भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1058

१०२६ भैषज्यरत्नावली । [ नाडीव्रण-


सप्तांगगुग्गुलु ।

गुग्गुलुस्त्रिफलाव्योषैः समांशैराज्ययोजितः ।
नाडीदुष्टव्रणशूलभगन्दरविनाशनः ॥ १७ ॥
हरड़, बहेडा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल ये सब समान भाग और शोधित गूगल सब द्रव्योंके बराबर लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । पुनः इस चूर्णको घीमें खरल करके गोलियाँ बनालेवे । प्रतिदिन एक एक गोलीको सेवन करनेसे नासूर, दुष्टव्रण, शूल, भगन्दर आदिरोग नष्ट होते हैं ॥ १७ ॥

श्यामाघृत ।

श्यामात्रिमण्डीत्रिफलासुसिद्धं हरिद्रया तिल्वकवृक्षकेण ।
घृतं सदुग्धं व्रणतर्पणेन हन्याद्गतिं कोष्ठगतापि या स्यात् १८
अनन्तमूल, निसोत, त्रिफला, हल्दी, लोध और कुडेकी छाल इनकें समान भाग मिश्रित एक सेर कल्कके द्वारा दो सेर घृतको ८ सेर दूधमें पकावे । इस घृतसे नाडी-व्रणको तृप्त करनेसे कोष्ठतक पहुँची हुई राधकी गति नष्ट होकर व्रण शीघ्र सूख जाता है ॥ १८ ॥

स्वर्जिकाद्यतैल ।

स्वर्जिकासिन्धुदन्त्यग्निरूपिकानलनीलिकाः ।
खरमञ्जरीबीजानि तैलं गोमूत्रपाचितम् ॥
दुष्टव्रणप्रशमनं कफनाडीव्रणापहम् ॥ १९ ॥
सज्जी, सेंधानमक, दन्ती, चीता, सफेद आक, नलमूल, नीलवृक्षकी जड और चिरचिटेके बीज इन सबोंके कल्क द्वारा तिलके तैलको गोमूत्रमें पकावे । यह तेल दुष्टव्रण और कफजन्य नाडीव्रणको दूर करता है ॥ १९ ॥

कुम्भीकाद्यतैल ।

कुम्भीकखर्जूरकपित्थबिल्ववनस्पतीनां च शलाटु-
कल्कैः । कृत्वा कषायं विपचेत्तु तैलमावाप्य मुस्ता-
सरलप्रियंगूः ॥ २० ॥ सौगन्धिकामोचरसाहि-पुष्प-
लोध्राणि दत्त्वा खलु धातकीं च । एतेन शल्यप्रभवा हि
नाडी रोहेद्व्रणो वै सुखमाशु चैव ॥ २१ ॥
पुन्नागवृक्षकी लता, खजूर, कैथ, बेल, बड़ और गूलर इन सबोंको कच्चे फलोंके द्वारा यथाविधि क्वाथ बनावे । फिर इस क्वाथमें तिलका तेल तथा