भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१११४ भैषज्यरत्नावली । [ विसर्प-
निम्बपत्रं हरिद्रे । विविधविधविसर्पान् कुष्ठविस्फोट- कण्डूरपनयति मसूरीं शीतपित्तं ज्वरं च ॥ ५ ॥
गिलोय, अडूसा, पटोलपत्र, नागरमोथा, सतवन, खैर, सारिवा, नीमके पत्ते, हल्दी और दारुहल्दी इनका विधिपूर्वक क्वाथ बनाकर पान करनेसे नानाप्रकारके विसर्परोग, कोढ, विस्फोटक, खुजली, मसूरी, शीतपित्त और ज्वर इत्यादि रोग दूर होते हैं ॥ ५ ॥
नवकषाय-गुग्गुलु ।
अमृतवृषपटोलं निम्बवल्कैरुपेत्तं त्रिफलखदिरसारं व्याधिघातं च तुल्यम् । कथितमिदमशेषं गुग्गुलोर्भाग- युक्तं जयति विषविसर्पान्कुष्ठमष्टादशाख्यम् ॥ ६ ॥
गिलोय, अडूसेकी छाल, परवल, नीमकी छाल, हरड, बहेडा, आमला, खैरसार और अमलतासका गूदा इनको समान भाग लेकर क्वाथ बनावे । उस क्वाथमें एक तोला शुद्ध गूगल डालकर पान करे तो यह क्वाथ विषजन्य विसर्प, १८ प्रकारके कोढ तथा अन्य समस्त विकारोंको शीघ्र जीतता है ॥ ६ ॥
कालाग्निरुद्ररस ।
सूताभ्रकान्तलौहानां भस्म गंधकमाक्षिकम् । वन्यकर्कोटकद्रावैस्तुलां मर्द्यं दिनावधि ॥ ७ ॥ वन्यकर्कोटिकाकन्दे क्षिप्त्वा लिप्त्वा मृदा बहिः। भूधराख्ये पुटे पश्चाद्दिनैकं तद्विपाचयेत् ॥ ८ ॥ दशमांशं विषं योज्यं माषमात्रं तु भक्षयेत् । रसः कालाग्निरुद्रोऽयं दशाहेन विसर्पनुत् ॥ पिप्पलीमधुसंयुक्तमनुपानं प्रकल्पयेत् ॥ ९ ॥
शुद्ध पारा, अभ्रक, कान्तलोहभस्म, शुद्ध गन्धक और सोनामाखी इनको समान भाग लेकर वनककोडेके रसमें एक दिनतक खरलकर बनककोडेके कन्दमें रक्खे और ऊपर मिट्टीसे ल्हेसकर भूधरयन्त्रमें एक दिनतक पुटपाक करे । जब पककर शीतल होजाय तब सम्पूर्ण औषधिके दशभागकी बराबर विष मिलाकर एकत्र पीसलेवे । फिर प्रतिदिन प्रातःकाल इसको एक मासा प्रमाण लेकर पीपलके चूर्ण और शहदमें मिलाकर भक्षण करे तो यह कालाग्निरुद्ररस दस दिनमें ही विसर्परोगको नष्ट करता है ॥ ७-९ ॥