भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११२९

चिप्पकी चिकित्सा ।

चिप्पमुष्णाम्बुना स्विन्नमुत्कृत्याभ्यज्य तं व्रणम् ।
दत्त्वा सर्ज्जरसं चूर्णं बद्ध्वा व्रणवदाचरेत् ॥ २१ ॥
चिप्परोगमें प्रथम उष्णजलसे स्वेदन कर अस्त्रक्रिया करे, पश्चात् तेलको लगा-
कर उसपर रालका चूर्ण बुरका देवे और व्रणको अच्छे प्रकार बाँधदेवे । इसमें रोगीको
व्रणरोगकी समान पथ्य देवे और उसीके समान अन्य उपचार करे ॥ २१ ॥

स्वरसेन हरिद्रायाः पात्रे कृष्णायसेऽभयाम् ।
घृष्ट्वा तज्जेन कल्केन लिम्पेच्चिप्पं मुहुर्मुहुः ॥ २२ ॥
लोहेके वर्त्तनमें हल्दीके स्वरसके साथ हरडको घिसकर उससे चिप्पपर बारबार
लेप करे ॥ २२ ॥

अङ्गुलीवेष्टककी चिकित्सा ।

काश्मर्याः सप्तभिः पत्रैः कोमलैः परिवेष्टितः ।
अङ्गुलीवेष्टकः पुंसो ध्रुवमाशु व्यपोहति ॥ २३ ॥
कुम्हेरके कोमल सात पत्तोंको बाँधनेसे मनुष्यके अंगुलिवेष्टक नामवाला रोग
तत्काल नष्ट होता है ॥ २३ ॥

पद्मिनीकण्टककी चिकित्सा ।

निम्बोदकेन वमनं पद्मिनीकण्टके हितम् ।
निम्बोदककृतं सर्पिः सक्षौद्रं पानमिष्यते ॥ २४ ॥
पद्मिनीकण्टकरोगमें प्रथम नीमकी छालके क्वाथको पान कराकर वमन कराना,
पश्चात् उक्त क्वाथके साथ घृत पकाकर उसमें शहद मिलाकर पान कराना अतीव
हितकारी है ॥ २४ ॥

पद्मनालकृतक्षारं पद्मिनीं हन्ति लेपनात् ।
निम्बारग्वधकल्कैर्वा मुहुरुद्वर्त्तनं हितम् ॥ २५ ॥
कमलनालको भस्म करके उसके क्षारका लेप करनेसे अथवा नीमकी छाल, अमल-
तासके पत्तोंको एकत्र पीसकर बारबारमलनेसे पद्मिनीकण्टकरोग जाता है ॥ २५ ॥

जालगर्दभकी चिकित्सा ।

नीलीपटोलमूलाभ्यां साज्यभ्यां लेपनं हितम् ।
जालगर्दभरोगे तु सद्यो हन्ति च वेदनाम् ॥ २६ ॥

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