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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

१११४ भैषज्यरत्नावली । [ विसर्प-

निम्बपत्रं हरिद्रे । विविधविधविसर्पान् कुष्ठविस्फोट- कण्डूरपनयति मसूरीं शीतपित्तं ज्वरं च ॥ ५ ॥

गिलोय, अडूसा, पटोलपत्र, नागरमोथा, सतवन, खैर, सारिवा, नीमके पत्ते, हल्दी और दारुहल्दी इनका विधिपूर्वक क्वाथ बनाकर पान करनेसे नानाप्रकारके विसर्परोग, कोढ, विस्फोटक, खुजली, मसूरी, शीतपित्त और ज्वर इत्यादि रोग दूर होते हैं ॥ ५ ॥

नवकषाय-गुग्गुलु ।

अमृतवृषपटोलं निम्बवल्कैरुपेत्तं त्रिफलखदिरसारं व्याधिघातं च तुल्यम् । कथितमिदमशेषं गुग्गुलोर्भाग- युक्तं जयति विषविसर्पान्कुष्ठमष्टादशाख्यम् ॥ ६ ॥

गिलोय, अडूसेकी छाल, परवल, नीमकी छाल, हरड, बहेडा, आमला, खैरसार और अमलतासका गूदा इनको समान भाग लेकर क्वाथ बनावे । उस क्वाथमें एक तोला शुद्ध गूगल डालकर पान करे तो यह क्वाथ विषजन्य विसर्प, १८ प्रकारके कोढ तथा अन्य समस्त विकारोंको शीघ्र जीतता है ॥ ६ ॥

कालाग्निरुद्ररस ।

सूताभ्रकान्तलौहानां भस्म गंधकमाक्षिकम् । वन्यकर्कोटकद्रावैस्तुलां मर्द्यं दिनावधि ॥ ७ ॥ वन्यकर्कोटिकाकन्दे क्षिप्त्वा लिप्त्वा मृदा बहिः। भूधराख्ये पुटे पश्चाद्दिनैकं तद्विपाचयेत् ॥ ८ ॥ दशमांशं विषं योज्यं माषमात्रं तु भक्षयेत् । रसः कालाग्निरुद्रोऽयं दशाहेन विसर्पनुत् ॥ पिप्पलीमधुसंयुक्तमनुपानं प्रकल्पयेत् ॥ ९ ॥

शुद्ध पारा, अभ्रक, कान्तलोहभस्म, शुद्ध गन्धक और सोनामाखी इनको समान भाग लेकर वनककोडेके रसमें एक दिनतक खरलकर बनककोडेके कन्दमें रक्खे और ऊपर मिट्टीसे ल्हेसकर भूधरयन्त्रमें एक दिनतक पुटपाक करे । जब पककर शीतल होजाय तब सम्पूर्ण औषधिके दशभागकी बराबर विष मिलाकर एकत्र पीसलेवे । फिर प्रतिदिन प्रातःकाल इसको एक मासा प्रमाण लेकर पीपलके चूर्ण और शहदमें मिलाकर भक्षण करे तो यह कालाग्निरुद्ररस दस दिनमें ही विसर्परोगको नष्ट करता है ॥ ७-९ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १११५

वृषखदिरपटोलपत्रनिम्बत्वगमृतामलकीकषायकल्कैः ।
घृतमभिनवमेतदाशु पक्वं जयति विसर्पगदान्सकुष्ठगुल्मान् ॥
अडूसा, खैर, पटोलपात, नीमकी छाल, गिलोय और आमले इनके क्वाथ और कल्कके साथ शुद्ध और नवीन गोघृतको विधिपूर्वक पकावे । यह घृत विसर्प, कुष्ठ और गुल्मरोगको तत्काल शान्त करता है ॥ १० ॥

करञ्जतैल ।
करञ्जसप्तच्छदलाङ्गलीकस्नुह्यर्कदुग्धानलभृङ्गराजैः ।
तैलं निशामूत्रविषैर्विपक्वं विसर्पस्फोटविचार्चिकान्नम् ॥ ११ ॥
करंजुआ, सतौना, कलिहारी, थूहरका दूध, आकका दूध, चीतेकी जड और भाँगरा इनके क्वाथमें हल्दीका कल्क, गोमूत्र और विष डालकर तिलके तेलको पकावे । यह तेल विसर्प विस्फोटक और विचार्चिका रोगको नष्ट करता है ॥ ११ ॥

विसर्परोगमें पथ्य ।
विरेको वमनं लेपो लङ्घनं रक्तमोक्षणम् ।
पुराणा यवगोधूमकङ्गुषष्टिकशालयः ॥ १२ ॥
मुद्गा मसूराश्चणकास्तुवर्यो जाङ्गलो रसः ।
नवनीतं घृतं द्राक्षा दाडिमं कारवेल्लकम् ॥ १३ ॥
वेत्राग्रं कुलकं धात्री खदिरो नागकेशरः ।
लाक्षा शिरीषः कर्पूरं चन्दनं तिललेपनम् ॥ १४ ॥
ह्रीबेरकं मुस्तकं च तिक्तानि सकलानि च ।
यथादोषमिदं पथ्यं सेवितव्यं विसर्पिभिः ॥ १५ ॥
विरेचन, वमन, लेप, लंघन और रक्तमोक्षण करना, पुराने जौ, गेहूँ, माल-काङ्गनी, साँठी और शालिके चावल मूँग, मसूर, चने, अडहर, जंगली जीवोंकों मांसरस, नैनी घी, दाख, अनार, करेला, बेंतके अंकुर, पटोलपत्र, आमले, खैर, नागकेशर, लाख, सिरस, कपूर, चन्दन, शरीरपर तेलकी मालिश, सुगन्धवाला, नागरमोथा और कडवे पदार्थ ये सब दोषानुसार सेवन करनेसे विसर्प रोगियोंको हितकारी हैं ॥ १२–१५ ॥

विसर्परोगमें अपथ्य ।
व्यायाममह्नि शयनं सुरतं प्रवातं क्रोधं शुचं वमन-

१११६ भैषज्यरत्नावली । [ विस्फोट-

वेगमसूयनं च । शाकं विरुद्धमशनं दधि कूर्चिकां च सौवीरमासवमनेकविधं किलाटम् ॥ १६ ॥ गुर्वन्नपान- मखिलं लशुनं कुलत्थान् माषांस्तिलान्सकलमांस- मजाङ्गलं चास्वेदं विदाहि लवणाम्लकटूनि मद्यान्यर्क प्रभामपि विसर्पगदी त्यजेत्तु ॥ १७ ॥ कसरत करना दिनमें सोना स्त्रीप्रसङ्ग प्रवलवायु या पुर्वाई हवाका सेवन क्रोध शोक करना वमनके वेगको रोकना ईर्ष्या करना शाक विरुद्ध भोजन दही कूर्चिका ( जो पदार्थ दही और दूधको औटाकर बनाये जाते हैं ) काँजी अनेक प्रकारकें आसव किलाट ( फटे दूधका मावा ) सर्वप्रकारके गुरुपाकी अन्न और पानीयद्रव्य लहसुन कुलथी उड़द तिल जङ्गलीजीवोंके मांसके अतिरिक्त अन्य सर्वप्रकारके मांस स्वेद लानेवाले दाहकारक द्रव्य लवण खटाई और कडवे द्रव्य मदिरा तथा धूप इनको विसर्परोगी शीघ्र त्याग देवे ॥ १६ ॥ १७ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्याम् विसर्पचिकित्सा ॥

