भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
११३४ भैषज्यरत्नावली । [ क्षुद्ररोग-
सफेद सरसों, हल्दी, दारुहल्दी, मंजीठ, गेरु, घी और बकरीका दूध इन सबको समानांश ले एकत्र कूट पीसकर लेप करे तो मुख चन्द्रविम्बके समान निर्मल कान्तिपूर्ण होता है ॥ ४९ ॥
परिणतदधिशरपुङ्खैः कुवलयदलकुष्ठचन्दनोशीरैः ।
मुखकमलकान्तिकारी भ्रुकुटीतिलकालकाञ्जयति ॥ ५० ॥
सरफोंका, कमलपत्र, कूठ, लालचन्दन और खस इन सबको दहीके तोडमें पीसकर लेप करे। यह लेप मुखको कमलपत्रके समान सुशोभित करता है और भ्रुकुटिजन्य तथा तिलकालकरोगको जीतता है ॥ ५० ॥
वर्णकघृत ।
मधुकं चन्दनं कङ्गुः सर्षपं पद्मकं तथा ।
कालीयकं हरिद्रा च लोध्रमेभिश्च कल्कितैः ॥ ५१ ॥
विपचेद्धि घृतं वैद्यस्तत्पक्वं वस्त्रगालितम् ।
पादांशं कुङ्कुमं सिक्थं क्षिप्त्वा मन्दानले पचेत् ॥ ५२ ॥
तत्सिद्धं शिशिरे नीरे प्रक्षिप्याकर्षयेत्ततः ।
तदेतद्वर्णकं नाम घृतं वक्त्रप्रसादनम् ॥ ५३ ॥
अनेनाभ्यासलिप्तं हि वलीभूतमपि क्रमात् ।
निष्कलङ्केन्दुबिम्बाभं स्याद्विलासवतीमुखम् ॥ ५४ ॥
मुलहठी, लालचन्दन, मालकाङ्गनी, सरसों, पद्माख, कालाचन्दन, हल्दी और लोध इन सबका कल्क आधसेर, घी दो सेर और पाकके लिये जल ८ सेर लेवे । सबको एकत्र मिलाकर यथाविधि घृतको पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर वस्त्रमें छानलेवे । फिर उसमें केशर आठ तोले और मोम आठ तोले डालकर दोबारा मन्दमन्द अग्निपर पकावे । जब पकते पकते जल बिलकुल न रहे तब उस घृतपात्रको उतारकर शीतल जलमें रखकर ठंडा करे । इस प्रकार यह वर्णक नामवाला घृत सिद्ध होता है । इसको मुखमें लगानेसे मुखमें प्रसन्नता होती है और वली (झुर्रियोंका पडना) रोग दूर होता है। एवं विलासिनी स्त्रियोंका मुख निर्मल चन्द्रमाकी समान कान्तियुक्त होता है ॥ ५१-५४ ॥
द्विहरिद्राद्यतैल ।
हरिद्राद्वययष्ट्याह्वकालीयककुचन्दनैः ।
प्रपौण्डरीकमञ्जिष्ठापद्मपद्मककुङ्कुमैः ॥ ५५ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११३५
कपित्थतिन्दुकप्लक्षवटपत्रैः पयोन्वितैः ।
लेपयेत्कल्कितैरेभिस्तैलं चाभ्यञ्जनं चरेत् ॥ ५६ ॥
विप्लुवं नीलिकाव्यङ्गांस्तिलकान्मुखदूषिकान् ।
नित्यसेवी जयेत्क्षिप्रं मुखं कुर्यान्मनोरमम् ॥ ५७ ॥
हल्दी, दारुहल्दी, मुलहठी, पीलाचन्दन, लालचन्दन, पुण्डरिया, मंजीठ, कमल-पत्र, पद्माख, केशर, कैथके पत्ते, तेंदुके पत्ते, पाखर और बडके पत्ते इनके समान भाग मिश्रित कल्कके द्वारा तिलके तेलको उत्तम प्रकार सिद्ध कर मालिश करे । यह तेल नीलिका, व्यंग तिलकालक और मुखके सब विकारोंको नष्ट करता है । इसको निरन्तर सेवन करनेसे मुख अत्यन्त मनोहर होता है ॥ ५६-५७ ॥
कुंकुमाद्यतैल ।
कुंकुमं किंशुकं लाक्षा मञ्जिष्ठा रक्तचन्दनम् ।
कालीयकं पद्मकं च मातुलुङ्गं सकेशरम् ॥ ५८ ॥
कुसुम्भं मधुयष्टी च फलिनी मदयन्तिका ।
निशे द्वे रोचना पद्ममुत्पलं च मनःशिला ॥ ५९ ॥
काकोल्यादिसमायुक्तैरेतैरक्षसमैर्भिषक् ।
लाक्षारसपयोभ्यां च तैलप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ६० ॥
कुंकुमाद्यमिदं तैलमभ्यङ्गात्काञ्चनोपमम् ।
करोति वदनं सद्यः पुष्टिलावण्यकान्तिकम् ॥
सौभाग्यलक्ष्मीजननं वशीकरणमुत्तमम् ॥ ६१ ॥
