भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०३० | भैषज्यरत्नावली । | [ भगन्दर-
यह औषधि नासूर, गण्डमाला, विचर्चिका, बहुत पुराना दुष्टव्रण, दाद, पूतिकर्ण, शिरोरोग, हाथ पैरके फोडे और दुःसाध्य भगन्दर इत्यादि रोगोंको तत्क्षण इस प्रकार नष्ट करती है जिस प्रकार मृगेन्द्र गजेन्द्रको नष्ट कर देता है ॥ ११ १२ ॥
चित्रविभाण्डक रस ।
शुद्धसूतं द्विधा गन्धं कुमारीरसमर्दितम् ।
त्र्यहान्ते गोलकं कृत्वा ताम्रं तेन प्रलेपयेत् ॥ १३ ॥
द्वयोः समं भस्म पूर्णभाण्डे रुद्ध्वा विपाचयेत् ।
द्वियामान्ते समुद्धृत्य स्वाङ्गशीतं विचूर्णयेत् ॥
जम्बीरस्य द्रवैः पिष्ट्वा रुद्ध्वा सप्तपुटे पचेत् ॥ १४ ॥
शुद्ध पारा एक तोला और शुद्ध गन्धक दो तोले, इनको घीग्वारके रसमें तीन दिनतक खरल करके गोलासा बनाले, फिर उस गोलेसे तीन तोले शुद्ध ताँबेके पत्रको लीपे और इन दोनोंके बराबर भाग उपलोंकी राखको एक हाँडीमें भरकर ऊपरसे उक्त पत्रको रक्खे और उसके ऊपर फिर राख भरकर हाँडीके मुखको अच्छेप्रकार बन्द करके दो प्रहरतक तीव्र अग्निमें पकावे । जब पककर स्वाङ्गशीतल होजाय तब निकालकर चूर्ण करलेवे । पश्चात् इस चूर्णको जम्भीरीनीम्बूके रसमें पीसकर मूषायन्त्रमें रखकर सातवार पुटपाक करे ॥ १३ ॥ १४ ॥
गुञ्जैकं मधुनाऽऽज्येन लिह्याद्धन्ति भगन्दरम् ।
मुषली लवणं चानु चारनालयुतं पिबेत् ॥ १५ ॥
कर्त्तव्यो मधुराहारो दिवास्वप्नं च मैथुनम् ॥
वर्जयेच्छीतलाहारं रसे चित्रविभाण्डके ॥ १६ ॥
इसकी एक एक रत्ती मात्राको मधु और घृतमें मिलाकर चाटनेसे भगन्दररोग नष्ट होता है । औषधि सेवन करनेके पीछे मुसली और सेंधानमकको काँजीमें पीसकर पान करे । इसपर मधुर पदार्थोंका भोजन करे । किन्तु दिनमें सोना, मैथुन करना और शीतल द्रव्योंका आहार करना त्यागदेवे ॥ १५ ॥ १६ ॥
ताम्रप्रयोग ।
ताम्रपत्रं रविक्षीरे निर्गुण्डीस्वरसे तथा ।
त्रिकण्टजे स्नुहिरसे ताम्रं दग्ध्वा क्षिपेत्त्रिधा ॥ १७ ॥
रसस्यार्द्धपलं शुद्धं गन्धकस्य पलं तथा ।
कज्जल्यार्द्धेन जम्बीरप्लुतेन ताम्रतः पलम् ॥ १८ ॥