भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०६३

तोला और पुराना ताँबा दो तोले मिलाकर वालुकायन्त्रमें पकावे । जब स्वां- गशीतल होजाय तब बारीक चूर्ण करलेवे ॥ ८३-८८ ॥

अयं तालेश्वरो नाम रसः परमदुर्लभः । हन्त्यष्टादश कुष्ठानि वातशोणितनाशनः ॥ ८९ ॥ रक्तमण्डलमप्युग्रं स्फुटितं गलितं तथा । बहुरूपं सर्वजातं नाशयेदविकल्पतः ॥ ९० ॥ दुष्टव्रणं च वीसर्पं त्वग्दोषं च विनाशयेत् । दृष्टो वारसहस्रं च रोगवारणकेसरी ॥ ९१ ॥

यह महातालेश्वरनामक रस संसारमें अत्यन्त दुर्लभ है । यह १८ प्रकारके कुष्ठ, वातरक्त, रक्तमण्डल ( पित्ती ), अत्युग्र स्फुटित और गलितकुष्ठ तथा सर्वदोषजन्य नानाप्रकारके कुष्ठ, दुष्टव्रण, विसर्प और त्वचासम्बन्धी रोगोंको तत्काल नाश करता है । यह हजारोंवार परीक्षा करके देखागया है । रोगरूपी हाथियोंको नाश करनेके लिये यह रस सिंहकी समान है ॥ ८९-९१ ॥

उदयभास्कर ।

गन्धकेन हतं ताम्रं दशभागं समुद्धरेत् । ऊषणं पञ्चभागं स्यादमृतं च द्विभागिकम् ॥ ९२ ॥ दातव्यं कुष्ठिने सम्यगनुपानस्य योगतः । गलिते स्फुटिते चैव विपुले मण्डले तथा ॥ विचर्चिकादद्रुपामासर्वकुष्ठप्रशान्तये ॥ ९३ ॥

गन्धकके द्वारा मारा हुआ ताँबा १० तोले, काली मिरच ५ तोले और शुद्ध मीठा- तेलिया २ तोले लेवे । सबोंको एकत्र जलमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । फिर प्रतिदिन एक एक गोली दोषानुसार अनुपानभेदसे सेवन करावे इससे गलितकुष्ठ, स्फुटितकुष्ठ, विपुल मण्डल, विचर्चिका, दद्रु, पामा आदि सर्वप्रकार के कुष्ठविकार नष्ट होते हैं ॥ ९२ ॥ ९३ ॥

अमृतांकुरलौह ।

हुताशमुखसंशुद्धं पलमेकं रसस्य वै । पलं लौहस्य ताम्रस्य पलं भल्लातकस्य च ॥ ९४ ॥