भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
चिकित्सा । भाषाटीकासहिता । १०२६
क्षाराक्तं मतिमान्वैद्यो यावन्न छिद्यते गतिः ।
भगन्दरेऽप्येष विधिः कार्यो वैद्येन जानता ॥ १२ ॥
एषणी ( लोहेकी सलाई ) से नाडीव्रणकी गतिको जानकर क्षारसूत्र पिरोई हुई सुईको व्रणकी गतिके अन्तमें छेद देवे । फिर सुईको भीतरतक प्रवेश करके बाहर निकाल लेवे और सुईमेंसे डोरेको अलग करके उसके दोनों सिरोंको मिलाकर अच्छे प्रकार गाँठ देकर बाँध देवे । यदि इस क्षारसूत्रसे नाडीव्रणका मार्ग छिन्न न हो तो दूसरा क्षारसूत्र उल्लिखित विधिसे प्रवेश करे । जबतक नाडीकी गति छिन्न भिन्न न होवे तबतक इसी प्रकार बराबर क्षारसूत्र प्रविष्ट करता रहे । वैद्य इस विधिको भगन्दररोगमें भी करे ॥ १०–१२ ॥
अर्बुदादिषु चोत्क्षिप्य मूले सूत्रं निधापयेत् ।
सूचीभिर्यववक्राभिराचितं वा समन्ततः ॥
मूलं सूत्रेण बध्नीयाच्छिन्ने चोपचरेद् व्रणम् ॥ १३ ॥
अर्बुदादि रोगोंमें ग्रंथि रसौली आदिको ऊँचा करके उनकी जडमें क्षारसे भीगा हुआ डोरा बाँधे अथवा जौकी समान मुखवाली सुईसे चारों ओरको छेदकर उसकी मूलको क्षारसूत्रसे बाँध देवे । व्रणके छिदजानेपर व्रणरोगोक्त अन्यान्य चिकित्सा करे ॥ १३ ॥
गुणवतीवर्त्ति ।
तुत्थं सर्वरसं लोध्रं सिन्दूरातिविषे निशा ।
अक्षं कपित्थश्रीवासो गुग्गुलुघृततैलकैः ॥ १४ ॥
तुल्यांशं पेषयेत्पिण्डं तत्तुल्यं सिक्थकं भवेत् ।
वर्त्तिर्गुणवती नाम जुष्टा शीतजलान्विता ॥ १५ ॥
दुःसाध्यव्रणगण्डेषु तथा नाडीव्रणेषु च ।
शोधने रोपणे चैव स्वास्थ्यमुत्पादयत्यसौ ॥ १६ ॥
राल, लोध, सिंदूर, अतीस, हल्दी, तूतिया, कच्चा कैथ, तारपीनका तेल और गूगल ये प्रत्येक एक एक तोला एवं मोम सब द्रव्योंके बराबर भाग लेवे । फिर इन सबोंको तेल और घृतके साथ कढाईमें डालकर पकाकर बत्ती बनालेवे । यह गुणवतीनामवाली बत्ती दुःसाध्य व्रण और नासूरमें प्रलेप करनेसे व्रणको शुद्ध और शुष्क कर शीघ्र आरोग्यप्रदान करती है ॥ १४–१६ ॥
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१०२६ भैषज्यरत्नावली । [ नाडीव्रण-
सप्तांगगुग्गुलु ।
गुग्गुलुस्त्रिफलाव्योषैः समांशैराज्ययोजितः ।
नाडीदुष्टव्रणशूलभगन्दरविनाशनः ॥ १७ ॥
हरड़, बहेडा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल ये सब समान भाग और शोधित गूगल सब द्रव्योंके बराबर लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । पुनः इस चूर्णको घीमें खरल करके गोलियाँ बनालेवे । प्रतिदिन एक एक गोलीको सेवन करनेसे नासूर, दुष्टव्रण, शूल, भगन्दर आदिरोग नष्ट होते हैं ॥ १७ ॥
श्यामाघृत ।
श्यामात्रिमण्डीत्रिफलासुसिद्धं हरिद्रया तिल्वकवृक्षकेण ।
घृतं सदुग्धं व्रणतर्पणेन हन्याद्गतिं कोष्ठगतापि या स्यात् १८
अनन्तमूल, निसोत, त्रिफला, हल्दी, लोध और कुडेकी छाल इनकें समान भाग मिश्रित एक सेर कल्कके द्वारा दो सेर घृतको ८ सेर दूधमें पकावे । इस घृतसे नाडी-व्रणको तृप्त करनेसे कोष्ठतक पहुँची हुई राधकी गति नष्ट होकर व्रण शीघ्र सूख जाता है ॥ १८ ॥
स्वर्जिकाद्यतैल ।
स्वर्जिकासिन्धुदन्त्यग्निरूपिकानलनीलिकाः ।
खरमञ्जरीबीजानि तैलं गोमूत्रपाचितम् ॥
दुष्टव्रणप्रशमनं कफनाडीव्रणापहम् ॥ १९ ॥
सज्जी, सेंधानमक, दन्ती, चीता, सफेद आक, नलमूल, नीलवृक्षकी जड और चिरचिटेके बीज इन सबोंके कल्क द्वारा तिलके तैलको गोमूत्रमें पकावे । यह तेल दुष्टव्रण और कफजन्य नाडीव्रणको दूर करता है ॥ १९ ॥
कुम्भीकाद्यतैल ।
कुम्भीकखर्जूरकपित्थबिल्ववनस्पतीनां च शलाटु-
कल्कैः । कृत्वा कषायं विपचेत्तु तैलमावाप्य मुस्ता-
सरलप्रियंगूः ॥ २० ॥ सौगन्धिकामोचरसाहि-पुष्प-
लोध्राणि दत्त्वा खलु धातकीं च । एतेन शल्यप्रभवा हि
नाडी रोहेद्व्रणो वै सुखमाशु चैव ॥ २१ ॥
पुन्नागवृक्षकी लता, खजूर, कैथ, बेल, बड़ और गूलर इन सबोंको कच्चे फलोंके द्वारा यथाविधि क्वाथ बनावे । फिर इस क्वाथमें तिलका तेल तथा
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०२७
नागरमोथा, धूपसरल, फूलप्रियंगु, अनन्तमूल, मोचरस, नागकेशर, लोध चीता और धायके फूल इन सबोंको कल्क डालकर यथानियम तेलको सिद्ध करे । इस तेलको लगानेसे शल्योत्पन्न नाडीव्रण और नानाप्रकारके व्रण भरजाते हैं और रोगी शीघ्र सुखी होता है ॥ २० ॥ २१ ॥
भल्लातकाद्यतैल ।
भल्लातकार्कमरिचैर्लवणोत्तमेन सिद्धं विडङ्गरजनीद्वय- चित्रकैश्च । स्यान्मार्कवस्य च रसेन निहन्ति तैलं नाडीं कफानिलकृतामपचीं व्रणांश्च ॥ २२ ॥
भिलावे, आककी जड, कालीमिरच, सैंधानोन, वायविडङ्ग, हल्दी, दारुहल्दी और चीतेकी जड इनका समान भाग मिलाहुआ कल्क १ सेर, तिलका तेल ४ सेर और भाँगरका रस १६ सेर लेवे । सबको एकत्रकर उत्तम रूपसे तेलको पकावे । यह तेल व्यवहार करनेसे कफज और वातज नाडीव्रण, अपचीरोग एवं सर्वप्रकारके व्रणोंको शीघ्र नष्ट करता है ॥ २२ ॥
