भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०४५
कठिल्लकं शिग्रुफलं पटोलं शालिञ्चशाकं नवमूलकं च । तिक्तं कषायं मधु कूपवारि तैलं च हन्यादुपदंशरोगम् ६७ वमन, विरेचन, लिङ्गके बीचकी शिराको छेदना, जोंक लगवाना, सेचन, सेंक और लेप करना, जौ, शालिधान, धन्वदेशके पशु पक्षियोंका मांस, मूँगका यूष, घृत, करेला, सहिंजनेकी फली, परवल, शालिञ्चशाक, कच्ची मूली, तीखे और कषैले-रसवाले पदार्थ, शहद, कुएका जल तथा तेल ये सब उपदंशरोगमें हितकारी हैं । इनके सेवनसे उक्त रोग शीघ्र नष्ट होता है ॥ ६६ ॥ ६७ ॥
उपदंशरोगमें अपथ्य ।
दिवानिद्रां मूत्रवेगं गुर्वन्नं मैथुनं गुडम् । आयासमम्लं तक्रं च वर्जयेदुपदंशवान् ॥ ६८ ॥ उपदंशरोगी दिनमें सोना, मूत्रके वेगको रोकना, भारीअन्न और गुड खाना, मैथुन, कसरत करना, खटाई या खट्टे द्रव्य और मट्ठेका सेवन करना त्यागदेवे, क्योंकि ये सब इसरोगमें विशेष अनिष्टकर हैं ॥ ६८ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्याम् उपदंशचिकित्सा ।
शूकदोषकी चिकित्सा ।
हितं च सर्पिषः पानं पथ्यं चापि विरेचनम् । हितः शोणितमोक्षश्च यच्चापि लघु भोजनम् ॥ १ ॥ शूकदोषमें औषधियों द्वारा पकाये हुए घृतको पीना, जुलाबलेना, रक्तमोक्षण ( फस्त खुलवाना ) और हल्का भोजन करना विशेष हितकारी है ॥ १ ॥
सर्षपीं लिखितां सूक्ष्मैः कषायैरवचूर्णयेत् । तैरेवाभ्यञ्जनं तैलं साधयेद्व्रणरोपणम् ॥ २ ॥ क्रियेयमधिमन्थेऽपि रक्तं स्राव्यं तथोभयोः । अष्ठीलायां हृते रक्ते श्लेष्मग्रन्थिवदाचरेत् ॥ ३ ॥ शूकदोषरोगमें सर्षपिकानामक पिडिकाको सिहोडे आदिके पत्तोंसे मर्दनकर ढाक, मंजीठ, पीपल, वडआदि कषायद्रव्योंके चूर्णसे घावको भरे और उपर्युक्त कषायवृक्षोंकी छालके क्वाथ तथा कल्कद्वारा पकायेहुए तैलको लगावे तो व्रण शीघ्र सूख जाता है । यह क्रिया अधिमन्थरोगमें भी करे । सर्षपी और अधिमन्थ इन
१०४६ भेषज्यरत्नावली । [ शूकदोष-
दोनों रोगोंमें रक्तमोक्षण कराना विशेष उपयोगी है। अष्ठीला रोगमें फस्त-खुलवाकर कफज ग्रन्थिरोगमें कहीहुई विधिके अनुसार चिकित्सा करनी चाहिये ॥ २ ॥ ३ ॥
कुम्भिकायां हरेद्रक्तं पक्वायां शोधिते व्रणे ।
तिन्दुकत्रिफलालोध्रैर्लेपस्तैलं च रोपणम् ॥ ४ ॥
पकी हुई कुम्भिकामें रक्तमोक्षण करे और राधआदिको निकालकर व्रणको शुद्ध करे । फिर तेंदू, त्रिफला, लोध इन सबोंको एकत्र पीसकर लेप करे अथवा उक्त द्रव्योंके कल्कद्वारा तेलको पकाकर लगावे । इससे व्रण शीघ्र भरता है ॥ ४ ॥
अलज्यां क्रूररक्तायाममयमेव क्रियाक्रमः ।
स्वेदयेद् ग्रथितं स्निग्धं नाडीस्वेदेन बुद्धिमान् ॥
सुखोष्णैरुपनाहैश्च सुस्निग्धैरुपनाहयेत् ॥ ५ ॥
अलजीरोगमें रक्त दूषित हो तो कुम्भिकाके समान उसकी चिकित्सा करनी चाहिये । ग्रथित नामक शूकदोषमें स्निग्धद्रव्योंसे रोगीको स्निग्धकर नाडीमें स्वेद प्रदान करके स्निग्ध और सुखोष्ण प्रलेप करे ॥ ५ ॥
उत्तमाख्यां तु पिडकां सञ्छिद्य बडिशोद्धताम् ।
कल्कैश्चूर्णैः कषायाणां क्षौद्रयुक्तैरुपाचरेत् ॥ ६ ॥
उत्तमानामक पिडका ( फुन्सी विशेष ) को मत्स्यधारण नामवाले यन्त्रसे उखाडकर चीरे । पश्चात् शुद्धकर उसकी कषायद्रव्योंके कल्क अथवा चूर्णको शहदमें मिलाकर लेप करे ॥ ६ ॥
क्रमः पित्तविसर्पोक्तः पुष्करीमूढयोर्हितः ।
त्वक्पाके स्पर्शहान्यां च सेचयेन्मृदितं पुनः ॥
बलातैलेन कोष्णेन मधुरैश्चोपनाहयेत् ॥ ७ ॥
पुष्करी और मूढनामक शूकदोषोंमें पित्तविसर्परोगकी समान चिकित्सा करनी चाहिये । एवं त्वक्पाकरोग और स्पर्शहानिशूकमें सेचन करे और मृदित रोगमें खिरेंटीके काय तथा कल्कद्वारा सिद्ध किये हुए तेलको थोडा गरम करके मलें अथवा मधुरादि गणकी औषधियोंसे उपनाह ( स्वेद ) देवें ॥ ७ ॥
रसक्रिया विधातव्या लिखिता शतपोनके ।
पृथक्पर्ण्यादिसिद्धं च तैलं देयमनन्तरम् ॥ ८ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०४७
शतपोनकनामक शूकदोषकी पिडिकाओंमें लेखन क्रिया करके रसक्रिया करे। एवं पृश्निपर्णी आदि औषधोंके क्वाथ और कल्कद्वारा सिद्ध कियेहुए तैलको लगावे ॥ ८ ॥
रक्तविद्रधिवच्चापि क्रियाशोणितजेऽर्बुदे ।
कषायकल्कसर्पींषि तैलं चूर्णं रसक्रियाम् ॥
शोधने रोपणे चैव वीक्ष्य वीक्ष्यावतारयेत् ॥ ९ ॥
रक्तजनित अर्बुदरोगमें रक्तज विद्रधिरोगकी चिकित्साके अनुसार चिकित्सा करे। इस रोगमें क्वाथ, कल्क, घृत, तैल, चूर्ण और रस इन सबोंको शोधन, रोपण कर्ममें अच्छे प्रकार विचारपूर्वक निरीक्षणकर प्रयोग करे ॥ ९ ॥
अर्बुदं मांसपाकं च विद्रधिं तिलकालकम् ।
प्रत्याख्याय प्रकुर्वीत भिषक् तेषां प्रतिक्रियाम् ॥ १० ॥
अर्बुद, मांसपाक, विद्रधि और तिलकालक ये असाध्य हैं अतः इन रोगोंको त्यागकर अन्यान्य शूकदोषोंकी चिकित्सा करे ॥ १० ॥
सर्वेषां शूकदोषाणां क्रियां व्रणवदाचरेत् ।
उपदंशाधिकारोक्तमौषधं शूकदोषतः ॥ ११ ॥
