भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहितां । ११२७
जातीपल्लवकल्कैश्च निम्बतैलं विपाचयेत् । वल्मीकं नाशयेत्तद्धि बहुच्छिद्रं बहुद्रवम् ॥ १० ॥ सशोथं व्रणगन्धं च प्रवृद्धं मर्मसु स्थितम् । हस्तपादस्थितं चापि वल्मीकं परिवर्जयेत् ॥ ११ ॥
वल्मीकरोगको अस्त्रके द्वारा काटकर क्षार और अग्निका प्रयोग करे। मैनसिल, भिलावा, हरिताल, छोटी इलायची, अगर, चन्दन और चमेलीके पत्ते इन औषधियोंके कल्कद्वारा नीमके तेलको पकाकर व्रणस्थानमें लेप करे। इस तेलको मर्दन करनेसे बहुत छिद्र और बहुत पीववाला वल्मीकरोग नष्ट होता है। शोथयुक्त, जिसमें व्रणके समान गन्ध आती हो, अत्यन्त बढाहुआ, मर्मस्थानोंमें उत्पन्न हुआ और हाथपावोंमें उत्पन्न हुआ वल्मीकरोग असाध्य है, इसलिये इनकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये ॥ ९-११ ॥
पाददारी ( बिबाई की ) चिकित्सा ।
पाददारीषु च शिरां वेधयेत्तलशोधिनीम् ॥ १२ ॥ स्नेहस्वेदोपपन्नौ तु पादौ चालेपयेन्मुहुः ॥ मधूच्छिष्टवसामज्जघृतक्षारैर्विमिश्रितैः ॥ १३ ॥
पाददारीरोगमें प्रथम पैरके तलुएँकी शिराको विद्ध करके रक्त निकलवावे। पश्चात् स्निग्धस्वेद देकर मोम, चर्बी, मज्जा, घृत और क्षार इनका प्रलेप करे ॥ १३॥
गुडंलवणघृतं चेत्तिन्तिडीयुक्तमेतद् द्विगुणमिह विदध्यान्मूत्रमेकत्र कृत्वा । दिनकतिचिदथेदं किञ्चिदाशोष्य लेपात् स्फुटितपदतलं स्यात्पद्मपत्राभमाशु ॥ १४ ॥
गुड, सेंधानमक, घी और इमलीकी छाल ये प्रत्येक एकएक तोला और गोमूत्र ४ तोले लेकर सबको एकत्र पीसकर धूपमें सुखालेवे। फिर स्फुटित पद-तल (बिवाई) पर इसका लेप करे तो इससे पैरके तलुएँ कमलके पत्रके समान कान्तियुक्त और कोमल होजाते हैं ॥ १४ ॥
सर्ज्जाख्यसिन्धूद्भवयोश्चूर्णं मधुघृताप्लुतम् । निर्मथ्य कटुतैलाक्तं हितं पादप्रमार्जनम् ॥ १५ ॥
राल और सेंधेनमकके चूर्णको शहद, घृत और कडवे तेलमें मिलाकर बिवाईपर मर्दन करना हितकारी है ॥ १५ ॥