टेसूके फूल, लाख, मंजीठ, लालचन्दन, पीलाचन्दन, पद्माख, बिजौरेनींबूकी जड, बिजौरे नींबूकी केशर, कसुमके फूल, मुलहठी, फूल प्रियंगू, मदयन्तिका (मल्लिका विशेष), हल्दी, दारुहल्दी, गोरोचन, नीलकमल, मैनसिल और काकोल्यादिगणकी समस्त औषधियाँ इन प्रत्येकको दो दो तोले लेकर एकत्र कूटपीसकर कल्क बनालेवे । इस कल्कको लाखके ४ सेर रस और चार सेर दूधके साथ मिलाकर एक प्रस्थ तिलके तेलको उत्तम प्रकार पकावे । जब पाक सिद्ध होजाय तब उसमें दो तोले नागकेशर मिलादेवे । यह कुंकुमाद्य तेल निरन्तर मालिश करनेसे मुखको सुवर्णकी समान कान्तिमान्, पुष्ट और रूपलावण्यतासे युक्त बनादेता है एवं सौभाग्य और लक्ष्मीकी वृद्धि करता है । यह उत्तम वशीकरण योग है ॥ ५८-६१ ॥
११३६ भैषज्यरत्नावली । [ क्षुद्ररोग-
अरुंषिकाकी चिकित्सा ।
अरुंषिकायां रुधिरेऽवसिक्ते शिराव्यधेनाथ जलौकसा वा ।
निम्बाम्बुसिक्ते शिरसि प्रलेपो देयोऽश्ववर्चोरससैन्धवाभ्याम् ॥
अरुंषिकारोगमें प्रथम शिरा वेधकर या जोंकद्वारा रुधिरका निकलवाना, पश्चात् नीमकी छालके अधपके क्वाथसे शिरको सिंचनकर घोडेकी लीदके रस और सैन्धे-नमकको एकत्र मिलाकर लेप करना हितकारी है ॥ ६२ ॥
पुराणमथ पिण्याकं पुरीषं कुक्कुटस्य वा ।
मूत्रपिष्टः प्रलेपोऽयं शीघ्रं हन्यादरुंषिकाम् ॥
अरुंषिघ्नं भृष्टकुष्ठचूर्णं तैलेन संयुतम् ॥ ६३ ॥
तिलकी पुरानी खल अथवा मुर्गेकी विष्ठाको गोमूत्रमें पीसकर लेप करे । या कूठकी भस्मको तिलके तेलमें मिलाकर लगानेसे अरुंषिका दूर होती है ॥ ६३ ॥
त्रिफलाद्यतैल ।
त्रिफलायोरजोयष्टिमार्कवोत्पलशारिवैः ।
ससैन्धवैः पचेत्तैलमभ्यङ्गोऽरुंषिकां जयेत् ॥ ६४ ॥
त्रिफला, लोहभस्म, मुलहठी, भाँगरा, नीलकमल, अनन्तमूल और सेंधानमक इनके कल्कद्वारा विधिपूर्वक तैलको सिद्ध कर मालिश करनेसे अरुंषिकारोग दूर होता है ॥ ६४ ॥
दारुणककी चिकित्सा ।
दारुणे तु शिरां विध्येत्स्निग्धां स्विन्नां ललाटजाम् ।
अवपीडाशिरोवस्तीनभ्यङ्गांश्चावचारयेत् ॥ ६५ ॥
दारुणकरोगमें मस्तककी शिराको स्निग्ध स्वेद देकर छेदन करे । इस रोगमें नस्य, शिरोवस्ति और तैलादिकी मालिश सर्वदा करनी चाहिये ॥ ६५ ॥
कोद्रवाणां तृणक्षारपानीय परिधावने ।
कार्यो दारुणके मूर्ध्नि प्रलेपो मधुसंयुतः ॥ ६६ ॥
कोदोंकी भूसीके क्षारजलसे मस्तकको सिञ्चन करे और उक्त क्षारको शहदमें मिलाकर शिरपर लेप करे । इससे अरुंषिकारोग दूर होता है ॥ ६६ ॥
पियालबीजमधुककुष्ठमाषैः ससैन्धवैः ।
काञ्जिकस्थास्त्रिसप्ताहं माषा दारुणकापहाः ॥ ६७ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११३७
चिरौंजी, मुलहठी, कूठ, उडद और सेंधानमक इनको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर शहदमें मिलाकर लेप करे या उक्त औषधोंको २१ दिनतक उडदोंकी काँजीमें भिगोकर फिर पीसकर लेप करे तो दारुणकरोग शीघ्र नष्ट होता है ६७
सहनीलोत्पलकेशरयष्टिमधुतिलैः सहशमामलकम् ।
चिरजातमपि च शीर्षे दारुणकरोगं शमं नयति ॥ ६८ ॥
नीलेकमलकी केशर, मुलहठी, तिल और आमले इनको समभाग लेकर एकत्र पीसकर शिरपर लेप करे तो इससे बहुत पुराना दारुणकरोगभी शान्त होता है ॥
इन्द्रलुप्तकी चिकित्सा ।
इन्द्रलुप्ते शिरां विद्ध्वा शिलाकासीसतुत्थकैः ॥
परितो लेपयेत्कल्कैस्तै ऽ चाभ्यञ्जने हितम् ॥
कुटन्नटशिखोजातीकरञ्जकरवीरजैः ॥ ६९ ॥