विस्फोट-चिकित्सा ।

विस्फोटे लङ्घनं कार्यं वमनं पथ्यभोजनम् । यथादोषबलं वीक्ष्य युक्तियुक्तं विरेचनम् ॥ १ ॥ विस्फोटरोगमें दोषोंका बलाबल विचारकर लंघन वमन पथ्यभोजन और विरेचन करना युक्तियुक्त कहा है ॥ १ ॥

पटोलामृतभूनिम्बवासकारिष्टपर्पटैः । खदिराब्दयुतैः क्वाथो विस्फोटोर्त्तिज्वरापहः ॥ २ ॥ पटोलपत्र, गिलोय, चिरायता, अडूसेकी छाल, नीमकी छाल, पित्तपापडा, खैर और नागरमोथा इनका क्वाथ बनाकर पान करनेसे विस्फोट ( एक प्रकारका विषैलाफोडा ) की पीडा और ज्वर दूर होता है ॥ २ ॥

पटोलत्रिफलारिष्टगुडूचीमुस्तचन्दनैः । समूर्वा रोहिणी पाठा रजनी सदुरालभा ॥ ३ ॥ कषायं पाययेदेतच्छ्लेष्मपित्तज्वरापहम् । कण्डूत्वग्दोषविस्फोटविषवीसर्पनाशनम् ॥ ४ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १११७


परवल, त्रिफला, नीमकी छाल, गिलोय, नागरमोथा, लालचन्दन, मूर्वा, कुटकी, पाठ, हल्दी और धमासा इनका क्वाथ बनाकर पान करावे तो यह क्वाथ कफ-पित्तजन्य ज्वर, खुजली, त्वचाके विकार, विस्फोटक और विसर्प रोगको नष्ट करता है ॥ ३ ॥ ४ ॥

व्रणारिगुग्गुलु ।

पलं कृष्णा पुरः पञ्च त्रिफला त्रिपलं भवेत् ।
भस्मसूतपलं चास्य कर्षः सर्वव्रणापहः ॥ ५ ॥

पीपल ४ तोले, गूगल २१ तोले, हरड बहेडा, आमला प्रत्येक चार चार तोले और रससिन्दूर ४ तोले इन सबोंको एकत्रकर उत्तमप्रकार खरल करलेवे । इसको उपयुक्त मात्रासे सेवन करे तो यह सर्वप्रकारके व्रणोंको दूर करता है ॥ ५ ॥

पञ्चतिक्तकघृत ।

पटोलसप्तच्छदनिम्बवासफलत्रिकच्छिन्नरुहाविपक्वम् ।
तत्पंचतिक्तं घृतमाशु हन्ति त्रिदोषविस्फोटविसर्पकण्डूः ॥६॥

पटोलपत्र, सतौना, निम्बछाल, अडूसा और गिलोय इनके क्वाथ तथा त्रिफलाके कल्कद्वारा यथाविधि घृतको पकावे । यह पञ्चतिक्तकघृत यथानियम पान करे तो यह त्रिदोषोत्पन्नविसर्प, विस्फोटक और खुजलीको तत्काल नाश करता है ॥

विस्फोटरोगमें पथ्य ।

विरेचनच्छर्द्दनलेपलङ्घनं पुरातनाः षष्टिकशालयो यवाः ।
मुद्गा मसुराश्चणका मुकुष्ठका धन्वामिषं गव्यघृतं कठिल्लकम् ॥७॥
वेत्राग्रमाषाढफलं पटोलकं ज्योतिष्मती निम्बदलानि चन्दनम् ।
तैलं सिताभ्रं तिललेपनं घनं बालं च विस्फोटगदं विनाशयेत् ॥ ८ ॥

जुलाब देना, वमन कराना, लेप करना, लंघन, पुराने साँठी और शालिके चावल, जौ, मूँग, मसूर, चने, मोठ, मरुदेशजन्य जीवोंका मांसरस, गौका घी, करेला, बेंतकी कोंपल, ढाकके बीज, परवल, मालकांगनी, नमिके पत्ते, लालचन्दन, तेल, कपूर, तेलकी मालिश, नागरमोथा और सुगन्धवाला ये सब पदार्थ विस्फोटरोगको नष्ट करनेवाले हैं, इसलिये उक्त रोगीको ये सब सेवन करने चाहिये ॥७ ॥ ८॥

१११८ भैषज्यरत्नावली। [ मसूरिका-

विस्फोटरोगमें अपथ्य।

स्वेदं व्यवायं व्यायामं क्रोधं गुर्वन्नमातपम् ।
वमिवेगं पत्रशाकं प्रवातं स्वप्नं दिवा ॥ ९ ॥
ग्राम्यौदकानूपमांसं विरुद्धान्यशनानि च ।
तिलान्यवान्कुलत्थांश्च लवणाम्लकटूनि च ॥
विदाहि रूक्षमुष्णं च विस्फोटी परिवर्जयेत् ॥ १० ॥

पसीना निकलना, मैथुन, कसरत और क्रोधकरना, दुष्पाच्य अन्न, धूपका सेवन, वमनके वेगका रोध, पत्तोंवाले शाक, अत्यन्ततीक्ष्ण वायुका सेवन, दिनको सोना, ग्रामीण जीव, जलचर और अनूपदेशके प्राणियोंका मांस विरुद्ध खान पान, तिल, जौ, कुलथी, नमक, खट्टे और चरपरे, दाहकारी, रूखे और गरम ये सब पदार्थ विस्फोटवाला रोगी बहुत शीघ्र छोड़ देवे ॥ ९ ॥ १० ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां विस्फोटचिकित्सा।


मसूरिकाकी चिकित्सा।

चैत्रासितभूतदिने रक्तपताकान्विता स्नुहिर्भवेन ।
धवलितकलशे न्यस्ता पापरोगं दूरतो धत्ते ॥ १ ॥

चैत्रमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशीके दिन शुभ्रवर्णवाले कलसेके ऊपर लालरंगके वस्त्रसे बनाई हुई थूहरके वृक्षकी शाखाकी पताका स्थापन करनेसे मसूरिका (वसन्त) रोग दूर भाग जाता है ॥ १ ॥

नारीणां वामपार्श्वस्थं नराणामपसव्यगम् ।
पापरोगमयं दूरात् शिवास्थि विनिवारयेत् ॥ २ ॥

स्त्रियोंकी बाईं पसलीमें और पुरुषोंके दाहिनी पसलीपर हरडका बीज (किसीके मतमें गीदड़की हड्डी) धारण करनेसे पापरोग समूह जाता रहता है ॥

ज्वरे जाते स्पृशेन्नाम्बु तिष्ठेन्निर्वातवेश्मनि ।
म्रक्षयेद्विजयाचूर्णैर्गात्रं वस्त्रेण बन्धयेत् ॥ ३ ॥

मसूरिकारोगमें ज्वर उत्पन्न होनेपर जलका स्पर्श न करे और वातरहित स्थानमें निवास करे। भाँगके चूर्णको शरीरमें मलकर वस्त्रसे ढकदेवे ॥ ३ ॥

रुद्राक्षं मरिचैर्युक्तं पीतं पर्युषिताम्भसा ।
त्र्यहात्पापरुजं हन्ति दृष्टं वारसहस्रशः ॥ ४ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १११९

रुद्राक्ष और कालीमिरचके चूर्णको बासीजलके साथ पान करनेसे तीन दिनमेंही पापरोग ( मसूरिका ) नष्ट होता है। यह हजारों बार अनुभव कर देखागया है ॥ ४ ॥