निर्गुण्डीतैल ।
समूलपत्रां निर्गुण्डीं पीडयित्वा रसेन तु । तेन सिद्धं समं तैलं नाडीव्रणविशोधनम् ॥ २३ ॥ हितं पामापचीनां तु पानाभ्यञ्जननावनैः । विविधेषु च रोगेषु तथा सर्वव्रणेषु च ॥ २४ ॥
जड और पत्तोंसहित निसोतको कूटकर निकालाहुआ रस २ सेर और तिलका तेल २ सेर इन दोनोंको एकत्र पकाकर पान, मालिश अथवा नस्यग्रहण करनेसे सर्वप्रकारके नाडीव्रण ( नासूर ), खुजली, अपची, व्रणरोग और अन्यान्य विविध प्रकारके रोग तत्काल नाश होते हैं ॥ २३ ॥ २४ ॥
हंसपदीतैल ।
हंसपद्यरिष्टपत्रं जातीपत्रं ततो रसैः । तत्कल्कैश्च पचेत्तैलं नाडीव्रणविरोहणम् ॥ २५ ॥
हंसपदीके पत्ते, नीमके पत्ते और चमेलीके पत्ते इनका समान भाग मिश्रित काथ १६ सेर एवं इन्हींका कल्क १ सेर लेवे । इनके द्वारा ४ सेर तिलके तेलको विधि- पूर्वक सिद्ध करे । यह तेल नाडीव्रणको तत्काल सुखा देता है ॥ २५ ॥
नरास्थितैल ।
नरास्थितैललेपेन स्फुटितः शुष्यति व्रणः ॥ २६ ॥
१०२८ भैषज्यरत्नावली। [ भगन्दर -
मनुष्यके शिरकी हड्डीको पीसकर उसके द्वारा सिद्ध कियेहुए तेलको लगानेसे फूटा हुआ व्रण शीघ्र सूखता है ॥ २६ ॥ नाडीव्रणमें पथ्य और अपथ्य व्रणशोथकी समान करना चाहिये ॥ इति भैषज्यरत्नावल्यां नाडीव्रणचिकित्सा ।
भगन्दरकी चिकित्सा ।
गुदस्य श्वयथुं दृष्ट्वा विशोष्य शोधयेत्ततः ।
रक्तावसेचनं कार्यं यथा पाकं न गच्छति ॥ १ ॥
गुदाकी सूजनको देखकर तत्काल रोगीको लंघन कराकर सुखावे और दस्त कराकर शुद्ध करे। यदि इस प्रकार करनेसे सूजन कम न हो तो शोथस्थानमें जोंक लगवाकर रुधिरको निकलवावे। इस प्रकार करनेसे शोथ पकता नहीं है ॥ १ ॥
वटपत्रेष्टकाशुण्ठीगुडूच्यः सपुनर्नवाः ।
सुपिष्टाः पिडिकान्ते च लेपः शस्तो भगन्दरे ॥ २ ॥
बडके पत्ते, ईंट, सोंठ, गिलोय और पुनर्नवा इन सबोंको समान भाग लेके एकत्र पीसकर भगन्दरकी गूमडियें जहाँतक फैली हों वहाँतक लेप करना ॥ २ ॥
स्नुह्यर्कदुग्धदार्बीभिर्वर्तिं कृत्वा विचक्षणः ।
भगन्दरगतिं ज्ञात्वा पूरयेत्तां प्रयत्नतः ॥
एषा सर्वशरीरस्थां नाडीं हन्यान्न संशयः ॥ ३ ॥
थूहरका दूध, आकका दूध और दारुहल्दी इनको एकत्र पीसकर बत्ती बनाकर बहते हुए भगन्दरमें सप्रयत्न प्रवेश करे । यह बत्ती शरीरकी सम्पूर्ण नाडियोंके विकारोंको दूर करती है ॥ ३ ॥
तिलाभयाकुष्ठमरिष्टपत्रं निशे वचा लोध्रमगारधूमः ।
भगन्दरे नाड्युपदंशयोश्च दुष्टव्रणे शोधनरोपणोऽयम् ॥४॥
तिल, हरड, कूठ, नीमके पत्ते, हल्दी, दारुहल्दी, वच, लोध और गृहधूम इन सबको समान भाग लेकर एकत्र पीसलेवे। फिर इस चूर्णको भगन्दर, नाडीव्रण और उपदंशके दुष्ट व्रणोंपर लेप करनेसे उक्तव्रण शुद्ध होकर भरते हैं ॥ ४ ॥
त्रिफलारससंपिष्टबिडालस्थिप्रलेपनम् ।
भगन्दरं निहन्त्याशु दुष्टव्रणहरं परम् ॥ ५ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०२९
त्रिफलाके क्वाथमें बिलावकी हड्डीको घिसकर लेप करनेसे भगन्दरका दुष्टव्रण अल्पकालमें नष्ट होता है ॥ ५ ॥
भगन्दरं प्रत्यहं तु सुधौतं त्रिफलाम्बुना ॥ ६ ॥
प्रतिदिन त्रिफलेके क्वाथसे भगन्दरको धोना चाहिये ॥ ६ ॥
खरास्रपक्वभूनागचूर्णलेपो भगन्दरम् ।
हन्ति दन्त्यग्न्यतिविषालेपस्तद्वच्छुनोऽस्थि वा ॥ ७ ॥
गधेके खूनमें केंचुओंके चूर्णको पकाकर लेप करनेसे भगन्दर रोग नष्ट होता है अथवा दन्तीकी जड, आककी जड और अतीस इनको एकत्र पीसकर लेप करें किम्वा कुत्तेकी हड्डीको त्रिफलेके क्वाथमें घिसकर प्रलेप करे तो भगन्दर दूर होता है ॥ ७ ॥
शम्बूकस्य च मांसानि भक्षयेद्व्यञ्जनादिभिः ।
अजीर्णवर्गी मासेन मुच्यते स भगन्दरात् ॥ ८ ॥
जो अजीर्णकारक द्रव्योंको छोडकर अनेक प्रकारके व्यञ्जन और आहारके साथ शम्बूक (घोंघा) के मांसको एक महीनेतक भक्षण करे तो वह भगन्दररोगी भगन्दररोगसे मुक्त होता है ॥ ८ ॥
नारायणरस ।
दरदं पार्वतीपुष्पं कुनटी पुरुषो रसः ।
शोणितं गन्धको दैत्यः सैन्धवातिविषे चवी ॥ ९ ॥
शरपुङ्खा विडङ्गश्च यमानी गजपिप्पली ।
मरिचार्कौ च वरुणो धूनकं च हरितकी ॥
सम्मर्द्य कटुतैलेन गुटिकां कारयेद्भिषक् ॥ १० ॥
सिंगरफ, गोपीचन्दन, रसौंत, मैनसिल, सुवर्ण, शुद्ध पारा, ताँबा, शुद्ध गन्धक, लोहा, सैन्धानमक, अतीस, चव्य, शरफोंका, वायविडङ्ग, अजवायन, गजपिपल, कालीमिरच, आककी मूल, वरुणाकी जड, सफेद राल और हरड इन सब द्रव्योंको १-१ तोला ले सरसोंके तेलमें खरलकरके गोलियाँ बनालेवे ॥ १० ॥
नाडीव्रणं प्रदुष्टं च गण्डमालां विचर्चिकाम् ।
चिरदुष्टव्रणं दद्रुं पूतिकर्णं शिरोगदम् ॥ ११ ॥
हस्तपादपरिस्फोटं दुःसाध्यं च भगन्दरम् ।
