भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1096

१०६४ भैषज्यरत्नावली । [ कुष्ठरोग-

गन्धकस्य पलं चैकमभ्रकस्य च गुग्गुलोः ।
हरीतकीविभीतक्योश्चूर्णं कर्षद्वयं द्वयोः ॥ ९५ ॥
अष्टमाषाधिकं तत्र धात्र्याः पाणितलानि षट् ।
घृतं द्व्यष्टगुणं लौहाद् द्वात्रिंशत्त्रिफलाजलम् ॥ ९६ ॥
एवं कृत्वा पचेत्पात्रे लौहे च विधिपूर्वकम् ।
पाकमेतस्य जानीयात्कुशलो लौहपाकवित् ॥ ९७ ॥

अग्निद्वारा शुद्ध कियाहुआ पारा १ पल, लोहभस्म, ताम्रभस्म, अभ्रकभस्म, भिलावे, शुद्ध गन्धक और गूगल ये प्रत्येक एक एक पल, हरड और बहेडेका चूर्ण दो दो तोले, आँवले १२ तोले ८ माशे, घी ८ पल और त्रिफलेका क्वाथ ३२ पल लेवे । इन सबोंको एकत्रकर लोहेकी कढाईमें विधिपूर्वक पकावे । फिर पाकविधिको जाननेवाला चतुर वैद्य लोहपाककी समान इसके पाकको सिद्ध हुआ जानकर उतारलेवे ॥ ९४-९७ ॥

विशुद्धः प्रातरुत्थाय गुरुदेवद्विजार्चनः ।
रक्तिकादिक्रमेणैव घृतभ्रामरमर्द्दितम् ॥ ९८ ॥
लौहे लौहस्य दण्डेन खादेदेतद्रसायनम् ।
अनुपानं च कुर्वीत नारिकेलोदकं पयः ॥ ९९ ॥
सर्वकुष्ठहरं श्रेष्ठं वलीपलितनाशनम् ।
पाण्डुमेहामवातघ्नं वातरक्तरुजापहम् ॥ १०० ॥
कृमिशोथाश्मरीशूलदुर्नामवातरोगनुत् ।
क्षयं हन्ति महाश्वासमत्यर्थं शुक्रवर्द्धनम् ॥
अग्निसन्दीपनं हृद्यं कान्त्यायुर्बलवृद्धिकृत् ॥ १ ॥

पश्चात् वमन, विरेचनादिके द्वारा शुद्ध हुआ रोगी प्रातःकाल उठकर शौचादिसे निवृत्त होकर गुरुओं, देव और ब्राह्मणोंका पूजन करके इसकी एक रत्ती मात्राको लोहेके बर्त्तनमें लोहेके डंडेसे घृतके साथ खरल करके सेवन करे और इसी क्रमसे प्रतिदिन इसकी एक एक रत्ती मात्राको बढाकर खाय । इसके ऊपरसे नारियलका जल अथवा दूध पान करे । यह सर्वप्रकारके कुष्ठोंको नाश करनेके लिये अत्युत्तम रसायन औषधि है तथा वली (शरीरमें झुर्री पडना), पलित (असमय बालोंका पकना), पाण्डु, प्रमेह, आमवात, वातरक्त, कृमिरोग, शोथ, बवासीर, पथरी, शूल, वातजन्य रोग, क्षय और