इन्द्रलुप्तरोगमें शिराको वेधकर ( फस्त खुलवाकर ) मैनसिल, कसीस और तूतिया इनको समानभाग लेकर एकत्र पीसकर लेप करे। अथवा नागरमोथा, चीतेकी जड, चमेलीके फूल, करञ्जकी छाल और सफेद कनेरकी जड इन सबको एकत्र कूट पीसकर लेप करे। इसमें तेलकी मालिश करना हितकर है ॥ ६९ ॥
अवगाढपदं चैव प्रच्छयित्वा पुनः पुनः ।
गुञ्जाफलैश्चिरं लिम्पेत्केशभूमिं समन्ततः ॥ ७० ॥
पहले इन्द्रलुप्तको सुईसे छेदन करे, पश्चात् चोंटलियोंको जलमें अच्छे प्रकारसे पीसकर बार बार बालोंकी जगह लेप करे। इससे बाल उगआते हैं ॥ ७० ॥
हस्तिदन्तमसीं कृत्वा मुख्यं चैव रसाञ्जनम् ।
लोमान्यनेन जायन्ते नृणां पाणितलेष्वपि ॥ ७१ ॥
हाथीके दाँतकी भस्म करके उसको रसौंतके चूर्ण और जलमें मिलाकर लेप करे। जब इससे मनुष्योंकी हथेलीमेंभी रोम उत्पन्न होजाते हैं तब अन्य स्थानका तो कहनाही क्या ? ॥ ७१ ॥
हस्तिदन्तमसीं कृत्वा तैलेन सह योजयेत् ।
हस्तेष्वपि प्रजायन्ते केशा नास्त्यत्र संशयः ॥ ७२ ॥
हाथीदांतकी भस्मको तिलके तेलमें मिलाकर लेप करनेसे इन्द्रलुप्तरोग नष्ट होकर बाल निकल आते हैं। इसके प्रयोगसे हाथोंमेंभी बाल उत्पन्न होजाते हैं, इसमें कुछभी सन्देह नहीं है ॥ ७२ ॥
७२
११३८ भैषज्यरत्नावली । [ क्षुद्ररोग-
भल्लातकबृहतीफलगुञ्जामूलफलेभ्यस्त्वैकेन ।
मधुसहितेन विलिप्तं सुरपतिलुप्तं शमं याति ॥ ७३ ॥
भिलावे, बडीकटेरीके फल, चोंटली और चोंटलीकी जड इनमेंसे किसीएकको शहदके साथ मर्दनकर लेप करे तो इन्द्रलुप्तरोग शमन होता है ॥ ७३ ॥
बृहतीफलरसपिष्टं गुञ्जाफलमिन्द्रलुप्तस्य ।
कनकफलनिघृष्टस्य सतोयं दातव्यं प्रच्छितस्य सदा॥७४
पकीहुई बडी कटेरीके फलके रसमें चोंटलीको अथवा चोंटलीकी जडको पीसकर शिरावेध कियेहुए इन्द्रलुप्तवाले स्थानपर धतूरेके फल अथवा गूलर आदिके कडे पत्तोंसे घर्षण करके लेप करना चाहिये ॥ ७४ ॥
घृष्टस्य कर्कशैः पत्रैरिन्द्रलुप्तस्य गुण्डनम् ।
चूर्णितैर्मरिचैः कार्यमिन्द्रलुप्तविनाशनम् ॥ ७५ ॥
इन्द्रलुप्तके स्थानको गूलर आदिके कर्रें पत्तोंसे घिसकर उसपर काली मिरचोंके चूर्णको बुरकादेनेसे इन्द्रलुप्तरोग नष्ट होता है ॥ ७५ ॥
छागक्षीररसाञ्जनपुटदग्धगजदन्तमसीलिप्ताः ।
जायन्ते सप्तदिनात्खल्वामपि कुञ्चिताश्चिकुराः ॥ ७६ ॥
रसौंत और पुटपाक द्वारा भस्म कीहुई हाथीदाँतकी स्याही, इन दोनोंको बकरीके दूधमें पीसकर लेप करे तो सात दिनमें इन्द्रलुप्त नष्ट होकर बाल निकल आते हैं ॥ ७६ ॥
मधुकेन्दीवरमूर्वातिलाज्यगोक्षीरभृङ्गलेपेन ।
अचिराद्भवन्ति केशा घनदृढमूलायतानृजवः ॥ ७७ ॥
मुलेठी, नीलकमल, मूर्वा, कालेतिल और भाँगरा इनको गौके दूधमें पीसकर घीमें मिलाकर लेप करनेसे घने, मजबूत और घुंघुरवाले बाल बहुत शीघ्र उत्पन्न होते हैं ॥ ७७ ॥
केशरञ्जनयोग ।
त्रिफला नीलिनीपत्रं लौहं भृङ्गरजः समम् ।
अविमूत्रेण संयुक्तं कृष्णीकरणमुत्तमम् ॥ ७८ ॥
हरड, बहेडा, आमला, नीलवृक्षके पत्ते, लोहभस्म और भाँगरा इन सबको समान भाग लेकर भेडके मूत्रमें मिलाकर शिरपर लेप करनेसे बाल काले होते हैं ॥
धात्र्याम्रमज्जलेपात्स्यात्स्थिरता स्निग्धकेशता ॥ ७९ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११९९
आमले और कच्चे आमका गूदा इनको एकत्र पीसकर लेप करनेसे बाल काले मजबूत और चिकने होजाते हैं ॥ ७९ ॥
