भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1094, कुल 1416 में से

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पृष्ठ 1094

३१०-६२ । भैषज्यरत्नावली । [ कुष्ठरोग-

जब पककर सफेद रंगकी भस्म होजाय और अग्निमेंसे धुआँ न निकले तब हरितालको भस्महुआ जानना चाहिये। इसको आधी आधी रत्तीकी मात्रासे सेवन करनेसे सर्व प्रकारके कुष्ठ, गलत्कुष्ठ, वातरक्त, लाल लाल चकत्तोंका पडना, शीत-पित्त, महादद्रु और छुछुन्दरप्रभृति रोगोंका नाश होता है। इसपर मसूर, चना और मूँगकी दालका भोजन करना पथ्य है ॥ ८१ ॥ ८२ ॥

महातालकेश्वर ।

सम्मर्द्य तालकं शुष्कं वंशपत्राख्यमुच्चकैः ।
कूष्माण्डनीरैः सम्भाव्य त्रिदिनं शोधयेत्पुनः ॥ ८३ ॥
घृतकन्याद्रवैर्भूयो भावयेच्च दिनत्रयम् ।
सम्मर्द्य काञ्जिकेनैव दध्नाऽम्लेन विमर्दयेत् ॥ ८४ ॥
सम्मर्द्य चूर्णसलिले रसे पौनर्नवे पुनः ।
त्रिदिनं मर्दयित्वा तु कारयेद्वटिकाकृतिम् ॥ ८५ ॥
स्थाल्यां दृढतरायां तु पलाशक्षारसञ्चयम् ।
उपर्यधस्तालकस्य क्षारं दत्त्वा शरावकैः ॥ ८६ ॥
पिधाय लेपयेद्यत्नात्पूरयेत्क्षारसञ्चयम् ।
पुना रुद्धं शरावेण लेपयेत्तद्दृढं ततः ॥ ८७ ॥
द्वात्रिंशद्यामपर्यन्तं वह्निज्वाला प्रदीयते ।
एवं सिद्धेन तालेन गन्धतुल्येन मेलयेत् ॥
द्वयोस्तुल्यं जीर्णताम्रं वालुकायन्त्रगं पचेत् ॥ ८८ ॥

वंशपत्री हरितालको एक तोला लेकर पेठेकेँ रसमें और फिर घीग्वारके रसमें यथाक्रम तीन तीन दिनतक भावना देवे । फिर काँजी, खट्टे दही और चुनेके पानीमें खरल करके पुनर्नवेके रसमें खरल करे । इस प्रकार तीन दिन खरल करके खाडियाकी समान बनालेवे । पश्चात् एक मजबूत हाँडीमें ढाककी राखको भरे और उसके ऊपर पूर्वोक्त हरितालको रख सिकोरे ढकदेवे । फिर उसपर राखको भरकर हाँडीके मुँहपर शिकोरा ढक सन्धिस्थानोंको मिट्टीसे ल्हेसकर अच्छे प्रकार बन्दकर देवे और उसपर राख बुरका देवे । जिससे किसीप्रकार भी हाँडीका मुख नहीं खुले । फिर उसको ३२ प्रहरतक अग्निमें पकावे । जब उत्तम प्रकार पककर स्वयं शीतल होजाय तब निकालकर उस हरितालके साथ शुद्ध गन्धक एक

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