सर्वप्रकारके शूकदोषोंकी चिकित्सा व्रणरोगोक्त विधिके अनुसार करे और उपदंशरोगमें कही हुई औषधियाँ प्रयोग करे ॥ ११ ॥
दार्वीतैल ।
दार्वीसुरसयष्ट्याह्वगृहधूमनिशायुगैः ।
तैलमभ्यञ्जने पाने मेढ्ररोगं निवारयेत् ॥ १२ ॥
देवदारु, तुलसी, मुलहठी, घरका धुआँ, हल्दी और दारुहल्दी इनके समान भाग मिश्रित कल्कसे यथाविधि पकाये हुए तेलका पान और मालिश करनेसे लिङ्गके समस्त विकार दूर होते हैं ॥ १२ ॥
शूकदोषमें पथ्य ।
लेपो विरेकोऽसृङ्मोक्षः सर्पिःपानं च शालयः ।
यवा जाङ्गलमांसानि मुद्गयूषः कठिल्लकम् ॥ १३ ॥
पटोलं शिग्रुकर्कोटं पत्तूरं बालमूलकम् ।
वेत्राग्रमाषाढफलं दाडिमं सैन्धवं वरा ॥ १४ ॥
१०४८ भैषज्यरत्नावली । [ कुष्ठरोग-
कूपोदकं गन्धसारः कस्तूरी हिमवालुका ।
तिक्तं कषायं तैलं च स्यात्पथ्यं शूकरोगिणाम् ॥ १५ ॥
प्रलेप, विरेचन, रुधिरमोक्षण, घृतपान, शालिधान, जौ, जङ्गली जीवोंका मांस, मूँगका यूष, करेला, परवल, सहिंजनेकी फली, ककोडे, पतंगका वृक्ष, कच्ची मूली, बेंतका अग्रभाग, ढाकके बीज, अनार, सैन्धानमक, त्रिफला, कुँएका जल, सफेद-चन्दन, कस्तूरी, कपूर, तीखे कषायरसवाले द्रव्य और तेल ये सब शूकदोषवाले रोगियोंको हितकारी हैं ॥ १३-१५ ॥
शूकदोषमें अपथ्य ।
मूत्रवेगं दिवानिद्रां व्यायामं मैथुनं गुडम् ।
विदाहि गुरु तक्रं च शूकदोषामयी त्यजेत् ॥ १६ ॥
शूकदोषयुक्त रोगी मूत्रवेगको रोकना, दिनमें शयन, व्यायाम, स्त्रीप्रसङ्ग करना, गुड, दाहकारक, गुरुपाकी अन्न, मट्ठेका सेवन इन सबोंको त्यागदेवे ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां शूकदोषचिकित्सा ।
कुष्ठरोगकी चिकित्सा ।
वातोत्तरेषु सर्पिर्वमनं श्लेष्मोत्तरेषु कुष्ठेषु ।
पित्तोत्तरेषु मोक्षो रक्तस्य विरेचनं श्रेष्ठम् ॥ १ ॥
प्रच्छन्नमल्पे कुष्ठे महति च शस्तं शिराव्यधनम् ।
बहुदोषः संशोध्यः कुष्ठी बहुशोऽनुरक्षता प्राणान् ॥ २ ॥
वाताधिक्य कुष्ठरोगमें प्रथम घृतपान, कफाधिक्य कुष्ठमें वमन कराना और पित्ताधिक्य कुष्ठमें रक्तमोक्षण एवं विरेचन कराना हितकारी है । अल्पकुष्ठरोगमें पँछनेके द्वारा अथवा जोंकके द्वारा रक्तमोक्षण करे और महाकुष्ठमें शिराको वेधकर दूषित रक्त निकाले । कुष्ठरोगी यत्नपूर्वक प्राणोंकी रक्षा करता हुआ सम्पूर्ण दोषोंको शुद्ध करे ॥ १ ॥ २ ॥
ये लेपाः कुष्ठानां युज्यन्ते निर्गतास्रदोषाणाम् ।
संशोधिताशयानां सद्यः सिद्धिर्भवेत्तेषाम् ॥ ३ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०४९
जिनका दूषित रक्त निकल गया है और वमन, विरेचनके द्वारा जिनका आमाशय शुद्ध होगया है ऐसे कुष्ठरोगियोंको कुष्ठरोगनाशक प्रलेप करनेसे शीघ्र हीं सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ३ ॥
दूर्वाभयासैन्धवचक्रमर्दकुठेरकाः काञ्जिकतक्रपिष्टाः ।
एभिः प्रलेपैरपि बद्धमूलं कण्डूं च दद्रूं च निवारयन्ति ॥४॥
दूब, हरड, सेंधानमक, चकवड और वनतुलसी इनको एकत्र काँजो अथवा मट्ठेके साथ पीसकर लेप करे । इस प्रकार लेप करनेसे बद्धमूल खुजली और दाद-रोग नष्ट होता है ॥ ४ ॥
तुल्यो रसः शालतरोस्तुषेण सचक्रमर्दोऽप्यभयाविमिश्रः ।
पानीयभक्तेन तदम्बुपिष्टो लेपः कृतो दद्रुगजेन्द्रसिंहः ॥५॥
राल, धानोंकी भूसी, चकवड, हरड और माँड इन सबोंको समान भाग लेकर माँडमें पीसकर लेप करे तो यह औषधि दादरूपी गजेन्द्रको सिंहके समान नष्ट करता है ॥ ५ ॥
विडङ्गैडगजाकुष्ठनिशासिन्धूत्थसर्षपैः ।
धान्याम्लपिष्टैर्लेपोऽयं दद्रुकुष्ठविनाशनः ॥ ६ ॥
वायविडङ्ग, चकवड, कूठ, हल्दी, सेन्धानमक और सफेद सरसों इनको काँजीमें पीसकर लेप करनेसे दद्रुकुष्ठ दूर होता है ॥ ६ ॥
एडगजकुष्ठसैन्धवसौवीरसर्षपैः कृमिघ्नैः ।
कृमिसिध्मदद्रुमण्डलकुष्ठानां नाशनो लेपः ॥ ७ ॥
पमार, कूठ, सेंधानोन, कांजी, सरसों और वायविडंग इन सबोंको एकत्र पीस-कर लेप करनेसे कृमि, सिध्म, दद्रुमण्डल, कोढ इत्यादिरोग जाय ॥ ७ ॥
पर्णानि पिष्ट्वा चतुरङ्गुलस्य तक्रेण पर्णान्यथ काकमाच्याः ।
तैलाक्तगात्रस्य नरस्य कुष्ठान्युद्वर्त्तयेद्वश्वहनच्छदैश्च ॥ ८ ॥
शरीरमें तेलकी मालिश करके अमलतासके पत्तोंका अथवा मकोयके पत्तोंकों मट्ठेमें पीसकर किम्वा कनेरके पत्तोंको पीसकर लेपकरे तो कुष्ठरोग नष्ट होता है ॥
विडङ्गसैन्धवशिवाशशिरेखासर्षपकरञ्जनीमिश्र ।
गोजलपिष्टो लेपः कुष्ठहरो दिवसनाथसमः ॥ ९ ॥
| १०५० | भैषज्यरत्नावली । | [ कुष्ठरोग- |
|---|
वायविडङ्ग, सैंधानमक, हरड, सोमराजीके बीज, सफेद सरसों, करञ्जुओ और हल्दी इनको बराबर २ लेकर एकत्र गोमूत्रमें पीसकर लेप करनेसे कुष्ठरोग इस प्रकार नष्ट होजाता है जिसप्रकार सूर्य्यसे अन्धकारसमूह दूर होता है ॥
कासमर्दमूलं च काञ्जिकेन प्रपेषितम् ।
दद्रुकिटिभकुष्ठानि जयेदेतत्प्रलेपनात् ॥ १० ॥
कसौंदीकी जडको काँजीके साथ पीसकर लेप करनेसे दाद, किटिभ और कोढ़ नष्ट होते हैं ॥ १० ॥