त्रिफलाचूर्णसंयुक्तं लौहचूर्णं विनिक्षिपेत् । ईषत्पक्के नारिकेले भृङ्गराजरसान्विते ॥ ८० ॥ मासमेकं तु निक्षिप्य सम्यग्गर्त्तात्समुद्धरेत् । ततः शिरो मुण्डयित्वा लेपं दत्त्वा भिषग्वरः ॥ ८१ ॥ संवेष्ट्य कदलीपत्रैर्मोचयेत्सप्तमे दिने । क्षालयेत्त्रिफलाक्वाथैः क्षीरमांसरसाशनः ॥ कपालरञ्जनं चैतत्कृष्णीकरणमुत्तमम् ॥ ८२ ॥
हरड, बहेडा, आमला और लोहचूर्ण इनको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर भांगरेके रसमें डालकर कुछ थोडे पकेहुए नारियलमें भरदेवे फिर उसको एक महीनेतक रक्खा रहनेदेवे । पश्चात् शिरको मुँडवाकर उक्त औषधिका लेप करके केलेके कोमल पत्ते बाँधदेवे । फिर उनको सातवें दिन खोलकर त्रिफलेके क्वाथसें शिरको धोवे । इस औषधिका व्यवहार करते समय सात दिनतक दूध और मांस-रसका भोजन करे । यह प्रयोग शिरके सफेद बालोंको काला करनेके लिये सर्वोत्तम है ॥ ८०-८२ ॥
उत्पलं पयसा सार्द्धं मासं भूमौ निधापयेत् । केशानां स्नेहनं कृष्णीकरणं च विधीयते ॥ ८३ ॥
नीले कमलको दूधके साथ पीसकर लोहेके वर्त्तनमें भरकर भूमिमें गाडदेवे । फिर एक महीने पीछे निकालकर उसको शिरपर मले तो इससे बाल काले और चिकने होजाते हैं ॥ ८३ ॥
भृङ्गपुष्पं जवापुष्पं मेषदुग्धप्रपेषितम् । तेनैवालोडितं लौहपात्रस्थं भूम्यधःकृतम् ॥ ८४ ॥ सप्ताहादुद्धृतं पश्चाद्भृङ्गराजरसेन तु । आलोड्याभ्यज्य च शिरो वेष्टयित्वा वसेन्निशाम् ॥ ८५ ॥ प्रातस्तु क्षालनं कार्यमेवं स्यान्मूर्द्धरञ्जनम् । एवं सिन्दूरबालाम्रशङ्खभृङ्गरसैः क्रिया ॥ ८६ ॥
११४० भैषज्यरत्नावली । [ क्षुद्ररोग-
भाँगरके फूल और जवापुष्प इन दोनोंको भेडके दूधमें खरल करके फिर भेडके दूधमें मिलाकर लोहेके पात्रमें भरकर पृथ्वीमें गाड देवे । फिर एक सप्ताहके अनन्तर उसको निकालकर भाँगरके रसके साथ मिलाकर रात्रिके समय शिरपर मालिश कर केलेके कोमल पत्तोंको बाँधदेवे । पश्चात् प्रातःकाल पत्तोंको खोलकर त्रिफलेके क्वाथसे शिरको प्रक्षालन करे । इससे सम्पूर्ण केश कृष्णवर्ण होजाते हैं-। इसी प्रकार सिन्दूर, कच्चे आमकी गुठलीकी मींग और शंखचूर्ण इनको भाँगरके रसमें मिलाकर लेप करनेसे भी बाल काले होजाते हैं ॥
रसाञ्जनं शङ्खचूर्णंकाञ्जिकरससंयुक्तं हिसीसकं घृष्ट्वा । लेपात्कचानर्कदलावनद्धान शुभ्रान्करोति हि नीलतरान् ॥ ८७ ॥
रसौंत और शंखचूर्ण दोनोंको सीसेके पात्रमें काँजीके साथ घोटकर बालोंपर लेप करे और आकके पत्तोंको बाँधदेवे । यह योग सफेदबालोंको अत्यन्त कृष्णवर्णके करदेता है ॥ ८७ ॥
लौहमलामलकल्कैः सजवाकुसुमैर्नरः सदा स्नायी । पलितानीह न पश्यति गङ्गास्नायीव नरकाणि ॥ ८८ ॥
मण्डूर, आमले और गुड़हलके फूल इनको एकत्र पीसकर प्रतिदिन प्रातःसमय स्नान करके मस्तकपर लेप करे । इससे पलितरोग (बालोंका असमय पकना) इस प्रकार नष्ट होजाता है, जिस प्रकार गङ्गामें स्नान करनेवाला मनुष्य पाप दूर होजानेसे नरकको नहीं जाता है ॥ ८८ ॥
निम्बस्य बीजानिहि भावितानिभृङ्गस्य तोयेन तथा- ऽसनस्य । तैलं तु तेषांविनिहन्ति नस्याद्दुग्धान्नभोक्तुः पलितं समूलम् ॥ ८९ ॥
नीमके बीजोंको विजयसारके क्वाथ और भाँगरके रसमें यथाविधि सात दिनतक भावना देकर उनको निचोडकर तेल निकाललेवे । फिर इस तेलको नस्यद्वारा प्रयोग करे तो पलितरोग समूल नष्ट होजाता है । किन्तु, इसपर दूध और भातका भोजन करता रहे ॥ ८९ ॥
निम्बस्य तैलं प्रकृतिस्थमेव नस्तो निषिक्तं विधिना यथावत् । मासेन गोरक्षीभुजो नरस्य जराप्रभूतं पलितं निहन्ति ॥ ९० ॥
