भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०४६ भेषज्यरत्नावली । [ शूकदोष-
दोनों रोगोंमें रक्तमोक्षण कराना विशेष उपयोगी है। अष्ठीला रोगमें फस्त-खुलवाकर कफज ग्रन्थिरोगमें कहीहुई विधिके अनुसार चिकित्सा करनी चाहिये ॥ २ ॥ ३ ॥
कुम्भिकायां हरेद्रक्तं पक्वायां शोधिते व्रणे ।
तिन्दुकत्रिफलालोध्रैर्लेपस्तैलं च रोपणम् ॥ ४ ॥
पकी हुई कुम्भिकामें रक्तमोक्षण करे और राधआदिको निकालकर व्रणको शुद्ध करे । फिर तेंदू, त्रिफला, लोध इन सबोंको एकत्र पीसकर लेप करे अथवा उक्त द्रव्योंके कल्कद्वारा तेलको पकाकर लगावे । इससे व्रण शीघ्र भरता है ॥ ४ ॥
अलज्यां क्रूररक्तायाममयमेव क्रियाक्रमः ।
स्वेदयेद् ग्रथितं स्निग्धं नाडीस्वेदेन बुद्धिमान् ॥
सुखोष्णैरुपनाहैश्च सुस्निग्धैरुपनाहयेत् ॥ ५ ॥
अलजीरोगमें रक्त दूषित हो तो कुम्भिकाके समान उसकी चिकित्सा करनी चाहिये । ग्रथित नामक शूकदोषमें स्निग्धद्रव्योंसे रोगीको स्निग्धकर नाडीमें स्वेद प्रदान करके स्निग्ध और सुखोष्ण प्रलेप करे ॥ ५ ॥
उत्तमाख्यां तु पिडकां सञ्छिद्य बडिशोद्धताम् ।
कल्कैश्चूर्णैः कषायाणां क्षौद्रयुक्तैरुपाचरेत् ॥ ६ ॥
उत्तमानामक पिडका ( फुन्सी विशेष ) को मत्स्यधारण नामवाले यन्त्रसे उखाडकर चीरे । पश्चात् शुद्धकर उसकी कषायद्रव्योंके कल्क अथवा चूर्णको शहदमें मिलाकर लेप करे ॥ ६ ॥
क्रमः पित्तविसर्पोक्तः पुष्करीमूढयोर्हितः ।
त्वक्पाके स्पर्शहान्यां च सेचयेन्मृदितं पुनः ॥
बलातैलेन कोष्णेन मधुरैश्चोपनाहयेत् ॥ ७ ॥
पुष्करी और मूढनामक शूकदोषोंमें पित्तविसर्परोगकी समान चिकित्सा करनी चाहिये । एवं त्वक्पाकरोग और स्पर्शहानिशूकमें सेचन करे और मृदित रोगमें खिरेंटीके काय तथा कल्कद्वारा सिद्ध किये हुए तेलको थोडा गरम करके मलें अथवा मधुरादि गणकी औषधियोंसे उपनाह ( स्वेद ) देवें ॥ ७ ॥
रसक्रिया विधातव्या लिखिता शतपोनके ।
पृथक्पर्ण्यादिसिद्धं च तैलं देयमनन्तरम् ॥ ८ ॥