आरग्वधस्य पत्राणि आरनालेन पेषयेत् ।
दद्रुकिटिभकुष्ठानि निहन्ति सिध्ममेव च ॥ ११ ॥
अमलतासके पत्तोंको काँजीमें पीसकर लेप करे तो दाद, किटिभ, कुष्ठ और सिध्मकुष्ठरोग दूर होते हैं ॥ ११ ॥
चक्राह्वयं स्नुहीक्षीरं भावितं मूत्रसंयुतम् ।
रवितप्तं हि किञ्चित्तु लेपनं किटिभापहम् ॥ १२ ॥
चकवडके बीजोंको थूहरके दूधमें ७ दिनतक भावना देकर गोमूत्रमें पीसलेवे । फिर उसको धूपमें कुछ गरम करके लेप करे तो किटिभकुष्ठ जाता है ॥ १२ ॥
शिखरिरसेन सुपिष्टं मूलकबीजं प्रलेपितं सिध्म ।
क्षारेण वा कदल्या रजनीमिश्रेण नाशयति ॥ १३ ॥
मूलीके बीजोंको चिरचिटेके पत्तोंके रसमें बारीक पीसकर अथवा केलेके खारके साथ हल्दीको पीसकर लेप करनेसे सिध्मकुष्ठ शमन होता है ॥ १३ ॥
सक्षारं गन्धकं लेपात्कटुतैलेन सिध्मजित् ।
कासमर्दकबीजानि मूलकानां तथैव च ॥
गन्धाश्मचूर्णमिश्राणि सिध्मानां परमौषधम् ॥ १४ ॥
जवाखार और गन्धकको समान भाग लेकर सरसोंके तेलमें पीसकर लेप करें अथवा कसौंदीके बीज, मूलीके बीज और गन्धक इनको बराबर २ लेकर काँजीमें पीसकर लेप करे । यह सिध्मकुष्ठ रोगको नष्ट करनेके लिये परमोत्कृष्ट औषधि है ॥ १४ ॥
कुष्ठं मूलकबीजं प्रियङ्गवः सर्षपास्तथा रजनी ।
एतत्केशरषष्ठं निहन्ति बहुवार्षिकं सिध्म ॥ १५ ॥
कूठ, मूलीके बीज, फूलप्रियंगु, सफेद सरसों, हल्दी और नागकेशर इनको एकत्र पीसकर लेप करे तो इससे बहुत दिनोंका पुराना सिध्मकुष्ठ नष्ट होता है ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०५१
नीलकुरण्टकपत्राैरालिप्य गात्रमतिबहुशः ।
लिम्पन्मूलकबीजैः पिष्टैस्तकेण सिध्मनाशाय ॥ १६ ॥
नीलीकटसरैयाके पत्तोंको पीसकर बारबार शरीरपर लेप करे । पश्चात् मूलीके बीजोंको मट्ठेके साथ पीसकर प्रलेप करे तो सिध्मकुष्ठ दूर होता है ॥ १६ ॥
एडगजतिलसर्षपकुष्ठं मागधिकालवणत्रयमस्तु ।
पूतिकृतं दिवसत्रयमेतद्धन्ति विचार्चिकदद्रुककुष्ठम् ॥ १७॥
चकवडके बीज, तिल, सफेद सरसों, कूठ, पीपल, सेंधानमक, कालानमक और विरियासञ्चर नमक इन सबोंको समान भाग लेकर दहीके तोडमें ३ दिनतक भिगो-देवे । जब उसमें दुर्गन्ध आनेलगे तब पीसकर लेप करे तो इससे विचार्चिका, दद्रु और कुष्ठरोग नष्ट होते हैं ॥ १७ ॥
सिन्दूरमरिचचूर्णं महिषीनवनीतसंयुतं बहुशः ।
लेपान्निहन्ति पामां तैलं करवीरसिद्धं वा ॥ १८ ॥
सिन्दूर और कालीमिरचोंके चूर्णको भैंसके नैनीघीमें मिलाकर बारबार लेप करनेसे अथवा कनेरकी जडके कल्कद्वारा पकाकर तेलको मलनेसे पामा (खुजली) रोग दूर होता है ॥ १८ ॥
पारदं शङ्खगन्धं च शिला चोत्तरवारुणी ।
प्रपुन्नाटश्च सर्पाक्षी मेघनादाग्निलाङ्गली ॥ १९ ॥
भल्लातं गृहधूमं च मुनिगुञ्जा स्नुहीपयः ।
अरिष्टं च गुडक्षौद्रं वाकुचीबीजतुल्यकम् ॥ २० ॥
गोमूत्रैरारनालैर्वा पिष्ट्वा लेपं च कारयेत् ।
दद्रूमण्डलकण्डूं च विचार्चिं च विनाशयेत् ॥ २१ ॥
पारा, गन्धक, शंखभस्म, मैनसिल, इन्द्रायनकी जड, पमारके बीज, गन्धनाकुली, ढाककी जड, चीतेकी जड, कलिहारी, भिलावे, घरका धुवाँ, अगस्तियाकी जड, चौंटली, थूहरका दूध, नीमकी छाल, पुराना गुड, शहद, बापचीके बीज इन सबोंको समान भाग लेकर गोमूत्र अथवा काँजीके साथ पीसकर लेप करे । यह प्रयोग दद्रुमण्डल, खुजली और विचार्चिकाको नष्ट करता है ॥ १९-२१ ॥
मनःशिलाले मरिचं तैलमार्कं पयः कुष्ठहरः प्रलेपः ॥ २२ ॥
मैनसिल, हरिताल, कालीमिरच, तिलतैल और आकका दूध इनको एकत्र मिलाकर लेप करनेसे कुष्ठरोग दूर होता है ॥ २२ ॥
| १०५२ | भैषज्यरत्नावली । | [ कुष्ठरोग- |
|---|
विषवरुणहरिद्राचित्रकागारधूमं
ह्यनलमरिचदूर्वाः क्षीरमर्कस्नुहीभ्याम् ।
दहति पतितमात्रं कुष्ठजातीरशेषाः
कुलिशमिव सुरोषाच्छक्रहस्ताद्विमुक्तम् ॥ २३ ॥
विष, वरनाकी छाल, हल्दी, चीता, गृहधूम, भिलावे, कालीमिरच, दूब इन सबोंको एकत्र आकके दूध और थूहरके दूधमें अच्छेप्रकार खरल करके लेप करें तो सर्वप्रकारके कुष्ठरोग इसके लगातेही इसप्रकार नष्ट होजाते हैं जिस प्रकार अत्यन्तक्रोधसे छोडा हुआ इन्द्रका वज्र वृक्षसमूहको नष्ट करदेता है ॥ २३ ॥
भल्लातकं द्वीपिसुधार्कमूलं गुञ्जाफलं त्र्यूषणशङ्खचूर्णम् ।
तुत्थं सकुष्ठं लवणानि पञ्च क्षारद्वयं लाङ्गलिकां च पक्त्वा २४
स्नुह्यर्कदुग्धे घनमायसस्थं शलाकया तद्विदधीत लेपम् ।
कुष्ठे किलासे तिलकालके चाप्यशेषदुर्नामसु चर्मकीले ॥ २५ ॥
भिलावे, चीता, थूहरकी जड, आककी जड, घोंटली, सोंठ, मिरच, पीपल, शंखचूर्ण, तूतिया, कूट, पाँचों नमक, जवाखार, सज्जी और कलिहारी इन औषधियोंके समान भाग चूर्णको थूहरके दूध और आकके दूधके साथ लोहेके स्वच्छ पात्रमें पकाकर उत्तम पात्रमें भरकर रखदेवे । इस मरहमको किलास, तिलकालक और चर्मकीलनामक कुष्ठ एवं बवासीररोगमें सलाई द्वारा लगानेसे उक्त रोग शीघ्र नष्ट होते हैं ॥ २४ ॥ २५ ॥
