भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०११

परिलिप्यान्धमूषायां दद्यात्पञ्च पुटाँल्लघून् ।
सम्मर्द्य मधुसर्पिर्भ्यां ततो रक्तिद्वयं लिहेत् ॥
भगन्दरे सर्वभवे कार्यं सर्वव्रणेषु च ॥ १९ ॥

चार तोले ताँबेके पत्रको आकके दूध, निर्गुण्डीके स्वरस, गोखुरूके क्वाथ और थूहरके दूधमें यथाक्रम तीन तीन बार भावना देकर तीन तीन बार अग्निमें भस्म करे। पश्चात् शुद्ध पारा दो तोले और शुद्धगन्धक चार तोले लेकर कज्जली बना-कर तीन तोले जम्बीरीनींबूके रसमें खरल करलेवे। फिर पूर्वोक्त ताम्रपत्रको इस कज्जलीसे लिप्त करके अन्धमूषायन्त्रमें रख हल्के हल्के पाँच वार पुटदेवे। तदनन्तर उसको निकालकर शहद और घृतमें खरल करके प्रतिदिन प्रातःकाल दो रत्ती भर सेवन करे। इस प्रयोगको भगन्दर और सर्वप्रकारके व्रणोंमें सेवन करनेसे विशेष उपकार होता है ॥ १७-१९ ॥

नवकार्षिक गुग्गुलु ।

त्रिफलापूरकृष्णानां त्रिपञ्चैकांशयोजिता ।
गुडिका शोथगुल्मार्शोभगन्दरवतां हिता ॥ २० ॥

हरड, बहेडा और आमला ये प्रत्येक तीन तीन तोले, गूगल, पाँच तोले और पीपल एक तोला लेवे। पुनः सबको एकत्र खरल करके गोलियाँ बनालेवे। यह गोली सूजन, गुल्म, अर्श और भगन्दररोगवाले रोगियोंके लिये विशेष हितकारी है ॥ २० ॥

सप्तविंशतिकगुग्गुलु ।

त्रिकटु त्रिफला मुस्तविडङ्गामृतचित्रकम् ।
शठ्येला पिप्पलीमूलं हबुषा सुरदारु च ॥ २१ ॥
तुम्बुरुर्वहृष्करं चव्यं विशाला रजनीद्वयम् ।
विडसौवर्चलौ क्षारौ सैन्धवं गजपिप्पली ॥ २२ ॥
यावन्त्येतानि चूर्णानि तावद्विगुणगुग्गुलुः ।
कोलप्रमाणां गुटिकां भक्षयेन्मधुना सह ॥ २३ ॥

सोंठ, मिरच, पीपल, त्रिफला, नागरमोथा, वायविडङ्ग, गिलोय, चीता, कचूर, छोटी इलायची, पीपलामूल, हाऊबेर (अभावमें धनियाँ), देवदारु, धनियाँ, भिलावेका फल, चव्य, इंद्रायणकी जड, हल्दी; दारुहल्दी, विरियासञ्चर नमक, काला-