एतान्त्रोगान्निहन्त्याशु गजेन्द्रमिव केसरी ॥ १२ ॥
१०३० | भैषज्यरत्नावली । | [ भगन्दर-
यह औषधि नासूर, गण्डमाला, विचर्चिका, बहुत पुराना दुष्टव्रण, दाद, पूतिकर्ण, शिरोरोग, हाथ पैरके फोडे और दुःसाध्य भगन्दर इत्यादि रोगोंको तत्क्षण इस प्रकार नष्ट करती है जिस प्रकार मृगेन्द्र गजेन्द्रको नष्ट कर देता है ॥ ११ १२ ॥
चित्रविभाण्डक रस ।
शुद्धसूतं द्विधा गन्धं कुमारीरसमर्दितम् ।
त्र्यहान्ते गोलकं कृत्वा ताम्रं तेन प्रलेपयेत् ॥ १३ ॥
द्वयोः समं भस्म पूर्णभाण्डे रुद्ध्वा विपाचयेत् ।
द्वियामान्ते समुद्धृत्य स्वाङ्गशीतं विचूर्णयेत् ॥
जम्बीरस्य द्रवैः पिष्ट्वा रुद्ध्वा सप्तपुटे पचेत् ॥ १४ ॥
शुद्ध पारा एक तोला और शुद्ध गन्धक दो तोले, इनको घीग्वारके रसमें तीन दिनतक खरल करके गोलासा बनाले, फिर उस गोलेसे तीन तोले शुद्ध ताँबेके पत्रको लीपे और इन दोनोंके बराबर भाग उपलोंकी राखको एक हाँडीमें भरकर ऊपरसे उक्त पत्रको रक्खे और उसके ऊपर फिर राख भरकर हाँडीके मुखको अच्छेप्रकार बन्द करके दो प्रहरतक तीव्र अग्निमें पकावे । जब पककर स्वाङ्गशीतल होजाय तब निकालकर चूर्ण करलेवे । पश्चात् इस चूर्णको जम्भीरीनीम्बूके रसमें पीसकर मूषायन्त्रमें रखकर सातवार पुटपाक करे ॥ १३ ॥ १४ ॥
गुञ्जैकं मधुनाऽऽज्येन लिह्याद्धन्ति भगन्दरम् ।
मुषली लवणं चानु चारनालयुतं पिबेत् ॥ १५ ॥
कर्त्तव्यो मधुराहारो दिवास्वप्नं च मैथुनम् ॥
वर्जयेच्छीतलाहारं रसे चित्रविभाण्डके ॥ १६ ॥
इसकी एक एक रत्ती मात्राको मधु और घृतमें मिलाकर चाटनेसे भगन्दररोग नष्ट होता है । औषधि सेवन करनेके पीछे मुसली और सेंधानमकको काँजीमें पीसकर पान करे । इसपर मधुर पदार्थोंका भोजन करे । किन्तु दिनमें सोना, मैथुन करना और शीतल द्रव्योंका आहार करना त्यागदेवे ॥ १५ ॥ १६ ॥
ताम्रप्रयोग ।
ताम्रपत्रं रविक्षीरे निर्गुण्डीस्वरसे तथा ।
त्रिकण्टजे स्नुहिरसे ताम्रं दग्ध्वा क्षिपेत्त्रिधा ॥ १७ ॥
रसस्यार्द्धपलं शुद्धं गन्धकस्य पलं तथा ।
कज्जल्यार्द्धेन जम्बीरप्लुतेन ताम्रतः पलम् ॥ १८ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०११
परिलिप्यान्धमूषायां दद्यात्पञ्च पुटाँल्लघून् ।
सम्मर्द्य मधुसर्पिर्भ्यां ततो रक्तिद्वयं लिहेत् ॥
भगन्दरे सर्वभवे कार्यं सर्वव्रणेषु च ॥ १९ ॥
चार तोले ताँबेके पत्रको आकके दूध, निर्गुण्डीके स्वरस, गोखुरूके क्वाथ और थूहरके दूधमें यथाक्रम तीन तीन बार भावना देकर तीन तीन बार अग्निमें भस्म करे। पश्चात् शुद्ध पारा दो तोले और शुद्धगन्धक चार तोले लेकर कज्जली बना-कर तीन तोले जम्बीरीनींबूके रसमें खरल करलेवे। फिर पूर्वोक्त ताम्रपत्रको इस कज्जलीसे लिप्त करके अन्धमूषायन्त्रमें रख हल्के हल्के पाँच वार पुटदेवे। तदनन्तर उसको निकालकर शहद और घृतमें खरल करके प्रतिदिन प्रातःकाल दो रत्ती भर सेवन करे। इस प्रयोगको भगन्दर और सर्वप्रकारके व्रणोंमें सेवन करनेसे विशेष उपकार होता है ॥ १७-१९ ॥
नवकार्षिक गुग्गुलु ।
त्रिफलापूरकृष्णानां त्रिपञ्चैकांशयोजिता ।
गुडिका शोथगुल्मार्शोभगन्दरवतां हिता ॥ २० ॥
हरड, बहेडा और आमला ये प्रत्येक तीन तीन तोले, गूगल, पाँच तोले और पीपल एक तोला लेवे। पुनः सबको एकत्र खरल करके गोलियाँ बनालेवे। यह गोली सूजन, गुल्म, अर्श और भगन्दररोगवाले रोगियोंके लिये विशेष हितकारी है ॥ २० ॥
सप्तविंशतिकगुग्गुलु ।
त्रिकटु त्रिफला मुस्तविडङ्गामृतचित्रकम् ।
शठ्येला पिप्पलीमूलं हबुषा सुरदारु च ॥ २१ ॥
तुम्बुरुर्वहृष्करं चव्यं विशाला रजनीद्वयम् ।
विडसौवर्चलौ क्षारौ सैन्धवं गजपिप्पली ॥ २२ ॥
यावन्त्येतानि चूर्णानि तावद्विगुणगुग्गुलुः ।
कोलप्रमाणां गुटिकां भक्षयेन्मधुना सह ॥ २३ ॥
सोंठ, मिरच, पीपल, त्रिफला, नागरमोथा, वायविडङ्ग, गिलोय, चीता, कचूर, छोटी इलायची, पीपलामूल, हाऊबेर (अभावमें धनियाँ), देवदारु, धनियाँ, भिलावेका फल, चव्य, इंद्रायणकी जड, हल्दी; दारुहल्दी, विरियासञ्चर नमक, काला-
१०३२ भैषज्यरत्नावली । [ भगन्दर-
नमक, जवाखार, सज्जी, सेंधानमक और गजपीपल इन सम्पूर्ण औषधियोंका चूर्ण एक एक तोला और समस्त चूर्णसे दुगुनी गूगल लेवे। फिर सबोंको एकत्र उत्तम प्रकार खरल करके बेरकी बराबर गोलियाँ तैयार करलेवे। प्रतिदिन प्रातःकाल एक गोली मधुके साथ सेवन करे ॥ २१-२३ ॥
कासं श्वासं तथा शोथमर्शांसि च भगन्दरम् ।
हृच्छूलं पार्श्वशूलं च कुक्षिवस्तिगुदे रुजम् ॥ २४ ॥
अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रं च अन्त्रवृद्धिं तथा कृमिम् ।
चिरज्वरोपसृष्टानां क्षयोपहतचेतसाम् ॥ २५ ॥
आनाहं च तथोन्मादं कुष्ठानि चोदराणि च ।
नाडीं दुष्टव्रणान्सर्वान् प्रमेहं श्लीपदं तथा ॥
