुल्यं सिक्थकं भवेत् ।
वर्त्तिर्गुणवती नाम जुष्टा शीतजलान्विता ॥ १५ ॥
दुःसाध्यव्रणगण्डेषु तथा नाडीव्रणेषु च ।
शोधने रोपणे चैव स्वास्थ्यमुत्पादयत्यसौ ॥ १६ ॥

राल, लोध, सिंदूर, अतीस, हल्दी, तूतिया, कच्चा कैथ, तारपीनका तेल और गूगल ये प्रत्येक एक एक तोला एवं मोम सब द्रव्योंके बराबर भाग लेवे । फिर इन सबोंको तेल और घृतके साथ कढाईमें डालकर पकाकर बत्ती बनालेवे । यह गुणवतीनामवाली बत्ती दुःसाध्य व्रण और नासूरमें प्रलेप करनेसे व्रणको शुद्ध और शुष्क कर शीघ्र आरोग्यप्रदान करती है ॥ १४–१६ ॥

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