भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 1082
१०५०भैषज्यरत्नावली ।[ कुष्ठरोग-

वायविडङ्ग, सैंधानमक, हरड, सोमराजीके बीज, सफेद सरसों, करञ्जुओ और हल्दी इनको बराबर २ लेकर एकत्र गोमूत्रमें पीसकर लेप करनेसे कुष्ठरोग इस प्रकार नष्ट होजाता है जिसप्रकार सूर्य्यसे अन्धकारसमूह दूर होता है ॥

कासमर्दमूलं च काञ्जिकेन प्रपेषितम् ।
दद्रुकिटिभकुष्ठानि जयेदेतत्प्रलेपनात् ॥ १० ॥

कसौंदीकी जडको काँजीके साथ पीसकर लेप करनेसे दाद, किटिभ और कोढ़ नष्ट होते हैं ॥ १० ॥

आरग्वधस्य पत्राणि आरनालेन पेषयेत् ।
दद्रुकिटिभकुष्ठानि निहन्ति सिध्ममेव च ॥ ११ ॥

अमलतासके पत्तोंको काँजीमें पीसकर लेप करे तो दाद, किटिभ, कुष्ठ और सिध्मकुष्ठरोग दूर होते हैं ॥ ११ ॥

चक्राह्वयं स्नुहीक्षीरं भावितं मूत्रसंयुतम् ।
रवितप्तं हि किञ्चित्तु लेपनं किटिभापहम् ॥ १२ ॥

चकवडके बीजोंको थूहरके दूधमें ७ दिनतक भावना देकर गोमूत्रमें पीसलेवे । फिर उसको धूपमें कुछ गरम करके लेप करे तो किटिभकुष्ठ जाता है ॥ १२ ॥

शिखरिरसेन सुपिष्टं मूलकबीजं प्रलेपितं सिध्म ।
क्षारेण वा कदल्या रजनीमिश्रेण नाशयति ॥ १३ ॥

मूलीके बीजोंको चिरचिटेके पत्तोंके रसमें बारीक पीसकर अथवा केलेके खारके साथ हल्दीको पीसकर लेप करनेसे सिध्मकुष्ठ शमन होता है ॥ १३ ॥

सक्षारं गन्धकं लेपात्कटुतैलेन सिध्मजित् ।
कासमर्दकबीजानि मूलकानां तथैव च ॥
गन्धाश्मचूर्णमिश्राणि सिध्मानां परमौषधम् ॥ १४ ॥

जवाखार और गन्धकको समान भाग लेकर सरसोंके तेलमें पीसकर लेप करें अथवा कसौंदीके बीज, मूलीके बीज और गन्धक इनको बराबर २ लेकर काँजीमें पीसकर लेप करे । यह सिध्मकुष्ठ रोगको नष्ट करनेके लिये परमोत्कृष्ट औषधि है ॥ १४ ॥

कुष्ठं मूलकबीजं प्रियङ्गवः सर्षपास्तथा रजनी ।
एतत्केशरषष्ठं निहन्ति बहुवार्षिकं सिध्म ॥ १५ ॥

कूठ, मूलीके बीज, फूलप्रियंगु, सफेद सरसों, हल्दी और नागकेशर इनको एकत्र पीसकर लेप करे तो इससे बहुत दिनोंका पुराना सिध्मकुष्ठ नष्ट होता है ॥