भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०२७
नागरमोथा, धूपसरल, फूलप्रियंगु, अनन्तमूल, मोचरस, नागकेशर, लोध चीता और धायके फूल इन सबोंको कल्क डालकर यथानियम तेलको सिद्ध करे । इस तेलको लगानेसे शल्योत्पन्न नाडीव्रण और नानाप्रकारके व्रण भरजाते हैं और रोगी शीघ्र सुखी होता है ॥ २० ॥ २१ ॥
भल्लातकाद्यतैल ।
भल्लातकार्कमरिचैर्लवणोत्तमेन सिद्धं विडङ्गरजनीद्वय- चित्रकैश्च । स्यान्मार्कवस्य च रसेन निहन्ति तैलं नाडीं कफानिलकृतामपचीं व्रणांश्च ॥ २२ ॥
भिलावे, आककी जड, कालीमिरच, सैंधानोन, वायविडङ्ग, हल्दी, दारुहल्दी और चीतेकी जड इनका समान भाग मिलाहुआ कल्क १ सेर, तिलका तेल ४ सेर और भाँगरका रस १६ सेर लेवे । सबको एकत्रकर उत्तम रूपसे तेलको पकावे । यह तेल व्यवहार करनेसे कफज और वातज नाडीव्रण, अपचीरोग एवं सर्वप्रकारके व्रणोंको शीघ्र नष्ट करता है ॥ २२ ॥
निर्गुण्डीतैल ।
समूलपत्रां निर्गुण्डीं पीडयित्वा रसेन तु । तेन सिद्धं समं तैलं नाडीव्रणविशोधनम् ॥ २३ ॥ हितं पामापचीनां तु पानाभ्यञ्जननावनैः । विविधेषु च रोगेषु तथा सर्वव्रणेषु च ॥ २४ ॥
जड और पत्तोंसहित निसोतको कूटकर निकालाहुआ रस २ सेर और तिलका तेल २ सेर इन दोनोंको एकत्र पकाकर पान, मालिश अथवा नस्यग्रहण करनेसे सर्वप्रकारके नाडीव्रण ( नासूर ), खुजली, अपची, व्रणरोग और अन्यान्य विविध प्रकारके रोग तत्काल नाश होते हैं ॥ २३ ॥ २४ ॥
हंसपदीतैल ।
हंसपद्यरिष्टपत्रं जातीपत्रं ततो रसैः । तत्कल्कैश्च पचेत्तैलं नाडीव्रणविरोहणम् ॥ २५ ॥
हंसपदीके पत्ते, नीमके पत्ते और चमेलीके पत्ते इनका समान भाग मिश्रित काथ १६ सेर एवं इन्हींका कल्क १ सेर लेवे । इनके द्वारा ४ सेर तिलके तेलको विधि- पूर्वक सिद्ध करे । यह तेल नाडीव्रणको तत्काल सुखा देता है ॥ २५ ॥
नरास्थितैल ।
नरास्थितैललेपेन स्फुटितः शुष्यति व्रणः ॥ २६ ॥