स्नुक्काण्डे सुषिरे दग्ध्वा गृहधूमं ससैन्धवम् ।
अन्तर्धूमं तैलयुक्तं लेपाद्धन्ति विचर्चिकाम् ॥ २६ ॥
थूहरके मुद्देमें घरका धुआँ और सैंधानमक भरकर पुटपाककी रीतिसे अग्निमें भस्म करे । फिर उसको सरसोंके तेलमें मिलाकर लेप करनेसे विचर्चिकानामक कुष्ठ दूर होता है ॥ २६ ॥
स्नुक्काण्डे सर्षपात्कल्कः करीषानलपाचितः ।
लेपाद्विचर्चिकां हन्ति रागवेग इव त्रपाम् ॥ २७ ॥
थूहरकी शाखामें सरसोंका कल्क भरकर आरने उपलोंकी अग्निमें पकावें । पश्चात् उसको सरसोंके तेलमें मिलाकर लेप करनेसे विचर्चिकारोग इस प्रकार नष्ट होता है जिस प्रकार प्रीतिका वेग लज्जाको दूर करदेता है ॥ २७ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०५३
नारिकेलोदरे न्यस्तस्तण्डुलः पूतितां गतः ।
लेपाद्विपादिकां हन्ति चिरकालानुबन्धिनीम् ॥ २८ ॥
जलपूर्ण नारियलमें चावलोंको भिगोदेवे। जब वह अच्छे प्रकार फूल जाँय और दुर्गन्ध आनेलगे तब पीसकर लेप करनेसे बहुत दिनोंका पुराना विपादिका-कुष्ठ नष्ट होता है ॥ २८ ॥
तिलकुसुमंलवणंगोजलकटुतैलं लौहभाजने कृत्वा ।
शोषितमर्कमयूखैः पादस्फुटनं निहन्ति लेपेन ॥ २९ ॥
तिलपुष्प और सेंधानमक इन दोनोंको बराबर २ लेकर गोमूत्र और सरसोंके तेलके साथ लोहेके बर्त्तनमें उत्तम प्रकार खरल करे। फिर उसको धूपमें सुखाकर लेप करे तो पादस्फुटन कुष्ठरोग शमन होता है ॥ २९ ॥
अवल्गुजं कासमर्दं चक्रमर्दं निशायुगम् ।
माणिमन्थं च तुल्यांशं मस्तुकाञ्जिकपेषितम् ।
कण्डूं कच्छुं जयत्युग्रां सिद्ध एष प्रयोगराट् ॥ ३० ॥
बापची, कसौंदी, चकवड, हल्दी, दारुहल्दी और सैन्धानमक इन सबोंको समान भाग लेकर दहीके तोड और काँजीमें पीसकर लेप करे तो यह प्रयोग खुजली और अत्युग्र कच्छूनामक कुष्ठको नष्ट करता है ॥ ३० ॥
वायस्येडगज कुष्ठकृष्णाभिर्गुडिका कृता ।
बस्तमूत्रेण संपिष्टा लेपाच्छ्वित्रविनाशिनी ॥ ३१ ॥
मकोय, चकवड, कूठ और पीपल इनको एकत्र बकरेके मूत्रमें खरल करके गोली बनालेवे। इस गोलीको घिसकर लगानेसे श्वित्रकुष्ठ दूर होता है ॥ ३१ ॥
पूतीकार्कस्नुङ्नरेन्द्रद्रुमाणां मूत्रैः पिष्टाः पल्लवाः सौमनाश्च ।
लेपाच्छ्वित्रं हन्ति दद्रुव्रणांश्च कुष्ठान्यर्शांस्यस्रनाडीव्रणांश्च ॥
पूतिकरञ्ज, आक, थूहर, अमलतास और चमेली इन वृक्षोंके कोमल पत्तों और फूलोंको गोमूत्रमें पीसकर लेप करनेसे श्वित्रकुष्ठ, दाद, व्रण, कुष्ठ, बवासीर, रक्त-विकार, नासूर आदि रोग नष्ट होते हैं ॥ ३२ ॥
गजचित्रव्याघ्रचर्ममसीतैलावलेपनात् ।
श्वित्रं नाशं व्रजेत्किं वा पूतिकीटविलेपनात् ॥ ३३ ॥
हाथी, चीता और सिंह इनकी चर्मकी भस्मको सरसोंके तेलमें मिलाकर लेप करनेसे अथवा पिद्दे नामक कीडेकी तेलमें मर्दन कर लेप करनेसे सफेद कोढ दूर होता है ॥ ३३ ॥
१०५४ भैषज्यरत्नावली । [ कुष्ठरोग-
कुडवं वागुजीबीजं हरितालपलान्वितम् ।
गवां मूत्रेण संपिष्य लेपनाच्छ्वित्रनाशनम् ॥ ३४ ॥
बापचीके बीज १६ तोले और हरिताल चार तोले इन दोनोंको एकत्र गोमूत्रमें पीसकर लगानेसे श्वेतकुष्ठका नाश होता है और त्वचाका वर्ण पूर्ववत् स्वच्छ होजाता है ॥ ३४ ॥
धात्रीखदिरयोः काथं पीत्वा च मधुसंयुतम् ।
शङ्खकुन्देन्दुधवलं जयेच्छ्वित्रं न संशयः ॥ ३५ ॥
धात्रीखदिरयोः क्वाथमवल्गुजरजोऽन्वितम् ।
पीत्वा शंखेन्दुकुन्दाभं हन्ति श्वित्रं न संशयः ॥ ३६ ॥
आमले और खैरका काढा बनाकर शहदमें मिलाकर पान करनेसे अथवा उक्त औषधियोंके क्वाथमें बापचीका चूर्ण डालकर पीनेसे शंख, चमेली और चन्द्रमाकी समान सफेद कुष्ठरोग निस्सन्देह नष्ट होता है ॥ ३५ ॥ ३६ ॥
क्षारे सुदग्धे गजलण्डजे च गजस्य मूत्रेण बहुस्रुते च ।
द्रोणप्रमाणं दशभागयुक्तं दत्त्वा पचेद्वीजमवल्गुजस्य ॥ ३७ ॥
एतद्यदा चिक्कणतामुपैति तदा सुसिद्धां गुडिकां प्रकुर्यात् ।
श्वित्रं प्रलिम्पेदथ तेन घृष्टं तदा व्रजत्याशु सवर्णभावम् ॥ ३८ ॥
हाथीकी लीदकी भस्मको १६ सेर लेकर हाथीके ९६ सेर मूत्रमें पकावे । जब पकते पकते बत्तीस सेर जल शेष रहजाय तब उस क्षार जलको ७ बार या २१ बार हाथीके मूत्रमें टपका लेवे । पश्चात् उक्त एक द्रोण परिणाम क्षार जलमें दशवां भाग बापचीके बीजोंका चूर्ण डालकर उत्तम प्रकार पकावे । जब वह पकते पकते चिकनासा होजाय तब सिद्धहुआ जानकर नीचे उतारकर गोलियाँ बनालेवे । प्रथम श्वेतकुष्ठवाले स्थानको खुजलाकर फिर इस गोलीका लेप करे तो सफेद कोढ बहुत शीघ्र दूर होता है और स्थानकी त्वचा उत्तमवर्णवाली होजाती है ॥ ३७ ॥ ३८ ॥
श्वेतजयन्तीमूलं पीतं पिष्टं तदा च पयसैव ।
श्वित्रं निहन्ति नियतं रविवारे वैद्यनाथाज्ञा ॥ ३९ ॥
वैद्यनाथजीकी आज्ञासे रविवारके दिन सफेद जयन्तीकी जडको लाकर दूधके साथ पीसकर पीनेसे श्वेतकुष्ठ निश्चय नाश होता है ॥ ३९ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०९५
गुञ्जाफलाग्निचूर्णं तु लेपितं श्वेतकुष्ठनुत् ।