सर्वासां वमनं पथ्यं पटोलारिष्टवत्सकैः ।
कषायैश्च वचावत्सयष्ट्याह्वफलकल्कितैः ॥ ५ ॥

सर्वप्रकारकी मसूरिकामें पटोलपात, नीमके पत्ते और इन्द्रजौ इनके क्वाथमें वच, इन्द्रजौ, मुलहठी और मैनफलका चूर्ण डालकर वमन कराना हितकर है ॥५॥

सक्षौद्रं पाययेद्ब्राह्मया रसं वा हैलमोचिकम् ।
वान्तस्य रेचनं देयं शमनं चाबले नरे ॥ ६ ॥

ब्राह्मीके रस अथवा हुलहुलके रसमें शहद मिलाकर पान कराकर वमन करावे, पश्चात् विरेचन करावे । किन्तु दुर्बलरोगीको शमनकारक औषधि देना ॥ ६ ॥

सुषवीपत्रनिर्यासं हरिद्राचूर्णसंयुतम् ।
रोमान्तीज्वरविस्फोटमसूरीशान्तये पिबेत् ॥ ७ ॥

करेलेके पत्तोंके स्वरसमें हल्दीका चूर्ण डालकर पान करे तो रोमान्ती ( जिससे रोम खडे होजायँ ) ज्वर, विस्फोट और मसूरिकारोग शान्त होते हैं ॥ ७ ॥

उष्ट्रकण्टकमूलं वाप्यनन्तामूलमेव वा ।
विधिगृहीतं ज्येष्ठाम्बु पीतं हन्ति मसूरिकाम् ॥ ८ ॥

ऊँटकटेलीकी जड अथवा अनन्तमूलको चावलोंके जलमें पीसकर पान करनेसे मसूरिकारोग नष्ट होता है ॥ ८ ॥

तद्वच्छृगालकण्टकमूलं च व्युषिताम्भसा ।
निशाचिञ्चाच्छदे शीतवारिपीते तथैव च ॥
व्युषिताम्बुना मरिचं पिबेत्पीतकपर्दकम् ॥ ९ ॥

शृगालकटेरीकी जडको बासीपानीके साथ पीसकर अथवा हल्दी और इमलीके पत्तोंको शीतलजलमें पीसकर किम्वा कालीमिरच और पीली कौडीके चूर्णको बासी जलके साथ पान करनेसे मसूरिका रोग दूर होता है ॥ ९ ॥

यावत्संख्या मसूर्यङ्गे तावद्भिः शैलुजैर्दलैः ।
छिन्नातुरनाम्ना तु गुडिकेति न वर्द्धते ॥ १० ॥

रोगीके शरीरपर मसूरिकाके जितने दाने हों उतने ही लिसौडेके पत्ते लावे रोगीके नामके अक्षरोंकी संख्याके अनुसार उनमेंसे प्रत्येकके उतनेही टुकडे कर- लेवे । इस प्रकार करनेसे मसूरिकाकी संख्या वृद्धिगत नहीं होती ॥ १० ॥

११२० भैषज्यरत्नावली । [ मसूरिका-

व्युषितं वारि सक्षौद्रं पीतं दाहगुडीहरम् ॥ ११ ॥ बासीजल और शहद एकत्र मिलाकर पीनेसे मसूरिकाकी दाह और गूमडियें दूर होती हैं ॥ ११ ॥

तर्पणं वातजायां प्राक् लाजचूर्णैः सशर्करैः । भोजनं तिक्तयूषैश्च प्रतुदानां रसेन वा ॥ १२ ॥ वातज मसूरिकामें प्रथम खीलोंके चूर्णमें खाँड मिलाकर तृप्तिके लिये देवे । तथा कडवेद्रव्योंके यूष और प्रतुद (जो पृथ्वी खुरच खुरच कर या चोंचोंसे वितरित-कर खाते हैं) पक्षियोंके मांसरसके साथ भोजन करावे ॥ १२ ॥

सौवीरेण तु संपिष्टं मातुलुङ्गस्य केशरम् ॥ प्रलेपात्पातयन्त्याशु दाहं चाशु नियच्छति ॥ १३ ॥ बिजौरेनींबूकी केशरको काँजीमें पीसकर लेप करनेसे मसूरिकारोग और उसकी दाह शीघ्र नष्ट होती है ॥ १३ ॥

पाददाहं प्रकुरुते पिडका पादसम्भवा । तत्र सेकं प्रशंसन्ति बहुशस्तण्डुलाम्बुना ॥ १४ ॥ पैरोंमें मसूरिकाकी गूमडियें उत्पन्न होनेसे पैरोंमें दाह होती है उसको दूर करनेके लिये चावलोंके पानीसे बारबार सेंकना चाहिये ॥ १४ ॥

पाककाले तु सर्वांस्ता विशोषयति मारुतः । तस्मात्संरूंहणं कार्यं न तु पथ्यं विशोषणम् ॥ १५ ॥ मसूरिकाके पकनेके समय वायु उसकी गूमडियोंको सुखा देता है । उस समय वायु शमन करनेके लिये रोगीको पौष्टिक आहार देवे । पथ्य द्रव्य और शोषण क्रिया नहीं करे ॥ १५ ॥

गुडूचीं मधुकं द्राक्षां मोरटं डिमैः सह । पाककाले तु दातव्यं भेषजं गुडसंयुक्तम् ॥ तेन पाकं व्रजत्याशु न च वायुः प्रकुप्यति ॥ १६ ॥ मसूरिकाके पकते समय गिलोय, मुलहठी, दाख, ईखकी जड और अनारदाना इन औषधियोंके क्वाथमें गुड डालकर पान करावे । इसमें मसूरिका शीघ्र पकजाती है और वायु कुपित नहीं होता ॥ १६ ॥

लिहेद्वा बादरं चूर्ण पाचनार्थं गुडेन तु । अनेनाशु विपच्यन्ते वातपित्तकफात्मिकाः ॥ १७ ॥

चिकित्सा-] भाषाटीकासहिता। ११२१


बेरकी गुठलीकी मींगके चूर्णको गुडके साथ मिलाकर पाचनके लिये भक्षण करे । इससे त्रिदोषजनित मसूरिका बहुत जल्द पकती है ॥ १७ ॥

शूलाध्मानपरीतस्य कम्पमानस्य वायुना ।
धन्वमांसरसाः शस्ता ईषत्सैन्धवसंयुताः ॥ १८ ॥

यदि वायुके कुपित होनेके कारण शूल, उदरमें अफाग और कम्प हो तो रोगीको कुछ थोडासा सेंधानमक डालकर मरुदेशके पशु पक्षियोंका मांलरस भोजन करावे ॥ १८ ॥

पिबेदम्भस्तप्तशीतं भावितं खदिराशनैः ।
शौचे वारि प्रयुञ्जीत गायत्रीबहुवारजम् ॥१९॥

खैर १ तोला और विजयसार १ तोला इन दोनोंको २ सेर जलमें औटावे । जब औटते औटते एक सेर जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे । फिर शीतलकर प्यास लगनेपर इस जलको पीवे शौचके लिये खैर तथा कीकडके पत्तोंके द्वारा उल्लिखित विधिके अनुसार जल पकाकर शीतल करके प्रयोग करे ॥ १९ ॥

जातीफलं समञ्जिष्ठं दार्वा पूगफलं शमी ।
धात्रीपत्रं समधुकं क्वथितं मधुसंयुतम् ॥
मुखरोगे कण्ठरोगे गण्डूषार्थं प्रशस्यते ॥ २० ॥