निरन्तर गौके दूधको पान करता हुआ मनुष्य यदि एक महीनेतक प्रकृतिस्थित नीमके तेलको विधिपूर्वक निकालकर नस्यद्वारा व्यवहार करे तो उसके प्रकृतिके अनुसार वृद्धावस्थाके प्रारम्भमें उत्पन्न हुआभी पलितरोग नष्ट होता है ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११४१
काञ्जिकपिष्टशेलुफलमज्जनि सच्छिद्रलौहगे ।
यदर्कतापात्पतति तैलं तन्नस्यम्रक्षणात् ॥ ९१ ॥
केशा नीलालिकसंकाशाः सद्यः स्निग्धा भवन्ति च ।
नयनश्रवणग्रीवादन्तरोगंश्च हन्त्यदः ॥ ९२ ॥
लिसौडेकी मींगको काँजीमें पीसकर लोहेकी छलनीमें करके धूपमें रक्खे धूपकी तेजीसे छलनीमें जो तेल नीचे गिरताजाय उसको दूसरे पात्रमें ग्रहण करता जाय । फिर इस तेलको नस्यद्वारा और शिरपर मर्दनकर प्रयोग करे । इससे सफेदवाल भौरोंकी पंक्तिके समान तत्काल काले और चिकने होजाते हैं। यह तेल, नेत्र, श्रवण गर्दन और दाँतोंके रोगोंको नष्ट करता है ॥ ९२ ॥
भृङ्गराजघृत ।
भृङ्गराजरसे पक्वं शिखिपित्तेन कल्कितम् ।
घृतं नस्येन पलितं हन्यात्सप्ताहयोगतः ॥ ९३ ॥
भाँगरेके रसमें मोरके पित्तका कल्क डालकर घृतको पकावे इस घृतका सात दिनतक नस्य लेनेसे पलितरोग नष्ट होता है ॥ ९३ ॥
महाभृङ्गराजतैल ।
आनूपदेशसम्भूतं गृहीत्वा मार्कवं शुभम् ।
सुधौतं जर्जरीकृत्य स्वरसं तस्य चाहरेत् ॥ ९४ ॥
चतुर्गुणेन तेनैव तैलप्रस्थं विपाचयेत् ।
एभिर्द्रव्यैः क्षीरपिष्टैः संयोज्य मतिमान् भिषक् ॥ ९५॥
मञ्जिष्ठा पद्मकं लोध्रं चन्दनं गैरिकं बला ।
रजन्यौ केशरं चैव प्रियङ्गु मधयष्टिका ॥ ९६ ॥
प्रपौण्डरीकं गोपी च पलिकान्यत्र दापयेत् ।
सम्यक्पक्वं ततो ज्ञात्वा शुभे भाण्डे निधापयेत् ॥ ९७ ॥
केशपाते शिरोदुष्टे मन्यास्तम्भे गलग्रहे ।
शिरःकर्णाक्षिरोगेषु नस्येऽभ्यङ्गे च योजयेत् ॥ ९८ ॥
कुञ्चिताग्रानतिस्निग्धान् कचान्कुर्याद्वृहंस्तथा ।
खालित्यमिन्द्रलुप्तं च तैलमेतद् व्यपोहति ॥ ९९ ॥
अनूपदेश (खादर) में उत्पन्न हुए भाँगरेको लाकर जलसे धोकर, कुचलकर उसका रस निकाले । फिर १ आढक परिमाण उक्त रसके साथ एक प्रस्थ तिल
११४२ भैषज्यरत्नावली । [ क्षुद्ररोग-
तैलको पकावे । पकते समय उसमें दूधमें पीसेहुए मंजीठ, पद्माख, लोध, चन्दन, गेरू, खिरेंटी, हल्दी, दारुहल्दी, नागकेशर, फूलप्रियंगु, मुलहठी, पुण्डरिया और अनन्तमूल इन औषधियोंके कल्कको डाल देवे । जब पाक अच्छे प्रकार सिद्ध होजाय तब उतारकर स्वच्छपात्रमें भरकर रख देवे । इस तेलको बालोंका गिरना, शिरोरोग, मन्यास्तम्भ, गलग्रह, शिर, कान और नेत्ररोगमें नस्य और अभ्यङ्गद्वारा प्रयोग करे । यह तेल बालोंको घुँघुरवाले, अत्यन्त स्निग्ध घने बनाता है तथा खालित्य और इन्द्रलुप्तरोगको शीघ्र नष्ट करता है ॥ ९४-९९ ॥
आदित्यपाकगुडूचीतैल ।
वटावरोहकेशिन्योश्चूर्णेनादित्यपाचितम् ।
गुडूचीस्वरसे तैलमभ्यङ्गात्केशरोपणम् ॥ १०० ॥
गिलोयके स्वरसमें बड़की दाढी और बालछड़का चूर्ण डालकर धूपमें रखकर उत्तमप्रकार तेलको पकावे । इस तेलकी मालिश करनेसे केश उत्पन्न होते हैं ॥
चन्दनाद्यतैल ।
चन्दनं मधुकं मूर्वा त्रिफला नीलमुत्पलम् ।
कान्ता वटावरोहश्च गुडूची बिसमेव च ॥ १०१ ॥
लौहचूर्णं तथा केशी शारिवे द्वे तथैव च ।
मार्कवस्वरसेनैव तैलं मृद्वग्निना पचेत् ॥ १०२ ॥
शिरस्युपचिताः केशा जायन्ते घनकुञ्चिताः ।
