भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१११६ भैषज्यरत्नावली । [ विस्फोट-
वेगमसूयनं च । शाकं विरुद्धमशनं दधि कूर्चिकां च सौवीरमासवमनेकविधं किलाटम् ॥ १६ ॥ गुर्वन्नपान- मखिलं लशुनं कुलत्थान् माषांस्तिलान्सकलमांस- मजाङ्गलं चास्वेदं विदाहि लवणाम्लकटूनि मद्यान्यर्क प्रभामपि विसर्पगदी त्यजेत्तु ॥ १७ ॥ कसरत करना दिनमें सोना स्त्रीप्रसङ्ग प्रवलवायु या पुर्वाई हवाका सेवन क्रोध शोक करना वमनके वेगको रोकना ईर्ष्या करना शाक विरुद्ध भोजन दही कूर्चिका ( जो पदार्थ दही और दूधको औटाकर बनाये जाते हैं ) काँजी अनेक प्रकारकें आसव किलाट ( फटे दूधका मावा ) सर्वप्रकारके गुरुपाकी अन्न और पानीयद्रव्य लहसुन कुलथी उड़द तिल जङ्गलीजीवोंके मांसके अतिरिक्त अन्य सर्वप्रकारके मांस स्वेद लानेवाले दाहकारक द्रव्य लवण खटाई और कडवे द्रव्य मदिरा तथा धूप इनको विसर्परोगी शीघ्र त्याग देवे ॥ १६ ॥ १७ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्याम् विसर्पचिकित्सा ॥
विस्फोट-चिकित्सा ।
विस्फोटे लङ्घनं कार्यं वमनं पथ्यभोजनम् । यथादोषबलं वीक्ष्य युक्तियुक्तं विरेचनम् ॥ १ ॥ विस्फोटरोगमें दोषोंका बलाबल विचारकर लंघन वमन पथ्यभोजन और विरेचन करना युक्तियुक्त कहा है ॥ १ ॥
पटोलामृतभूनिम्बवासकारिष्टपर्पटैः । खदिराब्दयुतैः क्वाथो विस्फोटोर्त्तिज्वरापहः ॥ २ ॥ पटोलपत्र, गिलोय, चिरायता, अडूसेकी छाल, नीमकी छाल, पित्तपापडा, खैर और नागरमोथा इनका क्वाथ बनाकर पान करनेसे विस्फोट ( एक प्रकारका विषैलाफोडा ) की पीडा और ज्वर दूर होता है ॥ २ ॥
पटोलत्रिफलारिष्टगुडूचीमुस्तचन्दनैः । समूर्वा रोहिणी पाठा रजनी सदुरालभा ॥ ३ ॥ कषायं पाययेदेतच्छ्लेष्मपित्तज्वरापहम् । कण्डूत्वग्दोषविस्फोटविषवीसर्पनाशनम् ॥ ४ ॥