शिलापामार्गभस्मापि लिप्तं श्वित्रं विनाशयेत् ॥ ४० ॥
चोंटली और चीतेकी जडका चूर्ण अथवा मैनसिल और चिरचिटेकी भस्मको एकत्र पीसकर लेप करनेसे श्वेतकुष्ठरोग नष्ट होता है ॥ ४० ॥
पिबति सकटुतैलं गन्धपाषाणचूर्णं
रविकिरणसुतप्तं पामनो यः पलार्द्धम् ।
त्रिदिनतदनुसिक्तः क्षीरभोजी च शीघ्रं
भवति कनकदीप्तिः कामरूपी मनुष्यः ॥ ४१ ॥
यदि दो तोले शुद्ध आमलासारगन्धकको सरसोंके तेलमें मिलाकर और धूपमें सुखाकर तीन दिन अथवा सातदिनतक पीवे, मालिश करे एवं दूधका भोजन करता रहे तो वह मनुष्य पामारोगसे मुक्त होकर सुवर्णकी समान कान्तिमान् तथा काम-देवकी समान रूपवान् होता है ॥ ४१ ॥
तीव्रेण कुष्ठेन परीतदेहो यः सोमराजीं नियमेन खादेत् ।
संवत्सरं कृष्णतिलद्वितीयां स सोमराजीं वपुषाऽधिशेते ॥ ४२ ॥
अत्यन्त तीक्ष्ण कुष्ठके होनेसे जिसका शरीर विकृत होगया हो वह रोगी वापची और काले तिल इनको समान भाग लेकर बनाकर प्रतिदिन नियमसे एक वर्षपर्यन्त सेवन करे तो कुष्ठका नाश होकर उसका शरीर चंद्रमाकी समान उज्ज्वल कांतियुक्त होजाता है ॥ ४२ ॥
घर्मसेवी कदुष्णेन वारिणा वाकुचीं पिबेत् ।
क्षीरभोजी त्रिसप्ताहात्कुष्ठी कुष्ठं व्यपोहति ॥ ४३ ॥
अवल्गुजाद्वीजकर्षं पीत्वा कोष्णेन वारिणा ।
भोजनं सर्पिषा कार्यं सर्वकुष्ठविनाशनम् ॥ ४४ ॥
कुष्ठरोगी धूपको सेवन करता हुआ वापचीके चूर्णको मन्दोष्ण जलके साथ पान करे और निरन्तर दूधका भोजन करे तो सातदिनमें ही कुष्ठरोग नष्ट हो जाता है । बाकुचीके बीजोंके १ तोला चूर्णको गुनगुने जलके साथ पीवे और घृतके साथ भोजन करे तो सर्वप्रकारके कुष्ठ नाश होते हैं ॥ ४३ ॥ ४४ ॥
छिन्नायाः स्वरसो वापि सेव्यमानो यथाबलम् ।
जीर्णे घृतेन भुञ्जीत मुद्गयूषौदनेन च ॥ ४५ ॥
अतिपूतिशरीरोऽपि दिव्यरूपी भवेन्नरः ॥ ४६ ॥
१०५६ भैषज्यरत्नावली । [ कुष्ठरोग-
अपनी अग्निके बलानुसार प्रतिदिन गिलोयके रसको पान करे। उसके पचनेपर घृतामिश्रित मूँगका यूष और भातका भोजन करे तो इससे अत्यन्त दुर्गन्धि युक्त कुष्ठ भी दूर होकर शरीर विशेषकान्तिमान् होजाता है ॥ ४५ ॥ ४६ ॥
यः खादेदभयारिष्टमरिष्टामलकानि वा ।
स जयेत्सर्वकुष्ठानि मासादूर्द्धं न संशयः ॥ ४७ ॥
जो हरडके चूर्ण और नीमके पत्तोंके चूर्णको अथवा नीमके पत्ते और आमलोंके चूर्णको एकत्र पीसकर यथानियम एक महीनेतक सेवन करे तो वह सर्वप्रकारके कुष्ठरोगोंसे शीघ्र मुक्त होता है। इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ ४७ ॥
आरग्वधादि ।
आरग्वधं धातकिकर्णिकारधवार्जुनैः सर्जककिंशुकानाम् ।
कदम्बनिम्बकुटजाटरूषाः खदिरेण युक्ताश्च तथैव मूर्वा ॥ ४८ ॥
मूलानि चैषामुपहृत्य सम्यगष्टावशेषः क्वथितः कषायः ।
घृतेन तुल्यं प्रतिमानमस्य निहन्ति सर्वाणि शरीरजानि ॥
कुष्ठानि सर्वाणि विसर्पदद्रुविचर्चिका हन्ति नरस्य शीघ्रम् ॥ ४९ ॥
अमलतास, धायके फूल, कर्णिकार पुष्पविशेष, धौंवृक्ष, अर्जुन, सालवृक्ष, ढाक, कदम, नीम, कुडा, अडूसा, खैर, मूर्वा इन सब वृक्षोंकी जडको समान भाग लेकर अठगुने जलमें अच्छे प्रकार पकावे। जब पकते पकते आठमांश जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे। फिर इस क्वाथमें समान भाग घृत मिलाकर पान करनेसे विसर्प, दद्रु और विचार्चिका आदि सर्व प्रकारके कुष्ठरोग तत्काल नष्ट होते हैं ॥ ४८ ॥ ४९ ॥
लघुमञ्जिष्ठादि ।
मञ्जिष्ठात्रिफलातिक्तावचादारुनिशाभयाः ।
निम्बश्चैव कृतः क्वाथः सर्वकुष्ठं विनाशयेत् ॥ ५० ॥
वातरक्तं तथा कण्डुं पामानं रक्तमण्डलम् ।
दद्रुवीसर्पविस्फोटं पानाभ्यासेन नाशयेत् ॥ ५१ ॥
मंजीठ, त्रिफला, कुटकी, वच, दारुहल्दी, हरड और नीमकी छाल इनका क्वाथ बनाकर सेवन करनेसे समस्त कुष्ठ, वातरक्त, कण्डू, पामा, रक्तमण्डल, दाद, विसर्प और विस्फोट आदि विकार दूर होते हैं ॥ ५० ॥ ५१ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहितः । १०५७
मध्यममञ्जिष्ठादि ।
मञ्जिष्ठा वागुजी चक्रमर्दश्च पिचुमर्दकः ।
हरीतकी हरिद्रा च धात्री वासा शतावरी ॥ ५२ ॥
बलानागबला यष्टिमधुकं क्षुरकोऽपि च ।
पटोलं च लतोशीरं गुडूचीं रक्तचन्दनम् ॥ ५३ ॥
मञ्जिष्ठादिरयं काथो मध्यः कुष्ठविनाशनः ।
वातरक्तस्य संहर्त्ता कण्डूमण्डलनाशनः ॥ ५४ ॥
मंजीठ, बापची, चकवड, नीमकी छाल, हरड, हल्दी, आमले, अडूसा, शतावर, खिरेंटी, गंगेरन, मुलहठी, गोखुरू, परवल, खस, गिलोय और लाल चन्दन इनका समान भाग ले यथाविधि काथ बनाकर सेवन करे । यह मध्यम मञ्जिष्ठादि काथ सर्व प्रकारके कोढ, वातरक्त और खुजली, चकत्ते आदि रोगोंका नाश करनेवाला है ॥ ५२–५४ ॥
बृहन्मञ्जिष्ठादि ।
मञ्जिष्ठा कुटजाऽमृता घनवचा शुण्ठी हरिद्राद्वयं
क्षुद्रारिष्टपटोलतिक्तकटुका भार्ङ्गी विडङ्गाम्लिकम् ।
मूर्वा दारु कलिङ्गभृङ्गमगधात्रायन्ति पाठा वरी
गायत्री त्रिफला किरातकमहानिम्बासनारग्वधाः ॥ ५५ ॥
श्यामावल्गुजचन्दनं वरुणकं दन्तीकशाखोटकं