जायफल, मञ्जीठ, दारुहल्दी, सुपारी, सेमलकी छाल, आमले और मुलहठी इनके क्वाथमें शहद डालकर मुखरोग और कण्ठरोगमें गण्डूष धारण करे ॥ २० ॥

अक्ष्णोः सेकं प्रशंसन्ति गवेधुमधुकाम्बुना ॥ २१ ॥

गरहेडुआ और मुलहठीको जलमें पीसकर कपडेमें बांधकर रस निचोड लेवे । फिर कुछ गरम कर उससे मसूरिका रोगीकी आँखोंको सेके ॥ २१ ॥

पञ्चवल्कलचूर्णेन क्लेदिनीमवचूर्णयेत् ।
भस्मना केचिदिच्छन्ति केचिद्गोमयरेणुना ॥ २२ ॥

गीली मसूरिकाकी फुन्सियोंपर पञ्चवल्कल ( बड, गूलर, पीपल, पाखर और बेंतकी छाल ) के चूर्णको बुरकना चाहिये अथवा उपलोंकी राख या उपलोंका चुरा छिडकनेसे भी उपकार होता है ॥ २२ ॥

कृमिपातभयाच्चापि धूपयेत्सरलादिभिः ।
वेदनादाहशान्त्यर्थं सुतानां च विशुद्धये ॥ २३ ॥

७१

११२२ भैषज्यरत्नावली । [मसूरिका-

सगुग्गुलुं वराक्वाथं युञ्ज्याद्वा खदिराष्टकम् । कृष्णाभयारजो लिह्यान्मधुना कण्ठशुद्धये ॥ तथाऽष्टाङ्गावलेहश्च कवलश्चार्द्रकादिभिः ॥ २४ ॥ कीडे पडनेके भयसे सरलवृक्षकी धूप देवे तो इससे कीडे उत्पन्न नहीं होते । एवं मसूरिकाकी पीडा और दाहकी शान्तिके लिये तथा सुत (फुन्सियों) के झरनेकी शुद्धिकें लिये त्रिफलेके क्वाथको शुद्ध गूगलमें मिलाकर सेवन करे । अथवा खदिराष्टक क्वाथको पान करे या पीपल और हरडके चूर्णको शहदमें मिलाकर कण्ठकी शुद्धिके लिये चाटे तथा अष्टाङ्गावलेहके खानेसे और अदरख आदिका कवल धारण करनेसे भी कण्ठकी शुद्धि होती है ॥ २३ ॥ २४ ॥

पञ्चतिक्तं प्रयुञ्जीत पानाभ्यञ्जनभोजनैः । कुर्याद् व्रणविधानं च तैलादीन्वर्जयेच्चिरम् ॥ २५ ॥ पान, अभ्यङ्ग और भोजनके वास्ते कुष्ठाधिकारोक्त पञ्चतिक्त घृत प्रयोग करे और व्रणरोगकी विधिके अनुसार चिकित्सा करे । इस रोगमें तैलादि द्रव्य सर्वथा त्याज्य हैं ॥ २५ ॥

घण्टाकर्णं शिवं गौरीं विष्णुं विप्रं च पूजयेत् । आचरेज्जपहोमादीन्व्रतं रोगनिवृत्तये ॥ २६ ॥ इस रोगमें घण्टाकर्ण, शिव, पार्वती, विष्णु भगवान् और ब्राह्मणोंको पूजे । एवं जप, होमादि अनुष्ठान और मसूरिकारोगकी शान्तिके लिये व्रतादि करे ॥ २६ ॥

अगदानि विषघ्नानि रत्नानि विविधानि च । धारयेद्वाचयेच्चापि वैनतेयस्य संहिताम् ॥ २७ ॥ तदनन्तर रोगनाशक और विषहरण भाँतिभाँतिके रत्नोंको धारण करे और गरुडपुराणका पाठ करे ॥ २७ ॥

तेषु दुष्टव्रणेष्वेव जलौकाभिर्हरेदसृक् । व्रणशोथहरं योगमाचरेत्तत्प्रशान्तये ॥ २८ ॥ दुष्टव्रण होजानेपर जोंक लगवाकर रुधिर निकलवावे और व्रणकी सूजनको दूर करनेके लिये शोथनाशक चिकित्सा करे ॥ २८ ॥

विषघ्नैः सिद्धमन्त्रैश्च प्रमृज्यात्तु पुनः पुनः । भक्त्या पठेत्पाठयच्च शीतलायाः स्तवं शुभम् ॥ २९ ॥ विषको हरण करनेवाले सिद्धमन्त्रोंसे बारबार मार्जन करे और श्रद्धाभक्तिसे शीतलाके शुभ स्तोत्रको स्वयं पढे तथा दूसरोंसे पढावे ॥ २९ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११२३

पटोलादि ।

पटोलकुण्डलीमुस्तवृषधन्वयवासकैः ।
भूनिम्बनिम्बकटुकापर्पटैश्च शृतं जलम् ॥ ३० ॥
मसूरीं शमयेदासां पक्वं चैव विशोषयेत् ।
नातः परतरं किञ्चिद्विस्फोटज्वरशान्तये ॥ ३१ ॥

पटोलपत्र, गिलोय, नागरमोथा, अडूसा, धमासा, चिरायता, नीमकी छाल, कुटकी और पित्तपापडा इनके द्वारा औटाकर शीतल कियाहुआ जल पान करनेसे अपक्व मसूरिका शमन और पकीहुई मसूरिका शुष्क होती हैं । विस्फोट और ज्वरको नष्ट करनेके लिये इससे बढकर कोई औषधि नहीं है ॥ ३० ॥ ३१ ॥

अमृतादि ।

अमृतादिकषायश्च विसर्पोक्तं प्रयोजयेत् ॥ ३२ ॥
इसमें विसर्परोगमें कहाहुआ अमृतादिकवाथ भी सेवन कराना चाहिये ॥ ३२ ॥

इन्दुकलावटिका ।

शिलाजत्वयसी हेम सम्मर्द्यार्जकवारिणा ।
गुञ्जामात्रां वटीं कृत्वा कुर्याच्छायाविशोषिताम् ॥ ३३ ॥
मसूरिकायां विस्फोटे ज्वरे लोहितसंज्ञके ।
एकैकां दापयेदासां सर्वव्रणगदेषु च ॥ ३४ ॥

शिलाजीत, लोहभस्म और स्वर्णभस्म इनको समान भाग लेकर वनतुलसीके रसमें अच्छे प्रकार खरल करके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनाकर छायामें सुखा- लेवे । इनमेंसे मसूरिका, विस्फोट, ज्वर, रक्तविकार और सर्वप्रकारके व्रणरोगोंमें एक एक गोली देवे । इसके सेवनसे उक्त रोग शीघ्र नष्ट होते हैं ॥ ३३ ॥ ३४ ॥

मसूरिकारोगमें पथ्य ।

पूर्वं लङ्घनवान्तिरेचनशिरावेधाश्शशाङ्कोज्ज्वला
जीर्णाष्षष्टिकशालयोऽपि चणका मुद्गा मसूरा यवाः ।
सर्वेऽपि प्रतुदाः कपोतचटका दात्यूहक्रौञ्चादयो
जीवञ्जीवशुकादयोऽपि कुलकं कार्वेल्लमाषाढकम् ॥ १५॥
कर्कोटं कदलं च शिग्रुरुचकं द्राक्षाफलं दाडिमं
मेध्यं बृंहणमन्नपानमखिलं कोलानि माषो रसः ।

