भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १०७१
और आमले सौ लेवे। इन सबोंको एकत्रकर एक द्रोण जलमें पकावे। जब चार सेर जल शेष रहे तब उतारकर छानलेवे। फिर इस क्वाथमें एक प्रस्थ शुद्ध गूगल और एक प्रस्थ घृत डालकर दूसरीवार पकावे। जब पाक सिद्धहुआ जाने तब गिलोयका सत्त्व दो पल सोंठ दो पल और पीपल दो पल इनको एकत्र पीसकर डाल देवे और सबोंको अच्छे प्रकार मिलाकर स्वच्छ चिकने बासनमें करके रखदेवे ॥ ३४-३७ ॥
ततो मात्रां प्रयुञ्जीत ज्ञात्वा दोषबलाबलम् । अष्टादशसु कुष्ठेषु वातरक्तगदेषु च ॥ ३८ ॥ कामलामामवातं च अग्निमान्द्यं भगन्दरम् । पीनसं च प्रतिश्यायं प्लीहानमुदरं तथा ॥ एतान् रोगान् निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ३९ ॥
पश्चात् दोषोंके बलाबलको विचारकर इसकी मात्राको उचित परिमाणसे सेवन करे। यह अठारह प्रकारके कोढ, वातरक्त, कामला आमवात, मंदाग्नि, भगन्दर, पीनस, प्रतिश्याय, प्लीहा तथा उदररोग इन सम्पूर्ण विकारोंको तत्काल नाश करता है। जिस प्रकार सूर्यनारायण अपनी किरणोंसे अन्धकार समूहको तत्क्षण नष्ट करदेते हैं ॥ १३८ ॥ १३९ ॥
वज्रकघृत।
वासा गुडूचीत्रिफलापटोलकरञ्जन्निम्बासनकृष्णवेत्रम् । तत्क्वाथकल्केन घृतं विपक्वं तद्वज्रवत्कुष्ठहरं प्रदिष्टम् ॥ १४० ॥ विशीर्णकर्णाङ्गुलिहस्तपादः कृम्यर्दितो भिन्नगलोऽपि मर्त्यः । पौराणिकीं कान्तिमवाप्य जीवेदव्याहतो वर्षशतं च कुष्ठी ॥
अडूस़ा, गिलोय, त्रिफला, परवल, करंजुआ, नीमकी छाल, विजयसार और काला बेंत इनको समानभाग लेकर अठगुने जलमें औटावे। जब पकते पकते चौथाईभाग जल बाकी रहजाय तब उतारकर छानलेवे। फिर उस क्वाथमें उक्त औषधियोंका चूर्ण एक सेर और घी दो सेर डालकर विधिपूर्वक घृतको सिद्ध करे। यह घृत वज्रके समान कुष्ठरोगको हरता है इस लिये इसको वज्रकघृत कहते हैं, इसके सेवनसे कीडोंके पडनेसे गलकर गिरेहुए कान, अंगुलियें, हाथ, पैर और भिन्नगल तथा मृत्युको प्राप्तहुआ भी कुष्ठरोगी शीघ्र आरोग्य होता है। एवं जैसी पहलेकी शोभाको प्राप्तकर अव्याहतरूपसे सौ वर्ष पर्यन्त जीता है ॥ १४० ॥ ४१ ॥