वासापर्पटशारिवाप्रतिविषाऽनन्ता विशाला जलम् ॥ ५६ ॥
मंजीठ, कुडा, गिलोय, नागरमोथा, वच, सोंठ, हल्दी, दारुहल्दी, कटेरी, नीमकी छाल, परवल, कुटकी, भारङ्गी, वायविडङ्ग, इमलीकी छाल, मूर्वा, देवदारु, इन्द्रजौ, भाँगरा, पीपल, त्रायमाणलता, पाढ, शतावर, खैर, त्रिफला, चिरायता, बकायन, विजयसार, अमलतास, फूलप्रियंगु, बापची, लालचन्दन, बरनाकी छाल, दन्तीकी जड, सहोरावृक्षकी छाल, अडूसा, पित्तपापडा, कालीसर, अतीस, धमासा, इन्द्रायन, और सुगन्धवाला, इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर विधिपूर्वक काथ बनावे ॥ ५५ ॥ ५६ ॥
मञ्जिष्ठाप्रथमं कषायमिति यः संसेवते तस्य तु
त्वग्दोषाः सुचिरेण यान्ति विलयं कुष्ठानि चाष्टादश ।
५७
१०५८ भैषज्यरत्नावली । [ कुष्ठरोग-
नाशं गच्छति वातरक्तमखिला नश्यन्ति रक्तामया वीसर्पस्त्वचि शून्यता नयनजा रोगाः प्रशाम्यन्ति च५७॥
इस क्वाथको प्रतिदिन नियमानुसार सेवन करनेसे त्वचासम्बन्धी सर्वरोग, अष्टादश कुष्ठ, सम्पूर्ण वातरक्त तथा रक्तसम्बन्धी अन्यान्य विकार, विसर्प, त्वचाकी सुन्नी एवं नेत्रोंके सर्वप्रकारके रोग बहुत शीघ्र नष्ट होजाते हैं ॥ ५७ ॥
पञ्चनिम्ब १-२ ।
निम्बस्य पत्रं मूलानि सत्वक्पुष्पफलानि च । चूर्णितानि घृतक्षौद्रसंयुतानि दिने दिने ॥ ५८ ॥ लिह्यात्पिबेद्वा मूत्रेण संयुक्तान्युदकेन वा । मदिरामलतोयेन पयसा वा यथाबलम् ॥ ५९ ॥ भुञ्जीत घृतयूषाद्यैः शाल्यन्नं पयसापि वा । सर्वकुष्ठविसर्पार्शोनाडीदुष्टव्रणानपि ॥ ६० ॥ कामलां च गदान्हन्यात्तथा पित्तकफास्रजान् । संवत्सरप्रयोगेण सर्ववर्ज्यविवर्जितः ॥ जयत्येतत्पञ्चनिम्बं रसायनमनुत्तमम् ॥ ६१ ॥
१—नीमके पत्ते, जड, छाल, फूल, और फल इन सबोंको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको घी, शहद, गोमूत्र, जल, मद्य, आमलोंके क्वाथ अथवा दूधके साथ मिलाकर अपनी अग्निके बलानुसार प्रतिदिन नियमपूर्वक सेवन करे । इसको अविच्छिन्न रूपसे एक वर्षतक सेवन करनेसे सर्वप्रकारके कोढ, विसर्प, बवासीर, दुष्ट नाडीव्रण, कामला, पित्त-कफ और रुधिरके विकारोंसे उत्पन्न होनेवाले रोग एवं अन्यान्य विविधभाँतिके रोगसमूह नष्ट होते हैं । इसपर घृत, दुग्ध, मूँगका यूष और शालिचावलोंका भात पथ्यरूपसे खाना चाहिये तथा मछली, खटाई और शाकादि द्रव्य त्यागदेने चाहिये । यह पञ्चनिम्ब अत्युत्तम रसायन है ॥ ५८-६१ ॥
पुष्पकाले च पुष्पाणि फलकाले फलानि च । सञ्चूर्ण्य पिचुमर्दस्य त्वङ्मूलानि दलानि च ॥ ६२ ॥ द्विरंशानि समाहृत्य भागिकानि प्रकल्पयेत् । त्रिफला व्युषणं ब्राह्मी श्वदंष्ट्रारुष्कराभ्रिकाः ॥ ६३ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहितं । १०५९
विडङ्गसारवाराहीलौहचूर्णामृताः समाः ।
हरिद्राद्वयवाकूचीव्याधिघाताः सशर्कराः ॥ ६४ ॥
कुष्ठेन्द्रयवपाठाश्च कृत्वा चूर्णं सुसंयुतम् ।
खदिरासननिम्बानां घनक्वाथेन भावयेत् ॥ ६५ ॥
सप्तधा पञ्चनिम्बं च मार्कवस्वरसेन च ।
स्निग्धशुद्धतनुर्धीमान् योजयेच्च शुभे दिने ॥ ६६ ॥
मधुना तिक्तहविषा खदिरासनवारिणा ।
सेव्यमुष्णाम्बुना वापि कोलवृद्धया पलं पिबेत् ॥ ६७ ॥
जीर्णे च भोजनं कार्यं स्निग्धं लघु हितं च यत् ॥६८॥
२-नीमके फूल, फल, छाल, पत्ते और मूल ये प्रत्येक दो दो तोले लेकर बारीक चूर्ण करलेवे । उस चूर्णको भाँगरेके रसमें ७ बार भावना देवे । ( इसमें फूलोंके समयमें फूल और फलोंके समयमें फल संग्रह करके रखलेने चाहिये । ) फिर हरड, बहेडा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, ब्राह्मी, गोखुरू, भिलावे (अथवा लालचन्दन चीता, वायविडङ्गका सार, वाराहीकन्द, लोहचूर्ण गिलोय, हल्दी, दारुहल्दी, वापची, अमलतास, मिश्री, कूठ, इन्द्रजौ और पाठ इन सबोंको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण बनाले फिर उस चूर्णको खैर, विजयसार और नीमकी छालके गाढें क्वाथमें ७ बार भावना देवे । पश्चात् भाँगरेके रसमें ७ बार भावित करे । फिर पूर्वोक्त पञ्चनिम्बका चूर्ण दो भाग और इन हरडादि औषधोंके चूर्णको एक भाग लेकर दोनोंको एकत्र करके शहदमें किंवा पञ्चतिक्त घृतमें या खैर तथा विजयसार के क्वाथमें अथवा मन्दोष्ण जलके साथ मिलाकर शुभदिनमें सेवन करे । इस औषधिको सेवन करानेसे पूर्व बुद्धिमान् वैद्य रोगीके शरीरको वमन और विरेचनादि से शुद्ध करके स्निग्धक्रियाद्वारा स्निग्धकर लेवे । पश्चात् इसका उपयोग करना चाहिये और इसकी मात्राको १ तोलेसे लेकर ४ तोलेतक बढाना चाहिये । जब यह अवलेह पचजाय तब हल्का स्निग्ध और हितकारी भोजन करना श्रेष्ठ है ॥ ६२-६८ ॥
विचर्चिकोडुम्बरपुण्डरीककापालदद्रुं किटिभालसादि ।
शतारुविस्फोटविसर्पपामाः कुष्ठप्रकोपं विविधं किलासम् ॥ ६९ ॥
भगन्दरं श्लीपदवातरक्तं जडान्ध्यनाडीव्रणशीर्षरोगान् ।