सप्तविंशतिको हन्ति सर्वरोगनिषूदनः ॥ २६ ॥
यह सप्तविंशतिकनामक गूगल खाँसी, श्वास, सूजन, बवासीर, भगन्दर, हृदयका शूल, पसलीका शूल, कुक्षि, वस्ति और गुदाके रोग, पथरी, मूत्रकृच्छ्र, अन्त्रवृद्धि, कृमिरोग एवं बहुत पुराने ज्वर, क्षयसे पीडित मनुष्योंके आनाह, उन्माद, कुष्ठ, उदररोग, नाडीव्रण, दुष्टव्रण, प्रमेह, श्लीपद तथा अन्यान्य सर्वप्रकारके विकारोंको तत्काल नष्ट करता है ॥ २४-२६ ॥
विष्यन्दनतैल ।
चित्रकार्कत्रिवृत्पाठे मलपूहयमारकौ ।
सुधां वचां लाङ्गलिकीं हरितालं सुवर्चिकाम् ॥
ज्योतिष्मतीं च संहृत्य तैलं धीरो विपाचयेत् ॥ २७ ॥
चीता, आक, निसोत इनकी जड, पाठ, गूलरकी जड, कनेरकी जड, थूहरकी जड, बच, कालिहारी, हरताल, सज्जी और मालकाङ्गनी इन सबोंको समान भाग लेकर कल्क बनावे और इसी कल्कके द्वारा चौगुने जलमें यथाविधि तिलके तेलकों सिद्ध करे ॥ २७ ॥
एतद्विष्यन्दनं नाम तैलं दद्याद्भगन्दरे ।
शोधनं रोपणं चैव सवर्णकरणं परम् ॥ २८ ॥
इस विष्यन्दननामवाले तेलको भगन्दर रोगमें व्यवहार करनेसे व्रण शुद्ध होकर शीघ्र भर जाता है और त्वचाका वर्ण अत्युत्तम होजाता है ॥ २८ ॥
चिकित्सा] भाषाटीकासहिता । १०३३
करवीराद्यतैल ।
करवीरनिशादन्तीलाङ्गलीलावणाग्निभिः ।
मातुलुङ्गार्कवत्साह्वे पचेत्तैलं भगन्दरे ॥ २९ ॥
कनेरकी जड, हल्दी, दन्तीकी जड, कलिहारी, सैंधानमक, चीता, बिजौरे नींबूकी जड, आक की जड और कुडेकी छाल इनके समान भाग मिश्रित कल्कके साथ तेलको पकाकर लगानेसे भगन्दररोगमें अत्यन्त लाभ होता है ॥ २९ ॥
निशाद्यतैल ।
निशार्कक्षीरसिन्ध्वग्निपुराश्वहनवत्सकैः ।
सिद्धमभ्यञ्जने तैलं भगन्दरविनाशनम् ॥ ३० ॥
हल्दी, आकका दूध, सैंधानोन, चीता, गुगल, कनेरकी जड और कुडेकी छाल इन सबोंका कल्क समान रूपसे मिलाहुआ एक सेर, जल आठ सेर और तिलका तेल दो सेर लेकर सबको एकत्रकर विधिपूर्वक पकावे । इस तेलको लगानेसे भगन्दररोग शीघ्र नष्ट होता है ॥ २९ ॥
सैन्धवाद्यतैल ।
सैन्धवं चित्रकं दन्ती पलाशं चेन्द्रवारुणी ।
गोमूत्रेऽष्टगुणे पक्त्वा ग्राह्यमष्टावशेषितम् ॥ ३१ ॥
क्वाथपादं पचेत्तैलं कल्कः कृष्णायसं मृतम् ।
पचेत्तैलावशेषं च तेन लेप्यं भगन्दरम् ॥
असाध्यं साधयत्याशु पक्वं कृमिकुलान्वितम् ॥ ३२ ॥
सैंधानमक, चीता, दन्तीकी जड, ढाक और इन्द्रायणकी जड इनको समान भाग लेकर अठगुने गोमूत्रमें पकावे । जब पकते पकते आठवाँ भाग शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर इसमें क्वाथसे चौथाई भाग तिलका तेल और कल्ककें लिये कृष्णलोहकी भस्म ८ तोले मिलाकर तेलको पकावे । जब तेलमात्र शेष रहजाय तब उतारलेवे । इस तेलको लगानेसे कृमियुक्त और असाध्य भगन्दर-रोग तत्काल नाश होता है । ३१ ॥ ३२ ॥
भगन्दररोगमें पथ्य ।
आमे संशोधनं लेपो लंघनं रक्तमोक्षणम् ।
पक्वे पुनः शस्त्रवहिक्षारकर्म यथाविधि ॥ ३३ ॥
१०३४ भैषज्यरत्नावली । [ उपदंश-
सर्वेऽपि शालयो मुद्गा विलेपी जाङ्गलोरसः ।
पटोलं शिग्रुवेत्राग्रं पत्तूरो बालमूलकम् ॥ ३४ ॥
तिलसर्षपयोस्तैलं तिक्तवर्गो घृतं मधु ।
एतत्पथ्यं यथादोषं नरैः सेव्यं भगन्दरे ॥ ३५ ॥
भगन्दररोगकी अपक्व (कच्ची) अवस्थामें संशोधन, औषधियोंका लेप, लंघन और रुधिरका निकलवाना आदि कर्म हितकर हैं। और भगन्दरके पकजानेपर शस्त्रक्रिया, अग्निदग्ध एवं क्षारादिकर्म विधिपूर्वक करे। पक्व और अपक्व दोनों अवस्थाओंमें शालिधानके चावल, मूंग, विलेपी, जंगली पशु पक्षियोंका मांलरस, परवल, सहिंजना, बेंतकी कोंपल, शान्तिशाक, कच्चीमूली, तिल और सरसोंका तेल, तिक्तवर्ग, घृत और शहद इन सब पथ्य वस्तुओंको दोषानुसार सेवन करना चाहिये ॥ ३३-३५ ॥
भगन्दररोगमें अपथ्य ।
विरुद्धान्यन्नपानानि विषमाशनमातपम् ।
व्यायामं मैथुनं युद्धं पृष्ठयानं गुरूणि च ॥
संवत्सरं परिहरेदपि रूढव्रणो नरः ॥ ३६ ॥
स्वभावविरुद्ध अन्नपान और विषम भोजन, धूपका सेवन, कसरत, मैथुन, युद्ध, घोडे, ऊँट, हाथी आदिकी सवारी करना, बोझ उठाना और गुरुपाकी द्रव्योंका सेवन इन सबोंको भगन्दर रोगी व्रणके भरजानेपर भी एक वर्षतक सेवन नहीं करे ॥ ३६ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां भगन्दररोगकी चिकित्सा ।
उपदंशकी चिकित्सा ।
स्निग्धस्विन्नशरीरस्य ध्वजमध्ये शिराव्यधः ।
जलौकापातनं वा स्यादूर्ध्वाधः शोधनं तथा ॥ १ ॥
सद्यो निर्जितदोषस्य रुक्शोथावुपशाम्यतः ।
पाको रक्ष्यः प्रयत्नेन शिश्नक्षयकरो हि सः ॥ २ ॥
उपदंश (गरमी) रोगमें प्रथम रोगीको स्निग्ध द्रव्य पान कराकर स्वेदित करे। पश्चात् लिंगकी बीचकी शिराको वेधे अथवा जोंक लगवाकर रक्तमोक्षण
-चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०३५