स्निग्धाश्च दृढमूलाश्च तथा भ्रमरसन्निभाः ॥
नस्येनाकालपलितं निहन्यात्तैलमुत्तमम् ॥ १०३ ॥
भाँगरेके रसमें रक्तचन्दन, मुलहठी, मूर्वा, त्रिफला, नीलकमल, फूलप्रियंगु, बड़की कोंपल, गिलोय, भसोंडा, लोहचूर्ण, भूतकेशी, उसवा और अनन्तमूल इनका समानभाग मिश्रित चूर्ण एवं तिलका तेल डालकर मन्दमन्द अग्निसे पकावे । इस तेलको शिरपर मलनेसे अत्यन्त घने और घुँघुरवाले बाल उत्पन्न होते हैं । एवं स्निग्ध दृढमूलवाले और भौंरेके समान काले होते हैं । इस तेलको सूंघनेसे असमय बालोंका पकना नष्ट होता है ॥ १०१-१०३ ॥
महानीलतैल ।
आदित्यवल्ल्या मूलानि कृष्णशैरीयकस्य च ।
सुरस्य चैव पत्राणि फलं कृष्णशणस्य च ॥ ४ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११४३
मार्कवः काकमाची च मधुकं देवदारु च ।
पृथक् दशपलांशानि पिप्पल्यस्त्रिफलाञ्जनम् ॥ ५ ॥
प्रपौण्डरीकं मञ्जिष्ठा लोध्रं कृष्णागुरूत्पलम् ।
आम्रास्थि कर्दमः कृष्णो मृणाली रक्तचन्दनम् ॥ ६ ॥
नीली भल्लातकास्थीनि कासीसं मदयन्तिका ।
सोमराज्यसनं शस्त्रं कृष्णौ पिण्डीतचित्रकौ ॥७॥
पुष्पाण्यर्जुनकाश्मर्योराम्रजम्बुफलानि च ।
पृथक् पञ्चपलैर्भागैः सुपिष्टैराढकं पचेत् ॥ ८ ॥
वैभीतकस्य तैलस्य धात्रीरसचतुर्गुणम् ।
कुर्यादादित्यपाकं वा यावच्छुष्को भवेद्रसः ॥ ९ ॥
लौहपात्रे ततः पूतं संशुद्धमुपयोजयेत् ।
पाने नस्ये क्रियायां च शिरोऽभ्यङ्गे तथैव च ॥ ११० ॥
एतच्चक्षुष्यमायुष्यं शिरसः सर्वरोगनुत् ।
महानीलमिति ख्यातं पलितघ्नमनुत्तमम् ॥ ११ ॥
सूर्यावर्त्त (हुलहुल) की जड, नीलापियाबाँसा, वनतुलसी, कालीसनक फल, भाँँगरा, मकोय, मुलहठी, देवदारु ये प्रत्येक औषधि दसदस पल, पीपल, त्रिफला, रसौंत, पुण्डरिया, मंजीठ, लोध, कालीअगर, नीलोत्पल, आमकी गुठली, कमलिनीकी जडकी कीचड, कमलनाल, लालचन्दन, नील, भिलावेकी मींग, कसीस, मोतिया, बावची, विजयसार, लोहचूर्ण, कृष्णचूडा (पुष्पवृक्ष विशेष), मैनफलकी छाल, चीतेकी जड, अर्जुन और कुम्हेरके फूल आम और जामुनके फल इन सबको पृथक् पृथक् पांच २ पल लेकर खूब बारीक कूट पीसकर चूर्ण करलेवे । बहेडेका तेल १ आढक और आंमलोंका रस ४ आढक परिमाण सबोंको यथाविधि मिलाकर जबतक रस न सूखजाय तबतक सूर्य तापद्वारा पाक करे । फिर उत्तम प्रकार सिद्ध होजानेपर उस तेलको वस्त्रमें छानकर लोहेके पात्रमें भरकर रखदेवे । इस तेलको पान, नस्य और शिरोमर्दनद्वारा प्रयोग करे । यह तेल नेत्रोंको हितकारी, आयुवर्द्धक और शिरके सम्पूर्णरोगोंको नष्ट करनेवाला है । यह महानील-तेल पलितरोगको नष्ट करनेके लिये सर्वोत्तम है ॥ १०४-१११ ॥
| ११४४ | भैषज्यरत्नावली । | [ क्षुद्ररोग- |
|---|
कच्छू और अहिपूतनककी चिकित्सा ।
कासीसरोचनातुत्थहरितालरसाञ्जनैः ।
अम्लपिष्टैः प्रलेपोऽयं वृषणकच्छ्वहिपूतयोः ॥ १२ ॥
हीराक्सीस, गोरोचन, तूतिया, हरिताल और रसौंत इनको समानभाग लेकर काँजीमें पीसकर लेप करे। यह लेप वृषण कच्छू और अहिपूतनक रोगको नष्ट करता है ॥ १२ ॥
पटोलपत्रत्रिफलारसाञ्जनविपाचितम् ॥ १३ ॥
पटोलपात, हरड, बहेडा, आमला और रसौंत इनके द्वारा घृतको यथाविधि सिद्धकर पान करनेसे अहिपूतन रोग दूर होता है ॥ १३ ॥
शूकरदंष्ट्रकी चिकित्सा ।
रजनीमार्कवमूलं पिष्टं शीतेन वारिणा तुल्यम् ।
हन्ति विसर्पं लेपाद्वराहदशनाह्वयं घोरम् ॥ १४ ॥
