भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ७९
द्वे बृहत्यौ वचा चैव कार्पासास्थि तुषास्तथा ।
छागगोमायुविट् चैव हस्तिदन्तस्तथैव च ॥ २४ ॥
एतत्सर्वं समाहृत्य छागमूत्रेण भावयेत् ।
उलूखले तु संकुट्य स्थापयेन्मृन्मये शुभे ॥ २५ ॥
सिंगरफ, देवदारु धूप, सरल, (लोबान) गायका घी, गौकी अस्थि, सुगन्धतृण, शिवका निर्माल्य, कुटकी, सफेद सरसों, नीमके पत्ते, मोरका पंख, साँपकी केंचली, बिलावकी विष्ठा, गौका सींग, मैनफल, कटेरी, बडी कटेरी, वच, कपासके बीज (बिनौले), धानोंकी भूसी, बकरेकी और गीदडकी विष्ठा और हाथीदाँत इन सबको एकत्र करके बकरेके मूत्रमें भावना देवे। फिर ओखलीमें कूटकर मिट्टीके उत्तम पात्रमें भरकर रखदेवे ॥ २२-२५ ॥
"ॐ नमो भगवते रुद्राय उमापतये सम्पन्नताय
नन्दिकेश्वराय" इति मन्त्रेणाभिमन्त्रयेत् ॥
घ्राणमात्रेण धूपोऽयं दीयते यत्र वेश्मनि ।
न तत्र सर्पास्तिष्ठन्ति न पिशाचा न राक्षसाः ॥ २६ ॥
एष माहेश्वरो धूपः सर्वज्वरविनाशनः ।
ऐकाहिकं द्व्याहिकं च त्र्याहिकं च चतुर्थकम् ॥
एवमादीन् ज्वरान्सर्वान् नाशयेन्नात्र संशयः ॥ ४२७ ॥
पश्चात् "ॐ नमो भगवते रुद्राय" इत्यादि मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके इसकी धूप देने मात्रसेही उस घरमेंके समस्त साँप, पिशाच, राक्षस, भूतप्रेत आदि भाग जाते हैं। यह माहेश्वर धूप ऐकाहिक, द्व्याहिक, तिजारी, चौथिया आदि सब प्रकारके ज्वरोंको निस्सन्देह दूर करती है ॥ ४२६-४२७ ॥
इति सामान्यज्वरचिकित्सा ।
जीर्णज्वरकी चिकित्सा ।
पिप्पलीचूर्णसंयुक्तः क्वाथश्छिन्नरुहोद्भवः ।
जीर्णज्वरकफध्वंसी पंचमूलीकृतोऽथवा ॥ १ ॥
गिलोयके क्वाथमें पीपलका चूर्ण डालकर अथवा बृहत्पंचमूल (बेलकी छाल, सोनापाठेकी छाल, कुम्भेरीकी छाल, पाढलकी छाल और अरणीकी छाल) के काढेमें पीपलका चूर्ण डालकर पानकरनेसे पुराना ज्वर और कफ दूर होता है ॥ १ ॥