करावे । फिर वमन कराकर ऊपरसे और दस्त करवाकर नीचेसे शरीरकी शुद्धि करे । इस प्रकार करनेसे दोषोंकी शान्ति होजानेपर रोगीकी पीडा और सूजन तत्काल नष्ट होती है । लिङ्गकी सूजन जिस प्रकार पकें नहीं इसका विशेष यत्न करना चाहिये क्योंकि पकजानेपर लिङ्गेन्द्रियका नाश होजाता है ॥ १ ॥ २ ॥
त्रिफलायाः कषायेण भृङ्गराजरसेन वा ।
व्रणप्रक्षालनं कुर्यादुपदंशप्रशान्तये ॥ ३ ॥
त्रिफलेके काढेसे अथवा भाँगरेके रससे प्रतिदिन उपदंशके व्रणोंको धोवे तो उपदंशरोग शमन होता है ॥ ३ ॥
दहेत्कटाहे त्रिफलां समां समधुसंयुताम् ।
उपदंशे प्रलेपोऽयं सद्यो रोपयति व्रणम् ॥ ४ ॥
लोहेकी कढाईमें समान भागसे मिलेहुए त्रिफलेको भूनलेवे, फिर शहदमें पीसकर उपदंशपर लेप करे तो शीघ्र व्रण भरजाते हैं । किसी ऋषिका ऐसा मत है कि, समान भाग त्रिफलेको नवीन हाँडीमें रखकर सकोरेसे उसके मुखको अच्छे प्रकार बन्दकरके मिश्रितकरके अग्निमें भस्म करलेवे । पश्चात् उस भस्मको शहदमें मिलाकर उपदंशपर लेप करे तो तत्काल व्रण शुष्क होते हैं ॥
रसाञ्जनं शिरीषेण पथ्यया वा समन्वितम् ।
सक्षौद्रं वा प्रलेपोऽयं सर्वलिङ्गगदापहः ॥ ५ ॥
रसौंतको सिरसकी छाल अथवा हरडके साथ शहदमें पीसकर व्रणपर लेप करे । किंवा रसौंतको शहदमें मिलाकर प्रलेप करे तो सर्वप्रकारके उपदंशविकार दूर होतें हैं ॥ ५ ॥
बब्बोलदलचूर्णेन उपदंशहरं परम् ।
गुण्डनं नृस्थिचूर्णेन दाडिमत्वग्भवेन वा ॥ ६ ॥
लेपः पूगफलेनाश्वमारमूलेन वा तथा ।
सेवेन्नित्यं यवान्नं च पानीयं कौपमेव च ॥ ७ ॥
बबूरके पत्तोंका चूर्ण अथवा अनारकी छालका चूर्ण किंवा मनुष्यकी हड्डीका चूर्ण व्रणपर लगानेसे उपदंशरोग शीघ्र नष्ट होता है । सुपारीको जलमें घिसकर अथवा कनेरकी छालको पीसकर लेप करे तो उपदंशके व्रण शुष्क होते हैं । उपदंशरोगीको प्रतिदिन जौका भोजन और कुएँका जल सेवन करना चाहिये, इससे
१०३६ भैषज्यरत्नावली । [ उपदंश-
उक्तरोग शीघ्र शान्त होता है ॥ ६ ॥ ७ ॥ जयाजात्यश्वमारार्कशम्याकानां दलैः पृथक् । कृतं प्रक्षालने क्वाथं मेढ्रपाके प्रयोजयेत् ॥ ८ ॥ उपदंशमें लिङ्गके पकजानेपर जयन्ती, चमेली, कनेर, आक और अमलतास इनके पत्तोंका अलग अलग क्वाथ बनाकर व्रणोंको धोवे ॥ ८ ॥
धूप । बदरार्कमपामार्गस्तथा ब्राह्मणयष्टिका । हिङ्गुलं च समं चैषां भागं कृत्वा तु धूपनम् ॥ दोषजं कर्मजं हन्यादुपदंशादिकं व्रणम् ॥ ९ ॥ बडीबेरकी छाल, आक, चिरचिटा, भारङ्गी और सिंगरफ इन सबोंको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर धूनी देवे । इससे दोषज और कर्मज दोनों प्रकारकें उपदंशोंके व्रण नष्ट होते हैं ॥ ९ ॥
धूप । रसं वङ्गं च खदिरं हरीतक्याश्च भस्मकम् । कोमलं कदलीभस्म गुवाकफलभस्म च ॥ १० ॥ एतत्तोलकमानं स्याद्धिङ्गुलं हरितालकम् । गन्धकं तुत्थकं वापि पद्मकं सरलं तथा ॥ ११ ॥ द्वे चन्दने देवदारु वकमं काष्ठमेव च । तथा केशरकाष्ठं च माषमानं प्रकल्पयेत् ॥ १२ ॥ एकीकृत्य च सञ्चूर्ण्य सर्वं चाङ्गेरिकाद्रवैः । तुलसीपत्रजरसैः पुरातनगुडेन च ॥ १३ ॥ घृतेन सह षट् कार्या वटिका मन्तरक्षिताः ॥ १४ ॥ शुद्ध पारा, वङ्ग, सफेद खैर, हरड़की, भस्म, कोमल केलेकी भस्म और सुपारीकी भस्म ये प्रत्येक एक एक तोला, सिंगरफ, हरिताल, शुद्ध गन्धक, तूतिया, पद्माख, धूपसरल, लालचन्दन, सफेद चन्दन, देवदारु, अगस्तिया और नागकेशर ये प्रत्येक एक एक माशा लेवे । फिर सबोंको एकत्र पीसकर लोहेके पात्रमें नोनियाघासके रस और तुलसीके रसको डालकर लोहेके डंडेसे खरल कर पुराने गुड और घृतमें मर्दन करके छः गोलियाँ बनालेवे ॥ १०-१४ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०३७
वेदनायामुत्कटायां चतस्रः शुक्लवाससा । वेष्टयित्वा च निर्द्धूमाङ्गारोपरि च दापयेत् ॥ तं धूमं परिगृह्णीयान्नरो वस्त्रादिवेष्टितः ॥ १५ ॥ मुखनासाकर्णबहिर्निश्वासस्य निरोधतः । स्वेदे जातेऽस्य नैरूज्यं सायं प्रातर्द्दिनत्रयम् ॥ मासमात्रं तु पथ्याशी शाकाम्लदधिवर्ज्जनम् ॥ १६ ॥ गुर्व्वन्नपायसादीनि अपथ्यानि विवर्ज्जयेत् । दिनत्रये व्यतीते तु स्नानमुष्णाम्बुना चरेत् ॥ १७ ॥
तदनन्तर उपदंशमें दारुण पीडा होनेपर रोगी चारोंओरसे सफेद कपडेसे शरीरको ढककर तथा वस्त्रके मध्य सिकोरे आदिमें धूमरहित अग्निके अँगारेको रख उसमें एक गोली डालकर धूमपान करे । किन्तु रोगीको मुख, नासिका और कान वस्त्रसे खुले रखने चाहिये । यदि रोगकी अधिक प्रबलता हो तो दो अथवा चार गोलियोंको डालकर धूमपान करे । इस प्रकार प्रातः और सन्ध्यासमय तीन दिनतक धूमपान करे । धूमग्रहण करनेपर जो पसीना निकले उसको सूखे कपडेसे भीतरही भीतर पोंछलेवे । इसपर एक महीनेतक पथ्यद्रव्योंका भोजन करे और शाक, खटाई, दही, गुरुपाकी अन्न और खीर आदि अपथ्य पदार्थोंको त्यागदेवे । तीन दिनके पश्चात् गरम जलमें स्नान करे ॥ १५-१७ ॥
