भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०४७
शतपोनकनामक शूकदोषकी पिडिकाओंमें लेखन क्रिया करके रसक्रिया करे। एवं पृश्निपर्णी आदि औषधोंके क्वाथ और कल्कद्वारा सिद्ध कियेहुए तैलको लगावे ॥ ८ ॥
रक्तविद्रधिवच्चापि क्रियाशोणितजेऽर्बुदे ।
कषायकल्कसर्पींषि तैलं चूर्णं रसक्रियाम् ॥
शोधने रोपणे चैव वीक्ष्य वीक्ष्यावतारयेत् ॥ ९ ॥
रक्तजनित अर्बुदरोगमें रक्तज विद्रधिरोगकी चिकित्साके अनुसार चिकित्सा करे। इस रोगमें क्वाथ, कल्क, घृत, तैल, चूर्ण और रस इन सबोंको शोधन, रोपण कर्ममें अच्छे प्रकार विचारपूर्वक निरीक्षणकर प्रयोग करे ॥ ९ ॥
अर्बुदं मांसपाकं च विद्रधिं तिलकालकम् ।
प्रत्याख्याय प्रकुर्वीत भिषक् तेषां प्रतिक्रियाम् ॥ १० ॥
अर्बुद, मांसपाक, विद्रधि और तिलकालक ये असाध्य हैं अतः इन रोगोंको त्यागकर अन्यान्य शूकदोषोंकी चिकित्सा करे ॥ १० ॥
सर्वेषां शूकदोषाणां क्रियां व्रणवदाचरेत् ।
उपदंशाधिकारोक्तमौषधं शूकदोषतः ॥ ११ ॥
सर्वप्रकारके शूकदोषोंकी चिकित्सा व्रणरोगोक्त विधिके अनुसार करे और उपदंशरोगमें कही हुई औषधियाँ प्रयोग करे ॥ ११ ॥
दार्वीतैल ।
दार्वीसुरसयष्ट्याह्वगृहधूमनिशायुगैः ।
तैलमभ्यञ्जने पाने मेढ्ररोगं निवारयेत् ॥ १२ ॥
देवदारु, तुलसी, मुलहठी, घरका धुआँ, हल्दी और दारुहल्दी इनके समान भाग मिश्रित कल्कसे यथाविधि पकाये हुए तेलका पान और मालिश करनेसे लिङ्गके समस्त विकार दूर होते हैं ॥ १२ ॥
शूकदोषमें पथ्य ।
लेपो विरेकोऽसृङ्मोक्षः सर्पिःपानं च शालयः ।
यवा जाङ्गलमांसानि मुद्गयूषः कठिल्लकम् ॥ १३ ॥
पटोलं शिग्रुकर्कोटं पत्तूरं बालमूलकम् ।
वेत्राग्रमाषाढफलं दाडिमं सैन्धवं वरा ॥ १४ ॥