भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०६७
घृतेन तुल्येन पुनः पचेत्तु । तदर्द्धया शर्करया विकीर्णं
ततः खजेनोन्मथितं विधाय ॥ १३ ॥ तत्सप्तरात्रादुप-
जातवीर्यं सुधारसादप्यधिकत्वमेति । प्रातर्विशुद्धः
कृतदेवकार्यो मात्रां च खादेत्स्वशरीरयोग्याम् ॥ १४ ॥
अच्छे प्रकार पकेहुए, वायुसे टूटकर स्वयं गिरे हुए आठसेर भिलावोंको लेकर उनके डंठलोंको तोड देवे । फिर उनको ईंटोंके चूर्णसे घिसकर पानीसे धोकर हवामें सुखालेवे । तदुपरान्त उन भिलावोंको दो दो टुकडे करके चौगुने जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाईभाग जल शेष रहजाय तब उतारकर शीतल होनेपर छान लेवे । फिर इसीप्रकार इसको आठसेर दूधके साथ पकावे । दो सेर भाग अवशिष्ट रहनेपर उतारकर छानलेवे । पश्चात् इस क्वाथको आठ सेर घृतके साथ पकावे । जब पकते पकते गाढा होजाय तब उसमें चारसेर खाँड डालकर करछीसे एकमएक करके किसी उत्तम पात्रमें भरकर सातदिनतक रखा रहनेदेवे । सातदिन पीछे यह औषधि अमृतके समान अथवा इससे भी अधिक गुणवाली होजाती है । अनन्तर प्रतिदिन प्रातःकाल शौचादिसे शुद्ध हो और अपने इष्टदेवका पूजन करके अपनी अग्निके बलाबबलको विचार कर इसकी मात्राको निरूपण करके भक्षण करे ॥ ११–१४ ॥
न चान्नपाने परिहार्यमस्ति न चातपे चाध्वनि मैथुने च ।
यथेष्टचेष्टोविहितोपयोगाद्भवेन्नरः काञ्चनराशिगौरः ॥ १५ ॥
अनन्यमेधा नरसिंहतेजा हृष्टेन्द्रियोऽव्याहतबुद्धिसत्त्वः ।
दन्ताश्च शीर्णाःपुनरुद्भवन्ति केशाश्च शुक्लाः पुनरेव दिव्याः ॥ १६ ॥
विशीर्णकर्णाङ्गुलिनासिकोऽपि कृम्यर्दितोभिन्नगलोऽपि कुष्ठी ।
सोऽपि क्रमादङ्कुरिताग्रशाखस्तरुर्यथा भाति नवाम्बुसिक्तः ॥ १७ ॥
इसको सेवन करनेपर आहार विहार तथा धूप, मार्गमें चलना और मैथुनकरना इनका कुछ भी परहेज नहीं है । इसपर इच्छानुसार खानपान करनेसे भी मनुष्य सुवर्णके समान अत्यन्त कान्तिमान् होजाता है । एवं अद्वितीय मेधावान्, नृसिंहके समान तेजवान्, हृष्टपुष्ट और प्रसन्न इन्द्रियोंवाला तथा विशेष प्रतिभाशाली होता है । इससे टूटेहुए दाँत फिर निकल आते हैं, सफेद बाल फिर काले होकर अत्यन्त दिव्य होजाते हैं, बिगडीहुई शरीरकी त्वचा नीलवर्णकी होजाती है, एवं कीडोंके