एवं धूमे कृते शान्ता व्रणाश्च पिडका अपि । तथा शोथश्चामवातः खञ्जता पङ्गुतापि च ॥ कुष्ठोपदंशशान्त्यर्थं भैरवेण प्रकीर्त्तितः ॥ १८ ॥
इस भाँति धूमपान करनेसे उपदंशके व्रण, पिडिका, सूजन, आमवात, खञ्जता, पंगुता, कुष्ठ और उपदंश प्रभृति सम्पूर्ण विकार बहुत शीघ्र नष्ट होते हैं । इस योगको भैरवाचार्यने निर्माण किया है ॥ १८ ॥
लेप ।
विषतिन्दुं लौहपात्रे मलाक्तं निम्बुकद्रवैः । घर्षेत्कृष्णसुधामूलं प्रत्येकं माक्षिकं दृढम् ॥ १९ ॥ तुत्थं तदनु सूतं च लौहदण्डेन तद्युतम् । सर्व्वं तदेकतां यातं तेन लिङ्गं प्रलेपयेत् ॥ २० ॥
१०३८ भैषज्यरत्नावली । [ उपदंश-
लेपे शुष्के पुनर्लेपं दद्याच्छुष्के पुनस्तथा ।
शुष्कं न संस्रयेल्लेपं शुष्कस्योपरि दापयेत् ॥ २१ ॥
मलयुक्त लोहेके पात्रमें कागजीनींबूके रसद्वारा कुचले, थूहरकी जड, सोनामाखी तूतिया और पारेको एक एक माशा लेकर यथाक्रम लोहेके डंडेसे खरल करे । जब ये सब औषधियाँ एकरूप होजावे तब लिंगपर लेप करे । लेपके सूखजानेपर दूसरा लेप करे । फिर जब वह भी सूखजाय तब उस सूखे हुएपरही और लेप करे । सूखे हुए लेपको छुडावे नहीं, किन्तु उसीपर बार बार लेप करता रहे ॥ १९-२१ ॥
भैरवरस ।
शुद्धसूतं ग्रहीतव्यं रक्तिकाशतमात्रकम् ।
त्रिगुणां शर्करां लौहे निम्बदण्डेन मर्दयेत् ॥ २२ ॥
याममात्रं तत्र दद्याच्छ्वेतं खदिरचूर्णकम् ।
सूततुल्यं ततः कुर्यान्मर्दनात्कज्जलोपमम् ॥ २३ ॥
विंशतिर्वटिकाः कार्याः स्थाप्या गोधूमचूर्णके ।
निःशेषं निःसृता ज्ञात्वा पिडकास्ताः कलेवरे ॥ २४ ॥
भैरवं देवमभ्यर्च्य बलिं तस्मै प्रदाय च ।
विधाय योगिनीपूजां दुर्गामभ्यर्च्य यत्नतः ॥ २५ ॥
वटिकास्ताः प्रयोक्तव्या भिषजा जानता क्रियाम् ।
दिवसत्रितयं दद्यात्तिस्रस्तिस्रो विजानता ॥ २६ ॥
चतुर्थाच्च समारभ्य एकामेकां प्रयोजयेत् ।
एवं चतुर्दशदिनैर्नीरोगो जायते नरः ॥ २७ ॥
पथ्यं शर्करया सार्द्धमुष्णान्नं घृतगन्धि च ।
कुर्यात्साकांक्षमुत्थानं सकृद्भोजनमिष्यते ॥ २८ ॥
जलपानं जलस्पर्शं न कदाचन कारयेत् ।
दुःसहायां तु तृष्णायामैक्षुदाडिमकादिकम् ॥ २९ ॥
शौचमुष्णाम्बुना कार्यं वाससा प्रोञ्छनं द्रुतम् ।
वातातपाग्निसम्पर्कं दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ३० ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०३९
शुद्ध किया हुआ पारा १०० रत्ती और शुद्ध खाँड ३०० रत्ती दोनोंको लोहेकें पात्रमें एकत्रकर नीमके डंडेसे एक प्रहरतक अच्छे प्रकार घोटे। फिर उसमें १०० रत्ती सफेद खैरका चूर्ण डालकर घोटे। जब घुटते घुटते कज्जलकी समान बारीक होजाय तब उसकी बीस गोलियाँ बनाकर गेहूंकें आटेमें रखदेवे। जब शरीरमें उपदंशके विषद्वारा सब फुन्सियाँ निकलीहुई मालूम हों तब प्रथम भैरवदेवको पुजकर और उनके लिये बलि देकर तथा योगिनी और दुर्गाका विधिपूर्वक पूजन करके पश्चात् उक्तगोलियोंको सुवैद्य यत्नके साथ प्रयोग करे। तीन दिनतक नित्य तीन तीन गोली देवे और चौथे दिनसे एक एक गोली देवे। इस प्रकार १४ दिन तक इन गोलियोंको सेवन करानेसे रोगी शीघ्रही आरोग्य होता है। इसपर खाँडके साथ थोडा घृत मिलाकर अधपका अन्न और सुगन्धियुक्तद्रव्योंका पथ्य देवे। जब इच्छा हो तब उठे बैठे और एकबार भोजन करे। शितल जलपान और शीतल जलका स्पर्शतक कदापि नहीं करना चाहिये। यदि अधिक तृषा मालूम हो तो ईख और अनारका रस पान करे। शौचके समय उष्णजलसे शुद्धि करे और तत्काल सूखे अँगोछेसे पोंछडाले। शितलवायु, धूप और अग्नि इनके सम्पर्कको दूर हीसे त्याग देवे ॥ ३० ॥
मेघागमे च शीते वा कार्यमेतद्विजानता । मुखरोगे तु सञ्जाते मुखरोगहरी क्रिया ॥ ३१ ॥ श्रमोध्वभाराध्ययनस्वप्नालस्यं विवर्जयेत् । ताम्बूलं भक्षयेन्नित्यं कर्पूरादिसुवासितम् ॥ ३२ ॥ क्रिया श्लेष्महरी युक्ता वातपित्ताविरोधिनी । लवणं वर्जयेदम्लं दिवानिद्रां तथैव च ॥ ३३ ॥ रात्रौ जागरणं चैव स्त्रीमुखालोकनं तथा । सप्ताहद्वयमुत्क्रम्य स्नानमुष्णाम्बुना चरेत् ॥ ३४ ॥ पथ्यं कुर्याद्धितमिदं जाङ्गलानां रसादिभिः । व्यायामाद्यं वर्जनीयं यावन्न प्रकृतिर्भवेत् ॥ ३५ ॥
वर्षा होनेपर अथवा शीतकालमें उपर्युक्त औषधि और धूपादि वस्तुओंको विधिपूर्वक सेवन करे। इस औषधिके सेवन करनेसे यदि मुख पकजाय तो मुखरोगको हरनेवाली चिकित्सा करना श्रेष्ठ है। उपदंशरोगी परिश्रम करना, मार्गमें चलना, बोझ उठाना, पढना, दिनमें सोना और आलस्य इनको त्याग देवे। एवं कपूरादि सुगन्धिवाले द्रव्योंसे सुवासित ताम्बूलको प्रतिदिन भक्षण करे। इस औषधिको
१०४० भैषज्यरत्नावली । [ उपदंश-