सर्वान्प्रमेहान्प्रदरांश्च सर्वान् दंष्ट्राविषं मूलविषं निहन्ति ॥७०॥
१०६० भैषज्यरत्नावली । [ कुष्ठरोग-
स्थूलोदरः सिंहकृशोदरश्च सुश्लिष्टसन्धिर्मधुनोपयोगात् । समोपयोगादपि ये दशन्ति सर्पादयो यान्ति विनाशमाशु ॥ जीवेच्चिरं व्याधिजराविमुक्तः शुभे रतश्चन्द्रसमानकान्तिः ॥७१॥
यह अवलेह विचर्चिका, औदुम्बर, पुण्डरीक, कापाल, दद्रु, किटिभ, अलस आदि, शतारु, विस्फोट, विसर्प, खुजली, कुष्ठका प्रकोप, अनेकप्रकारके किलासकुष्ठ, भगन्दर, श्लीपद, वातरक्त, जडता, अन्धता, नासूर, शिरकी पीडा, सर्वप्रकारके प्रमेह, सर्वप्रकारके प्रदर, सर्वप्रकारके स्थावर और जंगम विषोंको बहुत शीघ्र नष्ट करता है । इस अवलेहको शहदमें मिलाकर चाटनेसे बहुत मोटे पेटवाले मनुष्य सिंहकी समान पतले पेटवाले होजाते हैं और उनकी सन्धियें एवं पुट्ठे अत्यन्त दृढ़ होजाते हैं। इसके सेवनकर्ता पुरुषको जो सर्पादि विषधर जन्तु काट खायँ तो वे सर्पादि तत्काल मरजाते हैं और वह पुरुष सम्पूर्ण रोग एवं बुढ़ापेके चंगुलसे छूटकर बहुत समयतक जीता है तथा चन्द्रमाकी समान अत्यन्त सुन्दर शरीरकी कान्ति होजाती है ॥ ६९-७१ ॥
श्वेतारि ।
शुद्धसूतं समं गन्धं त्रिफलां भृङ्गवागुजीम् ।
भल्लातकं तिलं कृष्णं निम्बबीजं समं समम् ॥ ७२ ॥
मर्दयेद्भृङ्गजद्रावैः शोष्यं पेष्यं पुनः पुनः ।
इत्थं कुर्यात्त्रिसप्ताहं रसः श्वेतारिको भवेत् ॥ ७३ ॥
मध्वाज्यैर्निष्कमात्रं तु खादेच्छ्वेतं विनाशयेत् ॥ ७४ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, हरड, बहेडा, आमला, भाँगरा, बापचीके बीज, भिलावे, कालेतिल और नीमकी निबौली इनको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । फिर उस चूर्णको भाँगरेके रसमें भावना देवे और सुखालेवे । इस प्रकार २१ दिन तक करे । फिर खूब बारीक पीसकर चार चार माशेकी गोलियां बनालेवे । प्रतिदिन एक एक गोली शहद और घीमें मिलाकर सेवन करनेसे श्वेतकुष्ठ शीघ्र दूर होता है ॥ ७२-७४ ॥
तालकेश्वररस ।
कूष्माण्डत्रिफलातैलकन्याकाञ्जिकभावितम् ।
तालकं तुल्यगन्धं स्यादर्द्धपारदमर्दितम् ॥ ७५ ॥
| चिकित्सा | भाषाटीकासहिता । | १०६१ |
|---|
अजाक्षीरेण निम्बूककन्यातोयैर्दिनत्रयम् ।
प्रत्येकं भावयेच्छुद्धं चक्रिकाकारतां गतम् ॥ ७६ ॥
विपचेद्धण्डिकामध्ये पलाशक्षारमध्यगम् ।
यामान्द्वादश शीतेऽस्मिन् प्रयोज्यं रक्तिकाद्वयम् ॥ ७७ ॥
हन्त्यष्टादश कुष्ठानि रोमविध्वंसनं तथा ।
द्विविधं वातरक्तं च नाडीदुष्टव्रणानि च ॥ ७८ ॥
पेठेका स्वरस, त्रिफलेका क्वाथ, तिलका तेल, घीग्वारके रस और काँजीमें क्रमानुसार भावना दीहुई हरिताल एक तोला, शुद्ध गन्धक एक तोला और शुद्ध पारा ६ मासे लेकर बकरीके दूधमें, नींबूके रसमें और घीग्वारके रसमें तीन दिनतक अच्छे प्रकार खरल करके चक्रिकाकार बनाकर सुखालेवे । तदनन्तर उस चक्रिकाकारको ढाककी राखसे भरीहुई हाँडीमें रक्खे, उसके ऊपर और राख भरकर हाँडीका मुख बन्द करके १२ प्रहरतक पकावे । जब पककर शीतल होजाय तब उसको निकालकर बारीक पीसलेवे । इसको प्रतिदिन दो रत्ती प्रमाण सेवन करनेसें १८ प्रकारके कोढ, रोमका नष्ट होना, दो प्रकारके वातरक्त और नाडीव्रणरोग नष्ट होते हैं ॥ ७६–७८ ॥
तालकेश्वर ।
दद्रुघ्नबाणांघ्रिरसं दत्त्वा तालं सुचूर्णितम् ।
पुनः पुनश्च सम्मर्द्य शुष्कं कृत्वा पुटे दहेत् ॥ ७९ ॥
दृढस्थाल्यां धृतं क्षारं पालाशं चाप्युपर्यधः ।
ततो ज्वाला प्रदातव्या दिनरात्रे मृतं भवेत् ॥ ८० ॥
एक तोले हरितालको चकवडके पत्तोंके रसमें और शरफोंकाके रसमें बारबार खरल करे और बारबार सुखावे । फिर उसको एक नवीन और अत्यन्त दृढ हाँडीमें ढाककी राखके बीचमें रखे और उस हाँडीका मुख बन्दकरके एक दिन और एकराततक बराबर पकावे ॥ ७९ ॥ ८० ॥
शुक्लवर्णं यदा च स्यादग्नौ दत्ते न धूमकम् ।
तदा ज्ञेयं मृतं तालं सर्वकुष्ठविनाशनम् ॥ ८१ ॥
गलत्कुष्ठं वातरक्तं ताम्रवर्णं च मण्डलम् ।
शीतपित्तं महादद्रुच्छुछुन्दरविनाशनम् ॥
पथ्यं मसूरं चणकं मुद्गसूपं यथेच्छया ॥ ८२ ॥
३१०-६२ । भैषज्यरत्नावली । [ कुष्ठरोग-
जब पककर सफेद रंगकी भस्म होजाय और अग्निमेंसे धुआँ न निकले तब हरितालको भस्महुआ जानना चाहिये। इसको आधी आधी रत्तीकी मात्रासे सेवन करनेसे सर्व प्रकारके कुष्ठ, गलत्कुष्ठ, वातरक्त, लाल लाल चकत्तोंका पडना, शीत-पित्त, महादद्रु और छुछुन्दरप्रभृति रोगोंका नाश होता है। इसपर मसूर, चना और मूँगकी दालका भोजन करना पथ्य है ॥ ८१ ॥ ८२ ॥
महातालकेश्वर ।
सम्मर्द्य तालकं शुष्कं वंशपत्राख्यमुच्चकैः ।
कूष्माण्डनीरैः सम्भाव्य त्रिदिनं शोधयेत्पुनः ॥ ८३ ॥
घृतकन्याद्रवैर्भूयो भावयेच्च दिनत्रयम् ।
सम्मर्द्य काञ्जिकेनैव दध्नाऽम्लेन विमर्दयेत् ॥ ८४ ॥
सम्मर्द्य चूर्णसलिले रसे पौनर्नवे पुनः ।
त्रिदिनं मर्दयित्वा तु कारयेद्वटिकाकृतिम् ॥ ८५ ॥
स्थाल्यां दृढतरायां तु पलाशक्षारसञ्चयम् ।
