भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १११७
परवल, त्रिफला, नीमकी छाल, गिलोय, नागरमोथा, लालचन्दन, मूर्वा, कुटकी, पाठ, हल्दी और धमासा इनका क्वाथ बनाकर पान करावे तो यह क्वाथ कफ-पित्तजन्य ज्वर, खुजली, त्वचाके विकार, विस्फोटक और विसर्प रोगको नष्ट करता है ॥ ३ ॥ ४ ॥
व्रणारिगुग्गुलु ।
पलं कृष्णा पुरः पञ्च त्रिफला त्रिपलं भवेत् ।
भस्मसूतपलं चास्य कर्षः सर्वव्रणापहः ॥ ५ ॥
पीपल ४ तोले, गूगल २१ तोले, हरड बहेडा, आमला प्रत्येक चार चार तोले और रससिन्दूर ४ तोले इन सबोंको एकत्रकर उत्तमप्रकार खरल करलेवे । इसको उपयुक्त मात्रासे सेवन करे तो यह सर्वप्रकारके व्रणोंको दूर करता है ॥ ५ ॥
पञ्चतिक्तकघृत ।
पटोलसप्तच्छदनिम्बवासफलत्रिकच्छिन्नरुहाविपक्वम् ।
तत्पंचतिक्तं घृतमाशु हन्ति त्रिदोषविस्फोटविसर्पकण्डूः ॥६॥
पटोलपत्र, सतौना, निम्बछाल, अडूसा और गिलोय इनके क्वाथ तथा त्रिफलाके कल्कद्वारा यथाविधि घृतको पकावे । यह पञ्चतिक्तकघृत यथानियम पान करे तो यह त्रिदोषोत्पन्नविसर्प, विस्फोटक और खुजलीको तत्काल नाश करता है ॥
विस्फोटरोगमें पथ्य ।
विरेचनच्छर्द्दनलेपलङ्घनं पुरातनाः षष्टिकशालयो यवाः ।
मुद्गा मसुराश्चणका मुकुष्ठका धन्वामिषं गव्यघृतं कठिल्लकम् ॥७॥
वेत्राग्रमाषाढफलं पटोलकं ज्योतिष्मती निम्बदलानि चन्दनम् ।
तैलं सिताभ्रं तिललेपनं घनं बालं च विस्फोटगदं विनाशयेत् ॥ ८ ॥
जुलाब देना, वमन कराना, लेप करना, लंघन, पुराने साँठी और शालिके चावल, जौ, मूँग, मसूर, चने, मोठ, मरुदेशजन्य जीवोंका मांसरस, गौका घी, करेला, बेंतकी कोंपल, ढाकके बीज, परवल, मालकांगनी, नमिके पत्ते, लालचन्दन, तेल, कपूर, तेलकी मालिश, नागरमोथा और सुगन्धवाला ये सब पदार्थ विस्फोटरोगको नष्ट करनेवाले हैं, इसलिये उक्त रोगीको ये सब सेवन करने चाहिये ॥७ ॥ ८॥