भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०५१
नीलकुरण्टकपत्राैरालिप्य गात्रमतिबहुशः ।
लिम्पन्मूलकबीजैः पिष्टैस्तकेण सिध्मनाशाय ॥ १६ ॥
नीलीकटसरैयाके पत्तोंको पीसकर बारबार शरीरपर लेप करे । पश्चात् मूलीके बीजोंको मट्ठेके साथ पीसकर प्रलेप करे तो सिध्मकुष्ठ दूर होता है ॥ १६ ॥
एडगजतिलसर्षपकुष्ठं मागधिकालवणत्रयमस्तु ।
पूतिकृतं दिवसत्रयमेतद्धन्ति विचार्चिकदद्रुककुष्ठम् ॥ १७॥
चकवडके बीज, तिल, सफेद सरसों, कूठ, पीपल, सेंधानमक, कालानमक और विरियासञ्चर नमक इन सबोंको समान भाग लेकर दहीके तोडमें ३ दिनतक भिगो-देवे । जब उसमें दुर्गन्ध आनेलगे तब पीसकर लेप करे तो इससे विचार्चिका, दद्रु और कुष्ठरोग नष्ट होते हैं ॥ १७ ॥
सिन्दूरमरिचचूर्णं महिषीनवनीतसंयुतं बहुशः ।
लेपान्निहन्ति पामां तैलं करवीरसिद्धं वा ॥ १८ ॥
सिन्दूर और कालीमिरचोंके चूर्णको भैंसके नैनीघीमें मिलाकर बारबार लेप करनेसे अथवा कनेरकी जडके कल्कद्वारा पकाकर तेलको मलनेसे पामा (खुजली) रोग दूर होता है ॥ १८ ॥
पारदं शङ्खगन्धं च शिला चोत्तरवारुणी ।
प्रपुन्नाटश्च सर्पाक्षी मेघनादाग्निलाङ्गली ॥ १९ ॥
भल्लातं गृहधूमं च मुनिगुञ्जा स्नुहीपयः ।
अरिष्टं च गुडक्षौद्रं वाकुचीबीजतुल्यकम् ॥ २० ॥
गोमूत्रैरारनालैर्वा पिष्ट्वा लेपं च कारयेत् ।
दद्रूमण्डलकण्डूं च विचार्चिं च विनाशयेत् ॥ २१ ॥
पारा, गन्धक, शंखभस्म, मैनसिल, इन्द्रायनकी जड, पमारके बीज, गन्धनाकुली, ढाककी जड, चीतेकी जड, कलिहारी, भिलावे, घरका धुवाँ, अगस्तियाकी जड, चौंटली, थूहरका दूध, नीमकी छाल, पुराना गुड, शहद, बापचीके बीज इन सबोंको समान भाग लेकर गोमूत्र अथवा काँजीके साथ पीसकर लेप करे । यह प्रयोग दद्रुमण्डल, खुजली और विचार्चिकाको नष्ट करता है ॥ १९-२१ ॥
मनःशिलाले मरिचं तैलमार्कं पयः कुष्ठहरः प्रलेपः ॥ २२ ॥
मैनसिल, हरिताल, कालीमिरच, तिलतैल और आकका दूध इनको एकत्र मिलाकर लेप करनेसे कुष्ठरोग दूर होता है ॥ २२ ॥