भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 112, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ें८० | भैषज्यरत्नावली । | [ चिकित्सा-
पिप्पलीमधुसम्मिश्रं गुडूचीस्वरसं पिबेत् ।
जीर्णज्वरकफप्लीहकासारोचकनाशनम् ॥ २ ॥
गिलोयके स्वरसमें पीपलका चूर्ण और शहद मिलाकर पान करनेसे जीर्णज्वर, कफ, प्लीहा ( तिल्ली ), खाँसी, अरुचि आदि सब रोग दूर होते हैं ॥ २ ॥
अस्थिकर्कटपञ्चाङ्गं शुंठ्या चिरज्वरप्रणुत् ॥ ३ ॥
“अस्थिकर्कटस्य मूलवल्कलपत्रपुष्पफलं संक्षुद्य पोटलीं बद्ध्वा दग्ध्वा रसं गृहीत्वा शुण्ठ्या पेयः ।”
अस्थिकर्कट वृक्षके पंचांग ( जड, छाल, पत्ते, फल, पुष्प ) इस पंचाङ्गको एकत्र कूटकर उसको कपडेकी पोटलीमें बाँधकर पुटपाककी विधिसे अग्निमें पकावे । उसमेंसे जो रस निकले उसको लेकर उसमें सोंठका चूर्ण डालकर पान करनेसे बहुत कालका पुराना जीर्णज्वर दूर होता है ॥ ३ ॥
गुडूचीपर्पटो भेकपर्णी च हिलमोचिका ।
पटोलं पुटपाकेन रस एषां मधुप्लुतः ॥ ४ ॥
वातपित्तज्वरं हन्ति चिरोत्थमपि दारुणम् ।
मधुना सर्वज्वरनुच्छेफालीदलजो रसः ॥ ५ ॥
गिलोय, पित्तपापडा, मण्डूकपर्णी, हुलहुल और परवल इन सबको एकत्र पुटपाककी विधिसे पकाकर और उसका रस निकालकर शहद डालकर पान करे । यह प्रयोग बहुत पुराने और दारुण वातपित्तजन्य ज्वरको नष्ट करता है । इसी प्रकार हारसिंगारके पत्तोंके रसमें शहद डालकर पान करनेसे सब प्रकारके ज्वर नष्ट होते हैं ॥ ४-५ ॥
निदिग्धिकादि क्वाथ ।
निदिग्धिकानागरकामृतानां क्वाथं पिबेन्मिश्रितपिप्पलीकम् ।
जीर्णज्वरारोचककासशूलश्वासाग्निमान्द्यार्दितपीनसेषु॥ ६ ॥
हन्त्यूर्द्धनामयं प्रायः सायं तेनोपयुज्यते ।
एतद्रात्रिज्वरे सायमन्यथा प्रातरिष्यते ॥
पित्तानुबन्धे सन्त्यज्य पिप्पलीं प्रक्षिपेन्मधु ॥ ७ ॥
कटेरी, सोंठ और गिलोय इन तीनों ओषधियोंका एकत्र क्वाथ बनाकर उसमें पीपलका चूर्ण डालकर पान करनेसे जीर्णज्वर, अरुचि, खाँसी, शूल, श्वास,