११२४ भैषज्यरत्नावली । [ मसूरिका-

अक्ष्णोः सेकविधौ गवेधुमधुकोद्भूतं सुशीतोदकं
शम्बूकोदरकोषनीरमपि वा कर्पूरचूर्णानि वा ॥ ३६ ॥

मसूरिका रोगमें प्रथम लंघन, वमन, विरेचन, शिरावेध कराना ( फस्तखुलवाना ) चाहिये । पश्चात् निर्मल चन्द्रमाकी कान्तिके समान उज्ज्वल पुराने साँठी और शालिधानोंके चावल, चने, मूँग, मसूर, जौ तथा कबूतर, चिड़िया, दात्यूह ( पक्षिविशेष ) अथवा पपैहा, कुररपक्षी, चकोर, तोता और अन्य सर्व प्रकारके प्रतुद ( चोंचसे फोड़कर खानेवाले, कौआ, मोर, श्येनादि ) पक्षियोंका मांस, पटोलपात, करेला, ढाकके बीज, ककोड़ा, कच्चा केला, सहिंजना, बिजौरानीम्बू, दाख, अनार, पवित्र और पुष्टिकर अन्नपान, पकेहुए सूखे बेर और उडदोंका यूष इनका भोजन एवं गवेधु ( तृणधान्यविशेष ) और मुलहठीके द्वारा सिद्ध कियेहुए शीतल जलसे अथवा घोंघेके भीतरके जलसे आँखोंपर सेंक करना या कपूरका चूर्ण मिलाकर जलसे छींटे देने चाहिये ॥ ३५ ॥ ३६ ॥

पक्वे मुद्गरसोऽपि जाङ्गलरसः शालिक्षशाकं घृतं
निर्गुण्डीदलयक्षधूपविहितो धूपो मृदुर्मुक्तिः ।
शश्वद्गोमयभस्मगुग्गुलमथो शुष्के शिलापिष्टयो-
रालेपः पिचुमर्दपत्रनिशयोः शेषे व्रणोक्ताः क्रियाः ॥३७॥
इत्थं सर्वदशाविभागविहितं पथ्यं यथादोषतः
संयुक्तं मुदमातनोति नितरां नृणां मसूरीगदे ॥ ३८ ॥

पकीहुई मसूरिकामें मूँगका रस, जङ्गलीजीवोंका मांसरस, शान्तिशाक, घृत, सिद्धाल्हक पत्ते और राल इनका धूप बनाकर विधिपूर्वक धूनी देवे, शरीरपर निरन्तर उपलोंकी राख और गूगलको सूखी शिलपर पीसकर मर्दन करे। मसूरिकाकी फुन्सियोंके सूखजानेपर नीमके सूखे पत्ते और कच्ची हल्दीको पीसकर लेप करे, पश्चात् व्रणरोगोक्त चिकित्सा करे। इस प्रकार सब अवस्थाओंके विभागमें विधानकियेहुए पथ्यको यथादोषानुसार सेवन करनेसे मसूरिकायुक्त रोगियोंको आरोग्यरूपी आनन्दलाभ होता है ॥ ३७ ॥ ३८ ॥

मसूरिकारोगमें अपथ्य ।

रतिं स्वेदं श्रमं तैलं गुर्वन्नं क्रोधमातपम् ।
दुष्टाम्बु दुष्टपवनं विरुद्धान्यशनानि च ॥ ३९ ॥

चिकित्साभाषाटीकासहिता ।११३५

निष्पावमालुकं शाकं लवणं विषमाशनम् ।
कट्वम्लं वेगरोधं च मसूरीगदवांस्त्यजेत् ॥ ४० ॥
मसूरीरोगवाला मनुष्य मैथुन, स्वेदक्रिया, परिश्रम, तेल, भारी अन्नोंका सेवन, क्रोध, धूपका सेवन, दूषितजल, दूषितवायु, विरुद्धभोजन, सेमकी फली, आलु, शाक, नमक, विषम आहार, चरपरे और खट्टे द्रव्य एवं मलमूत्रादिके वेगकों रोकना इन सबको तत्काल त्यागदेवे ॥ ३९ ॥ ४० ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां मसूरिकाचिकित्सा ।

क्षुद्ररोगोंकी चिकित्सा ।

अजगल्लिका-चिकित्सा ।

तत्राजगल्लिकामामां जलौकाभिरुपाचरेत् ।
शुक्तिसौराष्ट्रिकाक्षारकल्कैश्चालेपयेन्मुहुः ॥ १॥
प्रथम अपक्वअजगल्लिकाके रुधिरको जोंक लगवाकर निकलवादे, पश्चात् सीप, सोरठदेशकी मिट्टी और जवाखार इनको एकत्र पीसकर बारबार लेपकरे ॥ १ ॥

नवीनकण्टकार्याश्च कण्टकैर्वेधमात्रतः ।
किमाश्चर्यं विपच्याशु प्रशाम्यन्त्यजगल्लिकाः ॥ २ ॥
नवीन कटेरीके काँटोंके द्वारा अजगल्लिकाको विद्धकरनेसे वह शीघ्र ही पच कर नष्ट होजाती है ॥ २ ॥

वृषमूलविशालाभ्यां लेपो हन्त्यजगल्लिकाम् ।
कठिनां क्षारयोगैश्च द्रावयेदजगल्लिकाम् ॥ ३ ॥
अड़ूसेकी जड और इन्द्रायणकी जडकी छाल इन दोनोंको एकत्र पीसकर लेप करनेसे अजगल्लिकारोग दूर होता है । यदि अजगल्लिका अत्यन्त कठिन हों तौ उसको क्षारादि औषधियोंके द्वारा नर्म करे ॥ ३ ॥

अनुशयी विवृतेन्द्रविद्धादि रोगोंकी चिकित्सा ।

श्लेष्मविद्रधिकल्पेन जयेदनुशयीं भिषक् ।
विवृतामिन्द्रविद्धां च गर्दभीं जालगर्दभम् ॥ ४ ॥

११२६भैषज्यरत्नावली ।[ क्षुद्ररोग-

इरिवेल्लिं गन्धमालां जयेत्पित्तविसर्पवत् ।
मधुरौषधिसिद्धेन सर्पिषा शमयेद्व्रणम् ॥ ५ ॥

अनुशयी नामक क्षुद्ररोगकी कफजविद्रधिकी चिकित्साके समान चिकित्सा करनी चाहिये । विवृता, इन्द्रवृद्धा, गर्दभी, जालगर्दभ, इरिवेल्लिका और गन्धमाला आदि रोगोंकी पित्तजविसर्पकी समान चिकित्सा करनी चाहिये । मधुरौषधि अर्थात् काकोल्यादिगणकी औषधियोंके साथ घृतको पकाकर व्रणकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ४ ॥ ५ ॥

विदारिका पनसिकादि-क्षुद्ररोगोंकी चिकित्सा ।

रक्तावसेकैर्बहुभिः स्वेदनैरपतर्पणैः ।
जयेद्विदारिकां लेपैः शिग्रुदेवद्रुमोद्भवैः ॥ ६ ॥
पनसिकां कच्छपिकामनेन विधिना भिषक् ।
अन्त्रालजीं कच्छपिकां तथा पाषाणगर्दभम् ॥
साधयेत्कठिनान्याञ्शोथान्दोषसमुद्भवान् ॥ ७ ॥

