भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1160, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1160

११२८ : भैषज्यरत्नावली । [ क्षुद्ररोग-


उपोदिकाक्षारतैल ।

उपोदिकासर्षपनिम्बमोचकर्कार्कैर्वारुकभस्मतोये ।
तैलं विपक्वं लवणांशयुक्तं यत्पाददारीं विनिहन्ति शीघ्रम् ॥१६॥

पोईका शाक, सफेदसरसों, नीमकी छाल, केलेका मोचा, पीले पेठे और ककोडेका डंठल इन सबको समान भाग लेकर अन्तर्धूमकी विधिसे दग्ध करके भस्म करलेवे। फिर भस्मके द्वारा क्षारजलको निकाललेवे। इस प्रकार निकालेहुए आठ सेर जलमें एक सेर सैंधानमक और दो सेर तिलका तेल डालकर तेलको सिद्ध करे। यह तेल पाददारीरोगको शीघ्र नष्ट करता है ॥ १६ ॥

अलसकी चिकित्सा ।

अलसेऽम्लैश्चिरं सिक्तौ चरणौ परिलेपयेत् ।
पटोलारिष्टकासीसत्रिफलाभिर्मुहुर्मुहुः ॥ १७ ॥

अलसरोगमें दोनों पैरोंको काँजीमें कुछदेरतक भिगोये रक्खे, पश्चात् पटोलपत्र, नीमकी छाल, कसीस और त्रिफला इनको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर बारम्बार लेप करे ॥ १७ ॥

करञ्जबीजं रजनी कासीसं मधुकं मधु ।
रोचना हरितालं च लेपोऽयमलसे हितः ॥ १८ ॥

करञ्जके बीज, हल्दी, हीरा कसीस, मुलहठी, शहद, गोरोचन और हरताल इनको बराबर भाग लेकर बारीक पीसकर लेप करना अलसरोगमें हितकर है ॥ १८ ॥

लाक्षाभयारसालेपः कार्य्यं रक्तस्य मोक्षणम् ।
बृहतीरससिद्धेन तैलेनाभ्यज्य बुद्धिमान् ॥
शिलारोचनकासीसचूर्णैर्वा प्रतिसारयेत् ॥ १९ ॥

अलसरोगमें लाख, हरड और गन्धरस इनको एकत्र पीसकर लेप करे और रुधिर निकलवावे। फिर बडीकटेरीके रसमें कडवे तेलको पकाकर मालिश करे, एवं उक्ततेलके साथ मैनसिल, गोरोचन और कसीसके चूर्णको मिलाकर लगावे। इससे अलस रोग नष्ट होता है ॥ १९ ॥

कदरकी चिकित्सा ।

दहेत्कदरमुद्धृत्य तैलेन दहनेन वा ॥ २० ॥

कदर (पैरोंमें कङ्कड या काँटेके लगनेसे बेरके समान ऊँची गाँठ होजाती है, उसको कदर कहते हैं) काटकर गरम तेलसे या अग्निसे दग्धकर देवे ॥ २० ॥

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित) · पृष्ठ 1160, कुल 1416 में से · BharatKosha