हल्दी और भाँगरेकी जड इन दोनोंको बराबर भाग लेकर शीतल जलमें पीस-कर लेप करनेसे अत्यन्त घोर शूकरदंष्ट्र और विसर्परोग नष्ट होता है ॥ १४ ॥
नाडीबीजकल्कः पीतो गव्येन सर्पिषा प्रातः ।
शमयति शूकरदंष्ट्रं सदाहपाकज्वरं घोरम् ॥ १५ ॥
नारीशाकके बीजोंको पीसकर प्रातःकाल गौके घीमें मिलाकर सेवन करे। इससे दाह और पाकज्वरसहित भयङ्कर शूकरदंष्ट्ररोग शमन होता है ॥ १५ ॥
विसर्पोक्तप्रतीकारः कार्यः शूकरदंष्ट्रके ॥ १६ ॥
शूकरदंष्ट्ररोगमें विसर्परोगकी चिकित्साके अनुसार चिकित्सा करे ॥ १६ ॥
शय्यामूत्रकी चिकित्सा ।
कृतमूत्रार्द्रभूभागमृदमाकृष्य खोलके ।
संभर्ज्य मधुसर्पिर्भ्यां लेहयेन्मूत्रितं जनम् ॥
शय्यायां मूत्ररोधः स्यान्मूत्रितस्य न संशयः ॥ ११७ ॥
जो मनुष्य खाटपर मूते रहताहो उसको जहाँ उसने पेशाब किया हो उसी खाटके नीचेकी गीली मिट्टीको खुरचकर खोलमें भूनकर शहद और घीमें मिलाकर चटावे। इससे खाटपर मूतना निस्सन्देह बन्द होता है ॥ ११७ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां क्षुद्ररोग चिकित्सा ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११४५
मुखरोगकी चिकित्सा ।
ओष्ठगत-मुखरोगकी चिकित्सा ।
ओष्ठप्रकोपे वातोत्थे शाल्वणेनोपनाहनम् ।
मस्तिष्के चैव नस्ये च तैलं वातहरैः शृतम् ॥
स्वेदोऽभ्यङ्गः स्नेहपानं रसायनमिहेष्यते ॥ १ ॥
वातजन्य ओष्ठरोगमें मृदु प्रलेप एवं वातनाशक औषधियोंके द्वारा बनाये हुए तैलसे शिरमें बस्ति और नस्य देवे । तथा सेंक, तैलादिका मर्दन, स्नेहपान और रसायन क्रिया करे ॥ १ ॥
वेधं शिराणां वमनं विरेकं तिक्तस्य पानं रसभोजनं च ।
शीतान्प्रलेपान्परिषेचनं च पित्तोपसृष्टेष्वधिकेषु कुर्यात् ॥ २ ॥
पित्तज ओष्ठरोगमें ओष्ठकी शिराको वेधकर रक्तमोक्षण तथा वमन, विरेचन कराकर तिक्तघृतका पान और तिक्तरसमिश्रित पदार्थोंका भोजन करावे । शीतल पदार्थोंको प्रलेप और सेचनद्वारा प्रयोग करे ॥ २ ॥
शिरोविरेचनं धूमः स्वेदः कवलधारणम् ।
हृते रक्ते प्रयोक्तव्यमोष्ठकोपे कफात्मके ॥ ३ ॥
कफजनित ओष्ठरोगमें ओष्ठकी समीपवर्त्तिनी शिराको वेधकर रुधिर निकलवावे । फिर नस्य, धूम, सेंक और कफनाशक द्रव्योंका कवल धारण करे ॥ ३ ॥
त्रिकटुः सर्जिकाक्षारः क्षारश्च यावशूकजः ।
क्षौद्रयुक्तं विधातव्यमेतच्च प्रतिसारणम् ॥ ४ ॥
सोंठ, मिरच, पीपल, सज्जी और जवाखार इनको समान भाग लेकर शहदमें मिलाकर पीडास्थानपर घर्षण करे ॥ ४ ॥
पित्तरक्ताभिघातोत्थाञ्जलौकाभिरुपाचरेत् ।
पित्तविद्रधिवच्चापि क्रियां कुर्यादशेषतः ॥ ५ ॥
रक्तपित्त और अभिघातसे उत्पन्नहुए ओष्ठरोगमें जोंक लगवाकर किञ्चित् रुधिर निकलवावे और शेषक्रिया पित्तजविद्रधिरोगके समान करे ॥ ५ ॥
| ११४६ | भैषज्यरत्नावली । | [ मुखरोग- |
|---|
दन्तगत-मुखरोगकी चिकित्सा ।
चलदन्तस्थिरकरं कुर्याद्वकुलचर्वणम् ।
आर्त्तगलदलक्वाथगण्डूषो दन्तचालनुत् ॥
दन्तचाले हितं श्रेष्ठं तिलोग्राचर्वणं सदा ॥ ६ ॥
जिसके दाँत हिलते हों तो वह मौलसिरीके फल चर्वण करे अथवा नीलीकटसरैयाके पत्तोंका क्वाथ बनाकर उसका गण्डूष धारण करे । इससे दाँतोंका हिलना बन्द होजाता है । दाँतोंके हिलनेपर तिल और वच इन दोनोंको एकत्र मिलाकर निरन्तर चर्वण करना हितकारी है ॥ ६ ॥
दन्तपुप्पुटके कार्यं तरुणे रक्तमोक्षणम् ।
सपञ्चलवणः क्षारः सक्षौद्रः प्रतिसारणम् ॥ ७ ॥
