भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1098, कुल 1416 में से

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पृष्ठ 1098

१०६६ भेषज्यरत्नावली । [ कुष्ठरोग-

शोषयित्वा पुनः शुष्कं चूर्णयेत्तण्डुलाकृतिम् । ततःशरावके यन्त्रे स्थापयेत्कुशलो भिषक् ॥ ६ ॥ बदरीपल्लवोत्थेन सन्धिलेपं च कारयेत् । अरुणाभमधःपात्रं तावज्ज्वाला प्रदीयते ॥ ७ ॥ स्वाङ्गशीतं समुद्धृत्य माणिक्याभो भवेद्रसः । घृतक्षौद्रेण सम्मद्ये खादयेद्रक्तिकाद्वयम् ॥ ८ ॥ सम्पूज्य देवदेवेशं कुष्ठरोगाद्विमुच्यते । स्फुटितं गलीतं कुष्ठं वातरक्तं भगन्दरम् ॥ ९ ॥ नाडीव्रणं व्रणं दुष्टमुपदंशं विचर्चिकाम् । नासास्यसम्भवान्रोगांक्षतान्हन्यात्सुदारुणान् ॥ पुण्डरीकं च चर्माख्यं विस्फोटं मण्डलं तथा ॥ १० ॥

वंशपत्रा हरितालको पेठेके रसमें और खट्टे दहीमें डालकर सातवार अथवा तीन- बार भावना देवे । फिर सुखाकर चावलोंकी समान चूर्ण करलेवे । तदनन्तर इस चूर्णको एक सिकोरेमें रखकर ऊपरसे दूसरा सिकोरा ढकदेवे और बेरीके पत्तोंकों पीसकर उसकी सन्धियोंमें लेप करके तबतक अग्निमें पकावे जबतक नीचेका पात्र लाल न होजाय । जब पककर स्वाङ्गशीतल होकर माणिक्यकी समान देदीप्यमान होजाय तब निकालकर चूर्ण करलेवे । इस प्रकार यह माणिक्यरस सिद्ध होता है । प्रतिदिन प्रातःकाल महादेवजीका पूजन करके इसकी दो रत्ती मात्राको घी और शहदमें मिलाकर खावे तो कुष्ठरोगसे शीघ्र मुक्त होजाता है । यह रस स्फुटित, गलितकुष्ठ, वातरक्त, भगन्दर, नासूर, दुष्टव्रण, उपदंश, विचर्चिकाकुष्ठ, नाक और मुखमें होनेवाले रोग, क्षय, पुण्डरीक, चर्माख्य, विस्फोट और मण्डलादि सर्वप्र- कारके कोढोंको नष्ट करता है ॥

अमृतभल्लातक । भल्लातकानां पवनोद्धतानां वृन्तच्युतानां च यदाढकं स्यात् । तच्चेष्टकाचूर्णकणैर्विघृष्य प्रक्षाल्य शोषाय सृजेत् प्रवाते ॥ ११ ॥ शुष्कं पुनस्तद् विदलीकृतं च ततः पचेदप्सु चतुर्गुणासु । तत्पादशेषं पुनरेव शीतं क्षीरेण तुल्येन पुनः पचेत्तु ॥ १२ ॥ तत्पादशेषं पुनरेव शीतं

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