भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०४५

कठिल्लकं शिग्रुफलं पटोलं शालिञ्चशाकं नवमूलकं च । तिक्तं कषायं मधु कूपवारि तैलं च हन्यादुपदंशरोगम् ६७ वमन, विरेचन, लिङ्गके बीचकी शिराको छेदना, जोंक लगवाना, सेचन, सेंक और लेप करना, जौ, शालिधान, धन्वदेशके पशु पक्षियोंका मांस, मूँगका यूष, घृत, करेला, सहिंजनेकी फली, परवल, शालिञ्चशाक, कच्ची मूली, तीखे और कषैले-रसवाले पदार्थ, शहद, कुएका जल तथा तेल ये सब उपदंशरोगमें हितकारी हैं । इनके सेवनसे उक्त रोग शीघ्र नष्ट होता है ॥ ६६ ॥ ६७ ॥

उपदंशरोगमें अपथ्य ।

दिवानिद्रां मूत्रवेगं गुर्वन्नं मैथुनं गुडम् । आयासमम्लं तक्रं च वर्जयेदुपदंशवान् ॥ ६८ ॥ उपदंशरोगी दिनमें सोना, मूत्रके वेगको रोकना, भारीअन्न और गुड खाना, मैथुन, कसरत करना, खटाई या खट्टे द्रव्य और मट्ठेका सेवन करना त्यागदेवे, क्योंकि ये सब इसरोगमें विशेष अनिष्टकर हैं ॥ ६८ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्याम् उपदंशचिकित्सा ।


शूकदोषकी चिकित्सा ।

हितं च सर्पिषः पानं पथ्यं चापि विरेचनम् । हितः शोणितमोक्षश्च यच्चापि लघु भोजनम् ॥ १ ॥ शूकदोषमें औषधियों द्वारा पकाये हुए घृतको पीना, जुलाबलेना, रक्तमोक्षण ( फस्त खुलवाना ) और हल्का भोजन करना विशेष हितकारी है ॥ १ ॥

सर्षपीं लिखितां सूक्ष्मैः कषायैरवचूर्णयेत् । तैरेवाभ्यञ्जनं तैलं साधयेद्व्रणरोपणम् ॥ २ ॥ क्रियेयमधिमन्थेऽपि रक्तं स्राव्यं तथोभयोः । अष्ठीलायां हृते रक्ते श्लेष्मग्रन्थिवदाचरेत् ॥ ३ ॥ शूकदोषरोगमें सर्षपिकानामक पिडिकाको सिहोडे आदिके पत्तोंसे मर्दनकर ढाक, मंजीठ, पीपल, वडआदि कषायद्रव्योंके चूर्णसे घावको भरे और उपर्युक्त कषायवृक्षोंकी छालके क्वाथ तथा कल्कद्वारा पकायेहुए तैलको लगावे तो व्रण शीघ्र सूख जाता है । यह क्रिया अधिमन्थरोगमें भी करे । सर्षपी और अधिमन्थ इन

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