सेवन करनेके अनन्तर कफनाशक और वात पित्तकी मिलीहुई क्रिया करे । नमक, खटाई, दिनमें सोना, रात्रिमें जागना और स्त्री प्रसंग करना तत्क्षण परित्याग कर- देवे । उक्त प्रकारसे १४ दिनतक औषधि सेवनके पश्चात् गरमजलसे स्नानकरना और जङ्गलीजीवोंके मांसरसके साथ पथ्य अन्नोंका भोजन करना हितकारी है । जबतक रोगीकी पहले जैसी अवस्थान होजाय तबतक व्यायामादि परिश्रमजन्य कार्य नहीं करने चाहिये ॥ ३५ ॥
एवं कृतविधानं तु यः करोत्येतदौषधम् ।
स एव पापरोगस्य पारं याति जितेन्द्रियः ॥ ३६ ॥
पिडका विलयं यान्ति बलं तेजश्च वर्द्धते ।
रुजा च प्रशमं याति ग्रन्थि शोथश्च शाम्यति ॥ ३७ ॥
अस्थांभवति दाढर्चं च आमवातश्च शाम्यति ।
भैरवेन समाख्यातो रसोऽयं भैरवः स्वयम् ॥ ३८ ॥
जो जितेन्द्रिय रोगी इस निर्दिष्ट रीतिके अनुसार रहता हुआ औषधि सेवन करता है वहही इस पापरोगको जीतकर सुखी होता है । इस औषधिसे उपदंशकी पिडिकायें नाश होती हैं और बल तथा तेज बढता है । एवं अन्यान्य सब रोग शान्त होजाते हैं, ग्रन्थि और सूजन नष्ट होती हैं, हड्डियें अत्यन्त दृढ होती हैं और आमवातरोग शान्त होता है । इसको भैरवजीने कहा है इससे यह रस भैरवनामसे प्रसिद्ध है ॥ ३६-३८ ॥
रसगुग्गुलु ।
ग्राह्यः पातनयन्त्रेण शुद्धश्चन्द्रसमो रसः ।
रक्तिकाशतमेतस्य शर्करा त्रिगुणा भवेत् ॥ ३९ ॥
ततश्चतुर्गुणो ग्राह्यो गुग्गुलुर्महिषाक्षकः ।
घृतं रससमं दद्यान्मर्दयेच्च प्रयत्नतः ॥ ४० ॥
विंशतिर्वटिकाः कार्यास्तिस्रस्तिस्रो दिनत्रयम् ।
एकादश दिनैरन्या देया एकादशैव ताम् ॥
सप्ताहद्वयमेवं च कारयेद्भिषजां वरः ॥ ४१ ॥
पातनयन्त्रमें शुद्ध किया हुआ पारा १०० रत्ती, चीनी ३०० रत्ती, शुद्ध भैंसिया गूगल ४०० रत्ती और घृत १०० रत्ती लेवे । फिर सर्वोको एकत्र लोहेके पात्रमें
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०४१
लोहेके डंडेसे उत्तम प्रकार खरल करके २० गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेकी विधि इसप्रकार है-प्रथम तीन दिनतक तीन तीन गोलियाँ भक्षण करे, फिर चौथे दिनसे ११ दिनतक एक एक गोली खावे, इसप्रकार १४ दिनमें यह समस्त औषधि रोगीको सेवन करानी चाहिये ॥ ३९-४१ ॥
लवणं वर्जयेदम्भः पादार्द्धाशनमिष्यते । दिनद्वये व्यतीते तु पादोनं पथ्यमाचरेत् ॥ ४२ ॥ मसूरयूपं सगुडं व्यञ्जनं चाथ कल्पयेत् । पुनर्नवा पटोलानि तिक्तपत्री च गोक्षुरम् ॥ ४३ ॥ पुटपत्री कोकिलाक्षं शाकार्थे घृतभर्जितम् । शर्करा लवणस्थाने वेसवारे धनीयकम् ॥ ४४॥ लवङ्गाजाजिहिंगूनि धान्यकं जीरकाणि च । पाकार्थे सम्प्रदातव्यं संस्कारार्थं भिषग्वरैः ॥ ४५ ॥
इसपर लवण और जलको त्यागकर वक्ष्यमाण विधिसे आहार करे । पहले दिन खुराकसे चौथाई, दूसरे दिन आधा और दोदिनके पश्चात् पौन पौन भाग भोजन करे । गुडके साथ व्यञ्जन और मसूरकी दालका यूष पथ्य है । शाकोंमें घीमें भुने-हुए पुनर्नवै, परवल, ककोडे, गोखरू, पुटपत्री और तालमखानेको खाना श्रेष्ठ है । शाकमें नमककी जगह खाँड और मसालेकी जगह धनियाँ डाले । पाकको सुगन्धित करनेके लिये लौंग, कालाजीरा, हींग, धनियाँ और जीरेको एकत्र पीस-कर डाले ॥ ४२-४५ ॥
भैरवस्य रसस्यान्याः क्रिया अत्र प्रयोजयेत् । रसगुग्गुलुरेवं हि सर्व्वाञ्जित्वाऽऽमयानयम् ॥ ४६ ॥ कुष्ठोपदंशनामानं व्रणं वातादिसंयुतम् । कामदेवप्रतीकाशश्चिरजीवी भवेन्नरः ॥ ४७ ॥
इसमें अन्य सर्व क्रियायें भैरवरसकी समान करे । इस प्रकार व्यवहार किया हुआ यह रसगूगल सर्वप्रकारके रोगोंको नष्टकर उपदंश, कुष्ठ तथा वातादि युक्त रोगोंके व्रणोंको शीघ्र सुखाता है । इसके सेवन करनेसे शरीर कामदेवकी समान कान्तिमान् होता है और वह मनुष्य बहुत कालतक जीता है ॥ ४६ ॥ ४७ ॥
सारिवाद्यवलेह ।
सारिवायाः पलशतं जलद्रोणे विपाचयेत् । तस्मिन्पादावशेषे तु गुडूची शतमूलिका ॥ ४८ ॥
६६
| १०४२ | भैषज्यरत्नावली । | [ उपदंश- |
|---|
विदारी जीवनी त्रिवृत्कटुकी त्रिफला तथा ।
क्षुद्रैला त्रायमाणा च प्रत्येकार्द्धपलं मितम् ॥ ४९ ॥
सुपिष्टं निक्षिपेत्तत्र शीते मधुपलाष्टकम् ।
क्षीरानुपानयोगेन पिबेत्तोलकसम्मितम् ॥ ५० ॥
अनन्तमूलको १०० पल लेकर ३२ सेर जलमें पकावे। पकते पकते जब ८ सेर जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें गिलोय, शतावर, विदारीकन्द, जीवनीगणकी समस्त औषधियाँ, निसोत, कुटकी, त्रिफला, छोटी इलायची और त्रायमाणा इनके दो दो तोले चूर्णको खूब बारीक पीसकर डालदेवे और उत्तम प्रकार पकावे । जब पककर गाढा होजाय तब उतारले और शीतल होजानेपर आठ पल शहद मिलादेवे । इसको प्रतिदिन प्रातःकाल एक तोला प्रमाण गोदुग्धके साथ सेवन करे ॥ ४८-५० ॥
प्रमेहाश्चोपदंशाश्च मूत्रकृच्छ्रं च पीडिकाः ।
नश्यन्ति त्वपरे रोगा रक्तदुष्टा भवन्ति ये ॥ ५१ ॥