प्रथम विदारिका, पनसिका और कच्छपिका नामक क्षुद्ररोगकी चिकित्सा अधिक रक्तमोक्षण, स्वेदन और अपतर्पणादि क्रियाओंके द्वारा करनी चाहिये पश्चात् सहिंreference/सहिंजनेकी छाल और देवदारुको एकत्र पीसकर लेप करना चाहिये । शोथयुक्त अन्त्रालजी, कच्छपिका और पाषाणगर्दभरोगकी भी चिकित्सा इसी विधिसे करनी चाहिये ॥ ६ ॥ ७ ॥

पाषाणगर्दभकी चिकित्सा ।

सुरदारुशिलाकुष्ठैः स्वेदयित्वा प्रलेपयेत् ।
कफमारुतशोथघ्नो लेपः पाषाणगर्दभे ॥ ८ ॥

पाषाणगर्दभरोगमें प्रथम स्वेदन करके पश्चात् देवदारु, मैनसिल और कूठ इन औषधियोंको एकत्र पीसकर गरम करके लेप करे । यह लेप कफ, वात और शोथको नष्ट करता है ॥ ८ ॥

वल्मीकरोगकी चिकित्सा ।

शस्त्रेणोद्धृतवल्मीकं क्षाराग्निभ्यां प्रसाधयेत् ।
मनःशिलालभल्लातसूक्ष्मैलागुरुचन्दनैः ॥ ९ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहितां । ११२७

जातीपल्लवकल्कैश्च निम्बतैलं विपाचयेत् । वल्मीकं नाशयेत्तद्धि बहुच्छिद्रं बहुद्रवम् ॥ १० ॥ सशोथं व्रणगन्धं च प्रवृद्धं मर्मसु स्थितम् । हस्तपादस्थितं चापि वल्मीकं परिवर्जयेत् ॥ ११ ॥

वल्मीकरोगको अस्त्रके द्वारा काटकर क्षार और अग्निका प्रयोग करे। मैनसिल, भिलावा, हरिताल, छोटी इलायची, अगर, चन्दन और चमेलीके पत्ते इन औषधियोंके कल्कद्वारा नीमके तेलको पकाकर व्रणस्थानमें लेप करे। इस तेलको मर्दन करनेसे बहुत छिद्र और बहुत पीववाला वल्मीकरोग नष्ट होता है। शोथयुक्त, जिसमें व्रणके समान गन्ध आती हो, अत्यन्त बढाहुआ, मर्मस्थानोंमें उत्पन्न हुआ और हाथपावोंमें उत्पन्न हुआ वल्मीकरोग असाध्य है, इसलिये इनकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये ॥ ९-११ ॥

पाददारी ( बिबाई की ) चिकित्सा ।

पाददारीषु च शिरां वेधयेत्तलशोधिनीम् ॥ १२ ॥ स्नेहस्वेदोपपन्नौ तु पादौ चालेपयेन्मुहुः ॥ मधूच्छिष्टवसामज्जघृतक्षारैर्विमिश्रितैः ॥ १३ ॥

पाददारीरोगमें प्रथम पैरके तलुएँकी शिराको विद्ध करके रक्त निकलवावे। पश्चात् स्निग्धस्वेद देकर मोम, चर्बी, मज्जा, घृत और क्षार इनका प्रलेप करे ॥ १३॥

गुडंलवणघृतं चेत्तिन्तिडीयुक्तमेतद् द्विगुणमिह विदध्यान्मूत्रमेकत्र कृत्वा । दिनकतिचिदथेदं किञ्चिदाशोष्य लेपात् स्फुटितपदतलं स्यात्पद्मपत्राभमाशु ॥ १४ ॥

गुड, सेंधानमक, घी और इमलीकी छाल ये प्रत्येक एकएक तोला और गोमूत्र ४ तोले लेकर सबको एकत्र पीसकर धूपमें सुखालेवे। फिर स्फुटित पद-तल (बिवाई) पर इसका लेप करे तो इससे पैरके तलुएँ कमलके पत्रके समान कान्तियुक्त और कोमल होजाते हैं ॥ १४ ॥

सर्ज्जाख्यसिन्धूद्भवयोश्चूर्णं मधुघृताप्लुतम् । निर्मथ्य कटुतैलाक्तं हितं पादप्रमार्जनम् ॥ १५ ॥

राल और सेंधेनमकके चूर्णको शहद, घृत और कडवे तेलमें मिलाकर बिवाईपर मर्दन करना हितकारी है ॥ १५ ॥

११२८ : भैषज्यरत्नावली । [ क्षुद्ररोग-


उपोदिकाक्षारतैल ।

उपोदिकासर्षपनिम्बमोचकर्कार्कैर्वारुकभस्मतोये ।
तैलं विपक्वं लवणांशयुक्तं यत्पाददारीं विनिहन्ति शीघ्रम् ॥१६॥

पोईका शाक, सफेदसरसों, नीमकी छाल, केलेका मोचा, पीले पेठे और ककोडेका डंठल इन सबको समान भाग लेकर अन्तर्धूमकी विधिसे दग्ध करके भस्म करलेवे। फिर भस्मके द्वारा क्षारजलको निकाललेवे। इस प्रकार निकालेहुए आठ सेर जलमें एक सेर सैंधानमक और दो सेर तिलका तेल डालकर तेलको सिद्ध करे। यह तेल पाददारीरोगको शीघ्र नष्ट करता है ॥ १६ ॥

अलसकी चिकित्सा ।

अलसेऽम्लैश्चिरं सिक्तौ चरणौ परिलेपयेत् ।
पटोलारिष्टकासीसत्रिफलाभिर्मुहुर्मुहुः ॥ १७ ॥

अलसरोगमें दोनों पैरोंको काँजीमें कुछदेरतक भिगोये रक्खे, पश्चात् पटोलपत्र, नीमकी छाल, कसीस और त्रिफला इनको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर बारम्बार लेप करे ॥ १७ ॥

करञ्जबीजं रजनी कासीसं मधुकं मधु ।
रोचना हरितालं च लेपोऽयमलसे हितः ॥ १८ ॥

करञ्जके बीज, हल्दी, हीरा कसीस, मुलहठी, शहद, गोरोचन और हरताल इनको बराबर भाग लेकर बारीक पीसकर लेप करना अलसरोगमें हितकर है ॥ १८ ॥

लाक्षाभयारसालेपः कार्य्यं रक्तस्य मोक्षणम् ।
बृहतीरससिद्धेन तैलेनाभ्यज्य बुद्धिमान् ॥
शिलारोचनकासीसचूर्णैर्वा प्रतिसारयेत् ॥ १९ ॥

अलसरोगमें लाख, हरड और गन्धरस इनको एकत्र पीसकर लेप करे और रुधिर निकलवावे। फिर बडीकटेरीके रसमें कडवे तेलको पकाकर मालिश करे, एवं उक्ततेलके साथ मैनसिल, गोरोचन और कसीसके चूर्णको मिलाकर लगावे। इससे अलस रोग नष्ट होता है ॥ १९ ॥

कदरकी चिकित्सा ।

दहेत्कदरमुद्धृत्य तैलेन दहनेन वा ॥ २० ॥

कदर (पैरोंमें कङ्कड या काँटेके लगनेसे बेरके समान ऊँची गाँठ होजाती है, उसको कदर कहते हैं) काटकर गरम तेलसे या अग्निसे दग्धकर देवे ॥ २० ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११२९