उपर्यधस्तालकस्य क्षारं दत्त्वा शरावकैः ॥ ८६ ॥
पिधाय लेपयेद्यत्नात्पूरयेत्क्षारसञ्चयम् ।
पुना रुद्धं शरावेण लेपयेत्तद्दृढं ततः ॥ ८७ ॥
द्वात्रिंशद्यामपर्यन्तं वह्निज्वाला प्रदीयते ।
एवं सिद्धेन तालेन गन्धतुल्येन मेलयेत् ॥
द्वयोस्तुल्यं जीर्णताम्रं वालुकायन्त्रगं पचेत् ॥ ८८ ॥
वंशपत्री हरितालको एक तोला लेकर पेठेकेँ रसमें और फिर घीग्वारके रसमें यथाक्रम तीन तीन दिनतक भावना देवे । फिर काँजी, खट्टे दही और चुनेके पानीमें खरल करके पुनर्नवेके रसमें खरल करे । इस प्रकार तीन दिन खरल करके खाडियाकी समान बनालेवे । पश्चात् एक मजबूत हाँडीमें ढाककी राखको भरे और उसके ऊपर पूर्वोक्त हरितालको रख सिकोरे ढकदेवे । फिर उसपर राखको भरकर हाँडीके मुँहपर शिकोरा ढक सन्धिस्थानोंको मिट्टीसे ल्हेसकर अच्छे प्रकार बन्दकर देवे और उसपर राख बुरका देवे । जिससे किसीप्रकार भी हाँडीका मुख नहीं खुले । फिर उसको ३२ प्रहरतक अग्निमें पकावे । जब उत्तम प्रकार पककर स्वयं शीतल होजाय तब निकालकर उस हरितालके साथ शुद्ध गन्धक एक
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०६३
तोला और पुराना ताँबा दो तोले मिलाकर वालुकायन्त्रमें पकावे । जब स्वां- गशीतल होजाय तब बारीक चूर्ण करलेवे ॥ ८३-८८ ॥
अयं तालेश्वरो नाम रसः परमदुर्लभः । हन्त्यष्टादश कुष्ठानि वातशोणितनाशनः ॥ ८९ ॥ रक्तमण्डलमप्युग्रं स्फुटितं गलितं तथा । बहुरूपं सर्वजातं नाशयेदविकल्पतः ॥ ९० ॥ दुष्टव्रणं च वीसर्पं त्वग्दोषं च विनाशयेत् । दृष्टो वारसहस्रं च रोगवारणकेसरी ॥ ९१ ॥
यह महातालेश्वरनामक रस संसारमें अत्यन्त दुर्लभ है । यह १८ प्रकारके कुष्ठ, वातरक्त, रक्तमण्डल ( पित्ती ), अत्युग्र स्फुटित और गलितकुष्ठ तथा सर्वदोषजन्य नानाप्रकारके कुष्ठ, दुष्टव्रण, विसर्प और त्वचासम्बन्धी रोगोंको तत्काल नाश करता है । यह हजारोंवार परीक्षा करके देखागया है । रोगरूपी हाथियोंको नाश करनेके लिये यह रस सिंहकी समान है ॥ ८९-९१ ॥
उदयभास्कर ।
गन्धकेन हतं ताम्रं दशभागं समुद्धरेत् । ऊषणं पञ्चभागं स्यादमृतं च द्विभागिकम् ॥ ९२ ॥ दातव्यं कुष्ठिने सम्यगनुपानस्य योगतः । गलिते स्फुटिते चैव विपुले मण्डले तथा ॥ विचर्चिकादद्रुपामासर्वकुष्ठप्रशान्तये ॥ ९३ ॥
गन्धकके द्वारा मारा हुआ ताँबा १० तोले, काली मिरच ५ तोले और शुद्ध मीठा- तेलिया २ तोले लेवे । सबोंको एकत्र जलमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । फिर प्रतिदिन एक एक गोली दोषानुसार अनुपानभेदसे सेवन करावे इससे गलितकुष्ठ, स्फुटितकुष्ठ, विपुल मण्डल, विचर्चिका, दद्रु, पामा आदि सर्वप्रकार के कुष्ठविकार नष्ट होते हैं ॥ ९२ ॥ ९३ ॥
अमृतांकुरलौह ।
हुताशमुखसंशुद्धं पलमेकं रसस्य वै । पलं लौहस्य ताम्रस्य पलं भल्लातकस्य च ॥ ९४ ॥
अष्टमाषाधिकं तत्र धात्र्याः पाणितलानि षट् ।
१०६४ भैषज्यरत्नावली । [ कुष्ठरोग-
गन्धकस्य पलं चैकमभ्रकस्य च गुग्गुलोः ।
हरीतकीविभीतक्योश्चूर्णं कर्षद्वयं द्वयोः ॥ ९५ ॥
अष्टमाषाधिकं तत्र धात्र्याः पाणितलानि षट् ।
घृतं द्व्यष्टगुणं लौहाद् द्वात्रिंशत्त्रिफलाजलम् ॥ ९६ ॥
एवं कृत्वा पचेत्पात्रे लौहे च विधिपूर्वकम् ।
पाकमेतस्य जानीयात्कुशलो लौहपाकवित् ॥ ९७ ॥
अग्निद्वारा शुद्ध कियाहुआ पारा १ पल, लोहभस्म, ताम्रभस्म, अभ्रकभस्म, भिलावे, शुद्ध गन्धक और गूगल ये प्रत्येक एक एक पल, हरड और बहेडेका चूर्ण दो दो तोले, आँवले १२ तोले ८ माशे, घी ८ पल और त्रिफलेका क्वाथ ३२ पल लेवे । इन सबोंको एकत्रकर लोहेकी कढाईमें विधिपूर्वक पकावे । फिर पाकविधिको जाननेवाला चतुर वैद्य लोहपाककी समान इसके पाकको सिद्ध हुआ जानकर उतारलेवे ॥ ९४-९७ ॥
विशुद्धः प्रातरुत्थाय गुरुदेवद्विजार्चनः ।
रक्तिकादिक्रमेणैव घृतभ्रामरमर्द्दितम् ॥ ९८ ॥
लौहे लौहस्य दण्डेन खादेदेतद्रसायनम् ।
अनुपानं च कुर्वीत नारिकेलोदकं पयः ॥ ९९ ॥
सर्वकुष्ठहरं श्रेष्ठं वलीपलितनाशनम् ।
पाण्डुमेहामवातघ्नं वातरक्तरुजापहम् ॥ १०० ॥
कृमिशोथाश्मरीशूलदुर्नामवातरोगनुत् ।
क्षयं हन्ति महाश्वासमत्यर्थं शुक्रवर्द्धनम् ॥
अग्निसन्दीपनं हृद्यं कान्त्यायुर्बलवृद्धिकृत् ॥ १ ॥
पश्चात् वमन, विरेचनादिके द्वारा शुद्ध हुआ रोगी प्रातःकाल उठकर शौचादिसे निवृत्त होकर गुरुओं, देव और ब्राह्मणोंका पूजन करके इसकी एक रत्ती मात्राको लोहेके बर्त्तनमें लोहेके डंडेसे घृतके साथ खरल करके सेवन करे और इसी क्रमसे प्रतिदिन इसकी एक एक रत्ती मात्राको बढाकर खाय । इसके ऊपरसे नारियलका जल अथवा दूध पान करे । यह सर्वप्रकारके कुष्ठोंको नाश करनेके लिये अत्युत्तम रसायन औषधि है तथा वली (शरीरमें झुर्री पडना), पलित (असमय बालोंका पकना), पाण्डु, प्रमेह, आमवात, वातरक्त, कृमिरोग, शोथ, बवासीर, पथरी, शूल, वातजन्य रोग, क्षय और