पारदाद्विकृतिश्चापि सन्देहो नात्र कश्चन ।
मुक्तश्च सर्वरोगेभ्यो बलवर्णाग्निसंयुतः ॥
मानवः सिद्धकामोऽस्माच्छीघ्रं भवति निश्चितम् ॥५२॥
इससे बीसोंप्रकारके प्रमेह, उपदंश, मूत्रकृच्छ्र, फुन्सियें एवं अन्यान्य दूषित रक्तसे होनेवाले रोग शीघ्र नष्ट होते हैं। इसके सेवनसे पारेके खानेसे उत्पन्न हुए विकारभी निस्सन्देह दूर होते हैं। इसको सेवन करनेवाला पुरुष सम्पूर्ण रोगोंसे मुक्त होकर बल, वर्णयुक्त और अत्यन्त प्रदीप्त अग्निवाला होता है। एवं शीघ्रही इष्टसिद्धिको प्राप्त करता है ॥ ५१ ॥ ५२ ॥
रसशेखर ।
पारदं चाहिफेनं च द्विर्द्वादश च रक्तिकम् ।
आयसे निम्बकाष्ठेन मर्दयेत्तुलसीरसैः ॥ ५३ ॥
तस्मिन्सम्मूर्च्छिते दद्याद्दरदं रससम्मितम् ।
मर्दयेच्च तुलस्यैव ततश्चैतानि दापयेत् ॥ ५४ ॥
जातीकोषफले चैव पारसीययमानिकाम् ।
आकारकरभं चैव द्वात्रिंशद्रक्तिकां प्रति ॥ ५५ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०४३
मर्द्दयेत्तुलसीतोयैरेतेषां द्विगुणं शुभम् ।
दद्यात्खदिरसत्त्वं च वटिका चणकप्रभा ॥ ५६ ॥
पारा २ रत्ती और अफीम १२ रत्ती लेकर दोनोंको लोहेके बर्त्तनमें नीमके डंडेसे तुलसीका रस डालकर घोटे । जब पारा मूर्च्छित होजाय तब उसमें दो रत्ती सिंगरफ मिलाकर तुलसीके ही रससे दुबारा खरल करे । फिर जावित्री, जायफल, खुरासानी अजवायन और अकरकरा ये प्रत्येक बत्तीस बत्तीस रत्ती और सबोंसे दुगुना उत्तम प्रकारका खैरसार डालकर तुलसीके रसमें यथाविधि खरल करके चनेकी बराबर गोलियाँ बनालेवे ॥ ५३-५६ ॥
सायं द्वे प्रयोज्ये च लवणाम्लं च वर्जयेत् ।
गलत्कुष्ठं तथा स्फोटान्दुष्टान् गर्दभिकामपि ॥ ५७ ॥
ये स्युर्व्रणा नृणामन्ये उपदंशपुरःसराः ।
तान् सर्वान्नाशयत्याशु सिद्धोऽयं रसशेखरः ॥ ५८ ॥
इसमेंसे प्रतिदिन सायङ्कालमें दो दो गोली खाय; नमक और खटाईका त्याग करे, यह रसशेखरनामक सिद्धरस गलत्कुष्ठ, दुष्ट स्फोटक, गर्दभिका, उपदंशकें व्रण और अन्य सर्वप्रकारके व्रणोंको तत्काल नाश करता है ॥ ५७ ॥ ५८ ॥
करञ्जाद्यघृत ।
करञ्जनिम्बार्जुनशालजम्बूवटादिभिः कल्ककषायसिद्धम् ।
सर्पिर्निहन्यादुपदंशदोषं सदाहपाकं स्रुतिरागयुक्तम् ॥ ५९ ॥
करञ्जकी जड, नीम, अर्जुन, शालवृक्ष, जामुन, बड, गूलर, पीपल, पिलखन और बेंत इन सबोंकी छालके कल्क और क्वाथके द्वारा सिद्ध किये हुए घृतको सेवन करनेसे दाह, पाक और राधका स्राव होना आदि दोषोंसहित उपदंशरोग नष्ट होता है ॥ ५९ ॥
भूनिम्बाद्यघृत ।
भूनिम्बनिम्बत्रिफलापटोलकरञ्जजातीखदिरासनानाम् ।
सतोयकल्कैर्घृतमाशु पक्वं सर्वोपवंशापहरं प्रदिष्टम् ॥ ६० ॥
चिरायता, नीम, त्रिफला, परवल, करंजुआ, जावित्री, खैर और आसना इनके क्वाथ और कल्कके साथ विधिपूर्वक घृतको पकावे । यह घृत नियमानुसार सेवन करनेपर सर्वप्रकारके उपदंशों ( आतशक ) को बहुत शीघ्र हरता है ॥ ६० ॥
| १०४४ | भैषज्यरत्नावली । | [ उपदंश- |
|---|
अनन्ताद्यघृत ।
अनन्तामलकीद्राक्षाः काकोलीयुगलं वरीम् ।
एलाद्वयं विदारीं च मधुकं मधुकं मुराम् ॥ ६१ ॥
त्रिफलां स्वर्णपर्णीं च बीजं गोक्षुरसम्भवम् ।
दशमूलं तालमूलीं त्रिवृतामिन्द्रवारुणीम् ॥ ६२ ॥
नीलिनं शूकशिम्ब्याश्च बीजं कर्षप्रमाणतः ।
कल्कीकृत्य पचेत्प्रस्थे सर्पिषः सारिवाम्भसा ॥ ६३ ॥
घृतमेतदनन्ताद्यमुपदंशविनाशनम् ।
रसायनं परं वृष्यमस्रदोषनिषूदनम् ॥ ६४ ॥
प्रथम ४ सेर अनन्तमूलको लेकर ३२ सेर जलमें पकावे। जब पकते २ आठ सेर जल शेष रहे तब उतारकर छान लेवे। फिर कल्कके लिये अनन्तमूल, आमले, दाख, काकोली, क्षीरकाकोली, शतावर, छोटी इलायची, बडी इलायची, विदारीकन्द, मुलहठी, महुआ, कपूरकचरी, त्रिफला, सनाय, गोखरूके बीज, दशमूलकी सब औषधियाँ, मूसली, निसोध, इन्द्रायन, नीलवृक्षकी जड और कौंचके बीज इन सब औषधियोंको एक एक कर्ष लेवे और सर्वोको एकत्र कूटपीसकर कल्क बनावे। पश्चात् इस कल्क और उपर्युक्त क्वाथके द्वारा एक प्रस्थ गोघृतको उत्तम प्रकार पकावे। इस अनन्ताद्य घृतको सेवन करनेसे उपदंशका और तज्जन्य दूषित रक्तका तत्काल नाश होता है। यह घृत अत्यन्त बल, वीर्यवर्धक और परमरसायन औषध है ॥ ६१-६४ ॥
आगारधूमाद्यतैल ।
आगारधूमो रजनी सुराकिण्वं च तैस्त्रिभिः ।
भागोत्तरैः पचेत्तैलं कण्डूशोथरुजापहम् ॥
शोधनं रोपणं चैव सवर्णकरणं तथा ॥ ६५ ॥
घरका धुआ एक पल, हल्दी दो पल और मदिराका मैल तीन पल लेवे। इन सबोंके द्वारा एक प्रस्थ तिलके तैलको विधिपूर्वक पकावे। यह तैल खुजली सूजनको दूर करता है एवं उपदंशके व्रणोंकी राधादिको निकालकर उनको शुष्क कर त्वचाको सुन्दरवर्णवाली बनाता है ॥ ६५ ॥
उपदंशरोगमें पथ्य ।
छर्दिर्विरेको ध्वजमध्यनाडीवेधो जलौकःपरिपातनं च ।
सेकः प्रलेपो यवशालयश्च धन्वामिषं मुद्गरसो घृतानि ॥