चिप्पकी चिकित्सा ।

चिप्पमुष्णाम्बुना स्विन्नमुत्कृत्याभ्यज्य तं व्रणम् ।
दत्त्वा सर्ज्जरसं चूर्णं बद्ध्वा व्रणवदाचरेत् ॥ २१ ॥
चिप्परोगमें प्रथम उष्णजलसे स्वेदन कर अस्त्रक्रिया करे, पश्चात् तेलको लगा-
कर उसपर रालका चूर्ण बुरका देवे और व्रणको अच्छे प्रकार बाँधदेवे । इसमें रोगीको
व्रणरोगकी समान पथ्य देवे और उसीके समान अन्य उपचार करे ॥ २१ ॥

स्वरसेन हरिद्रायाः पात्रे कृष्णायसेऽभयाम् ।
घृष्ट्वा तज्जेन कल्केन लिम्पेच्चिप्पं मुहुर्मुहुः ॥ २२ ॥
लोहेके वर्त्तनमें हल्दीके स्वरसके साथ हरडको घिसकर उससे चिप्पपर बारबार
लेप करे ॥ २२ ॥

अङ्गुलीवेष्टककी चिकित्सा ।

काश्मर्याः सप्तभिः पत्रैः कोमलैः परिवेष्टितः ।
अङ्गुलीवेष्टकः पुंसो ध्रुवमाशु व्यपोहति ॥ २३ ॥
कुम्हेरके कोमल सात पत्तोंको बाँधनेसे मनुष्यके अंगुलिवेष्टक नामवाला रोग
तत्काल नष्ट होता है ॥ २३ ॥

पद्मिनीकण्टककी चिकित्सा ।

निम्बोदकेन वमनं पद्मिनीकण्टके हितम् ।
निम्बोदककृतं सर्पिः सक्षौद्रं पानमिष्यते ॥ २४ ॥
पद्मिनीकण्टकरोगमें प्रथम नीमकी छालके क्वाथको पान कराकर वमन कराना,
पश्चात् उक्त क्वाथके साथ घृत पकाकर उसमें शहद मिलाकर पान कराना अतीव
हितकारी है ॥ २४ ॥

पद्मनालकृतक्षारं पद्मिनीं हन्ति लेपनात् ।
निम्बारग्वधकल्कैर्वा मुहुरुद्वर्त्तनं हितम् ॥ २५ ॥
कमलनालको भस्म करके उसके क्षारका लेप करनेसे अथवा नीमकी छाल, अमल-
तासके पत्तोंको एकत्र पीसकर बारबारमलनेसे पद्मिनीकण्टकरोग जाता है ॥ २५ ॥

जालगर्दभकी चिकित्सा ।

नीलीपटोलमूलाभ्यां साज्यभ्यां लेपनं हितम् ।
जालगर्दभरोगे तु सद्यो हन्ति च वेदनाम् ॥ २६ ॥

११३० भैषज्यरत्नावली । [ क्षुद्ररोग-

जालगर्दभरोगमें नीलवृक्ष और पटोलपातकी जडको एकत्र पीसकर घृतमें मिलाकर लेप करनेसे उक्त रोगकी पीडा तत्काल शान्त होती है ॥ २६ ॥

अहिपूतनककी चिकित्सा ।

अहिपूतनके धात्र्याः पूर्वं स्तन्यं विशोधयेत् ।
त्रिफलाखदिरक्वाथैर्व्रणानां धावनं सदा ॥ २७ ॥

अहिपूतनकरोगमें प्रथम प्रसूतास्त्रीके स्तन्य (दूध) को शुद्ध करे, पश्चात् त्रिफला और खैर इनके काढेसे निरन्तर व्रणोंको धोवे ॥ २७ ॥

करञ्जत्रिफलातिक्तैः सर्पिः सिद्धं शिशोर्हितम् ।
रसाञ्जनं विशेषेण पानालेपनयोर्हितम् ॥ २८ ॥

करञ्जकी छाल, त्रिफला और पटोलपात इनके द्वारा उत्तम प्रकार घृतको सिद्ध कर बालकको पिलाना हितकर है । एवं रसौंतके चूर्णको सेवन कराना और अहिपूतनकरोगके व्रणोंपर लगाना विशेष उपयोगी है ॥ २८ ॥

गुदभ्रंशकी चिकित्सा ।

गुदभ्रंशे गुदं स्नेहैरभ्यज्याशु प्रवेशयेत् ।
प्रविष्टे स्वेदयेच्चापि बद्धं गोस्फणया भृशम् ॥ २९ ॥

गुदभ्रंश ( काँचका बाहर निकलना ) रोगमें गुदाको तेलसे मलकर शीघ्रही भीतरको प्रवेश करदेवे । जब वह प्रवेश होजाय तब स्वेद देवे और गोस्फणनामक बन्धनसे अच्छे प्रकार बाँधदेवे ॥ २९ ॥

कोमलं पद्मिनीपत्रं यः खादेच्छर्करान्वितम् ।
एतन्निश्चित्य निर्दिष्टं न तस्य गुदनिर्गमः ॥ ३० ॥

जो कमलिनीके कोमल पत्तोंको खाँडमें मिलाकर भक्षण करे तो उसके गुदाका बाहर निकलना निस्सन्देह बन्द होता है ॥ ३० ॥

वृक्षाम्लानलचाङ्गेरीविश्वपाठायवाग्रजम् ।
तक्रेण शीलयेत्पायुभ्रंशार्त्तोऽनलदीपनम् ॥ ३१ ॥

इमली, चीता, चुक, सोंठ, पाठ और जवाखार इन सबको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर मट्ठेके साथ पान करे तो इससे गुदभ्रंशरोग दूर होता है और अग्नि दीपन होती है ॥ ३१ ॥

गुदं च गव्यवसया म्रक्षयेदविशङ्कितः ।
दुष्प्रवेशो गुदभ्रंशो विशत्याशु न संशयः ॥ ३२ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११३१

काँछके बाहर निकल आनेपर गौकी चर्बीसे गुदाको निश्शंक होकर मले, फिर उसको भीतर प्रवेश करदेवे तो गुदभ्रंशरोग तत्काल नष्ट होता है ॥ ३२ ॥

मूषिकाणां वसाभिर्वा गुदे सम्यक् प्रलेपनम् ।
स्विन्नमूषिकमांसेन अथवा स्वेदयेद् गुदम् ॥ ३३ ॥

चुहियोंकी चर्बीसे गुदापर अच्छेप्रकार मालिश करे अथवा मूसोंके मांसको पकाकर उसके द्वारा स्वेद देकर गुदाको भीतर प्रविष्ट करदेवे ॥ ३३ ॥

चाङ्गेरीघृत ।

चाङ्गेरीकोलदध्यम्लनागरक्षारसंयुतम् ।
घृतमुक्तकथितं पेयं गुदभ्रंशरुजापहम् ॥
शुण्ठीक्षारावत्र कल्कौ शिष्टस्तु द्रवमिष्यते ॥ ३४ ॥

अम्लनोनियाका रस, सूखे बेरोंका क्वाथ और खट्टा दही ये समान भाग मिश्रित ८ सेर, सोंठ और जवाखार इनका कल्क १ सेर तथा घृत दो सेर लेवे । सबको एकत्रकर विधिपूर्वक घृतको सिद्ध करे । इस घृतको पान करनेसे गुदभ्रंशरोग दूर होता है ॥ ३४ ॥

मूषिकाद्यतैल ।

क्षीरे महत्पञ्चमूलं मूषिकामन्त्रवर्जिताम् ।
पक्त्वा तस्मिन्पचेत्तैलं वातघ्नौषधसंयुतम् ॥
गुदभ्रंशमिदं तैलं पानाभ्यङ्गात्प्रसाधयेत् ॥ ३५ ॥

