भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्साभाषाटीकासहिता ।१०६१

अजाक्षीरेण निम्बूककन्यातोयैर्दिनत्रयम् ।
प्रत्येकं भावयेच्छुद्धं चक्रिकाकारतां गतम् ॥ ७६ ॥
विपचेद्धण्डिकामध्ये पलाशक्षारमध्यगम् ।
यामान्द्वादश शीतेऽस्मिन् प्रयोज्यं रक्तिकाद्वयम् ॥ ७७ ॥
हन्त्यष्टादश कुष्ठानि रोमविध्वंसनं तथा ।
द्विविधं वातरक्तं च नाडीदुष्टव्रणानि च ॥ ७८ ॥

पेठेका स्वरस, त्रिफलेका क्वाथ, तिलका तेल, घीग्वारके रस और काँजीमें क्रमानुसार भावना दीहुई हरिताल एक तोला, शुद्ध गन्धक एक तोला और शुद्ध पारा ६ मासे लेकर बकरीके दूधमें, नींबूके रसमें और घीग्वारके रसमें तीन दिनतक अच्छे प्रकार खरल करके चक्रिकाकार बनाकर सुखालेवे । तदनन्तर उस चक्रिकाकारको ढाककी राखसे भरीहुई हाँडीमें रक्खे, उसके ऊपर और राख भरकर हाँडीका मुख बन्द करके १२ प्रहरतक पकावे । जब पककर शीतल होजाय तब उसको निकालकर बारीक पीसलेवे । इसको प्रतिदिन दो रत्ती प्रमाण सेवन करनेसें १८ प्रकारके कोढ, रोमका नष्ट होना, दो प्रकारके वातरक्त और नाडीव्रणरोग नष्ट होते हैं ॥ ७६–७८ ॥

तालकेश्वर ।

दद्रुघ्नबाणांघ्रिरसं दत्त्वा तालं सुचूर्णितम् ।
पुनः पुनश्च सम्मर्द्य शुष्कं कृत्वा पुटे दहेत् ॥ ७९ ॥
दृढस्थाल्यां धृतं क्षारं पालाशं चाप्युपर्यधः ।
ततो ज्वाला प्रदातव्या दिनरात्रे मृतं भवेत् ॥ ८० ॥

एक तोले हरितालको चकवडके पत्तोंके रसमें और शरफोंकाके रसमें बारबार खरल करे और बारबार सुखावे । फिर उसको एक नवीन और अत्यन्त दृढ हाँडीमें ढाककी राखके बीचमें रखे और उस हाँडीका मुख बन्दकरके एक दिन और एकराततक बराबर पकावे ॥ ७९ ॥ ८० ॥

शुक्लवर्णं यदा च स्यादग्नौ दत्ते न धूमकम् ।
तदा ज्ञेयं मृतं तालं सर्वकुष्ठविनाशनम् ॥ ८१ ॥
गलत्कुष्ठं वातरक्तं ताम्रवर्णं च मण्डलम् ।
शीतपित्तं महादद्रुच्छुछुन्दरविनाशनम् ॥
पथ्यं मसूरं चणकं मुद्गसूपं यथेच्छया ॥ ८२ ॥