दूधमें बेल, शोनापाठा, कुम्मेर पाढर और अरणी इनकी छाल समान भाग तथा आँतों रहित चूहेका मांस डालकर पकावे । जब पकते पकते केवल दूध शेष रहजाय तब उसमें वातनाशक औषधियें डालकर तिलके तैलको पकावे । इस तेलको पीनेसे और मालिश करनेसे गुदभ्रंशरोग दूर होता है ॥ ३५ ॥

चर्मकील-जतुमणिआदिकी चिकित्सा ।

चर्मकीलं जतुमणिं मशकांस्तलकालकान् ।
उद्धृत्य शस्त्रेण दहेत्क्षाराग्निभ्यामशेषतः ॥ ३६ ॥

चर्मकील, जतुमणि, मशक और तिलकालकादि क्षुद्ररोगोंको शस्त्रसे काटकर क्षार और अग्निके द्वारा दग्ध करना चाहिये ॥ ३६ ॥

रुबुनालस्य चूर्णेन घर्षो मशकनाशनः ।
निर्मोकभस्मघर्षाद्वा मशः शान्तिं व्रजेद् ध्रुवम् ॥ ३७ ॥

११३२ भैषज्यरत्नावली । [ क्षुद्ररोग-

अण्डकी नालके द्वारा शंखके चूर्णको लेकर घर्षण करे अथवा सर्पकी केंचुलीकी भस्मको घर्षण करे तो इससे मशक (मसा) रोग बहुत शीघ्र नष्ट होता है ॥ ३७॥

युवानपिडका-न्यच्छादिकी चिकित्सा ।

युवानपिडकान्यच्छनीलिकाव्यङ्गशर्कराः ।
शिराव्यधैः प्रलेपैश्च जयेदभ्यञ्जनैस्तथा ॥ ३८ ॥

युवानपिडका, न्यच्छ, नीलिका, व्यङ्ग और शर्करा इन रोगोंमें प्रथम शिरावेध (फस्तखुलवाना), फिर लेप और तेलादिकी मालिश करना हितकारी है ॥ ३८ ॥

लोध्रधान्यवचालेपस्तारुण्यपिडकापहः ।
तद्वद्गोरोचनायुक्तं मरिचं मुखलेपनम् ॥
वमनं च निहन्त्याशु पिडकां यौवनोद्भवाम् ॥ ३९ ॥

लोध, धनियाँ और वच इनको एकत्र पीसकर लेप करे अथवा गोरोचन और कालीमिरच इन दोनोंको एकत्र पीसकर मुखपर लेप कर वमन करावे तो इससे युवावस्थामें उत्पन्नहुई पिडिकायें (मुहासे) तत्काल नष्ट होती हैं ॥ ३९ ॥

व्यङ्गेषु चार्जुनत्वग् वा मञ्जिष्ठा वा समाक्षिका ।
लेपः सनवनीता वा श्वेताश्वखुरजा मसी ॥ ४० ॥

व्यङ्गरोगमें अर्जुनकी छाल, मञ्जीठ, श्वेत अपराजिता इनका चूर्ण अथवा सफेद घोडेकी खुरकी भस्म इनमेंसे किसी एकको शहद और नैनीघीमें मिलाकर लेप करे तो व्यङ्गरोग दूर होता है ॥ ४० ॥

रक्तचन्दनमञ्जिष्ठाकुष्ठलोध्रप्रियङ्गवः ।
वटाङ्कुरा मसूराश्च व्यङ्गघ्ना मुखकान्तिदाः ॥ ४१ ॥

लाल चन्दन, मञ्जीठ, कूठ, लोध, फूलप्रियंगु, बडके अंकुर और मसूरकी दाल ये सब द्रव्य एकत्र पीसकर लेप करनेसे व्यंगरोगको नष्ट करते हैं और मुखकी शोभाको बढाते हैं ॥ ४१ ॥

व्यङ्गानां लेपनं शस्तं रुधिरेण शशस्य च ॥
खरगोशके रुधिरका लेप करनेसे सब व्यंगरोगोंका नाश होता है ॥

केवलान्पयसा पिष्ट्वा तीक्ष्णाञ्छाल्मलिकण्टकान् ।
आलिप्तं त्र्यहमेतेन भवेत्पद्मोपमं मुखम् ॥ ४२ ॥

एकमात्र सेमलके काँटोंको दूधके साथ पीसकर लेप करनेसे तीन दिनमें ही मुख कमलकी समान सुन्दर होजाता है ॥ ४२ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १११३

मसूरैः सर्पिषा भृष्टैर्लिप्तमास्यं पयोऽन्वितैः ।
सप्तरात्राद्भवेत्सत्यं पुण्डरीकदलप्रभम् ॥ ४३ ॥
मसूरकी दालको घृतमें भूनकर और दूधमें पीसकर लेप करनेसे सात दिनमें मुख कमलपत्रकी कान्तियुक्त होजाता है। यह बिल्कुल सत्य है ॥ ४३ ॥

मातुलुङ्गजटा सर्पिः शिला गोशकृतो रसः ।
मुखकान्तिकरो लेपः पिडकातिलकालजित् ॥ ४४ ॥
बिजौरानींबूकी जड, घी, मैनसिल, गोबरका रस इन सबका लेप पिडका और तिलकालकरोगको जीतता है तथा मुखकी कान्तिको उज्ज्वल बनाता है ॥ ४४ ॥

नवनीतगुडक्षौद्रकोलमज्जप्रलेपनम् ।
व्यङ्गजिद्धरुणत्वग्वा छागक्षीरप्रपेषिता ॥ ४५ ॥
नैनीघी, गुड शहद और बेरकी गुठलीकी मींग इनको एकत्र पीसकर लेप करे अथवा बरनाकी छालको बकरीके दूधमें पीसकर लेप करे, यह लेप व्यङ्ग रोगको हरनेवाला है ॥ ४५ ॥

जातीफलकल्कलेपो नीलीव्यङ्गादिनाशनः ।
सायं च कटुतैलेनाभ्यङ्गो वक्त्रप्रसाधनः ॥ ४६ ॥
जायफलको पीसकर लेप करनेसे नाली और व्यङ्गादिरोग नाश होते हैं। सन्ध्यासमय सरसोंके तेलकी मुखपर मालिश करनेसे मुख उज्ज्वल और कान्तियुक्त होता है ॥ ४६ ॥

कालीयकोत्पलामयदधिसरबदरास्थिमध्यफलिनीभिः ।
लिप्तं भवति हि वदनं शशिप्रभं सप्तरात्रेण ॥ ४७ ॥
सुगन्धितकाष्ठ अथवा दारुहल्दी, कमल, कूट, दहीका तोड, बेरकी गुठलीकी मींग और फूलप्रियंगु इन सबको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर लेप करे तो सात दिनमें ही मुख चन्द्रमण्डलके समान शोभायमान होता है ॥ ४७ ॥

तुषरहितमसृणयवचूर्णसमयाष्टिमधुकरोध्रलेपेन ।
भवति मुखं परिनिर्जितचामीकरचारुसौभाग्यम् ॥ ४८ ॥
भूसीरहित जौका चूर्ण, मुलहठी और लोध इनको बराबर भाग लेकर एकत्र पीसकर लेप करनेसे मुखकी पिडिकायें दूर होकर मुख सुवर्णके समान अत्यन्त मनोहर और सुभग होजाता है ॥ ४८ ॥

रक्षोघ्नशर्वरीद्वयमञ्जिष्ठागैरिकाज्यबस्तपयः ।
सिद्धेन लिप्तमाननमुद्यद्विधुबिम्बवद् भाति ॥ ४९ ॥