नवीन दन्तपुप्पुटरोगमें रक्तमोक्षण करावे, फिर पाँचों नमक और जवाखार इनको पीसकर शहदमें मिलाकर दन्तमार्जन करे ॥ ७ ॥
दन्तानां तोदहर्षे च वातघ्नाः कवला हिताः ॥
गरम तेल, घी और स्नेहयुक्त दशमूलका क्वाथ इनके द्वारा कवल धारण करनेसे दाँतोंकी पीडा और दन्तहर्षरोग दूर होता है ॥
माक्षिकं पिप्पली सर्पिर्मिश्रितं धारयेन्मुखे ।
दन्तशूलहरं प्रोक्तं प्रधानमिदमौषधम् ॥ ८ ॥
पीपलके चूर्णको ६ माशे लेकर एक तोले घी और दो तोले शहदमें मिलाकर मुखमें धारण करे । यह औषधि दन्तशूलको हरनेके लिये सर्वप्रधान है ॥ ८ ॥
विस्राविते दन्तवेष्टे व्रणं तु प्रतिसारयेत् ।
लोध्रपत्तङ्गमधुकलाक्षाचूर्णैर्मधूत्तरैः ॥
गण्डूषे क्षीरिणो योज्याः सक्षौद्रघृतशर्कराः ॥ ९ ॥
दन्तवेष्टरोगमें जोंक आदिके द्वारा रक्तमोक्षण कराकर लोध, लालचन्दन, मुलहठी और लाख इनको एकत्र पीसकर शहदमें मिलाकर व्रणस्थानपर लगावे और शहद, घृत एवं चीनी मिलाकर दूधवाले बड, गूलर आदि वृक्षोंके क्वाथद्वारा गण्डूष (कुल्ले) करे । इससे दन्तवेष्टरोगके व्रण अच्छे होते हैं ॥ ९ ॥
शौशिरे हतरक्ते तु लोध्रमुस्तरसाम्जनैः ।
सक्षौद्रैः शस्यते लेपो गण्डूषे क्षीरिणो हिताः ॥ १० ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११४७
शौशिररोगमें जोंक लगवाकर रक्त निकलवावे। फिर लोध्र, नागरमोथा और रसौंत इनका चूर्ण करके शहदमें मिलाकर लेप करे। और गण्डूषमें वडआदि क्षीरीवृक्षों का क्वाथ प्रयोग करना हितकर कहा है ॥ १० ॥
क्रियां परिदरे कुर्याच्छीतादोक्तां विचक्षणः ॥
परिदर नामक दन्तरोगमें शीतादरोगमें कहीहुई विधिके अनुसार चिकित्सा करनी चाहिये ॥
संशोध्योभयतः कार्यं शिरश्चोपकुशे ततः ।
काकोदुम्बरिकागोज्ञीपत्रैर्विस्त्रावयेद्भिषक् ॥ ११ ॥
क्षौद्रयुक्तैश्च लवणैः सव्योषैः प्रतिसारयेत् ।
पिप्पल्यः सर्षपाः श्वेता नागरं नैचुलं फलम् ॥
सुखोदकेन संमर्द्य कवलं तस्य योजयेत् ॥ १२ ॥
उपकुशनामकदन्तरोगमें प्रथम वमन, विरेचन और नस्य देकर शरीरकी शुद्धि करे। पश्चात् गूलरके पत्ते और गोजियाके पत्तोंसे मसूड़ोंको घिसकर रुधिर निकाले। फिर पाँचोंनमक और त्रिकुटके चूर्णको शहदमें मिलाकर घिसे और पीपल, सफेद सरसों, सोंठ और समुद्रफल इनको एकत्र पीसकर किञ्चित् उष्ण जलके साथ मिश्रितकर रोगीको कवल धारण करनेके लिये देवे ॥ १२ ॥
शस्त्रेण दन्तवैदर्भे दन्तमूलानि शोधयेत् ।
ततः क्षारं प्रयुञ्जीत क्रियाः सर्वाश्च शीतलाः ॥ १३ ॥
दन्तवैदर्भ रोगमें शस्त्रसे दाँतोंकी जडमेंसे पीप आदिको निकालकर क्षार प्रयोग करे और सब शीतल क्रिया करे ॥ १३ ॥
उद्धृत्याधिकदन्तं तु ततोऽग्निमवचारयेत् ।
कृमिदन्तकवच्चात्र विधिः कार्यो विजानता ॥ १४ ॥
अधिकदन्तरोगमें अधिक दाँतको उखाडकर, व्रणस्थानको अग्निसे दग्ध कर देवे। फिर कृमिदन्तरोगकी समान सम्पूर्ण चिकित्सा करे ॥ १४ ॥
छित्त्वाऽधिमांसं सक्षौद्रैरेतैश्चूर्णैरुपाचरेत् ।
पाठावचातेजवतीसर्जिकायावशूकजैः ॥
क्षौद्रद्वितीयाः पिप्पल्यः कवलश्चात्र कीर्तितः ॥१५॥
दाँतोंके अधिकमांसको शस्त्रद्वारा काटकर पाठ, वच, चव्य, सज्जी और जवाखार इनके चूर्णको समानभाग लेकर शहदमें मिलाकर व्रणस्थानपर लगावे और पीपल के चूर्णको शहदके साथ मिलाकर कवल धारण करे ॥ १५॥
११४८ | भैषज्यरत्नावली । | [ मुखरोग-
पटोलनिम्बत्रिफलाकषायश्चात्र धावने ।
शिरोविरेकश्च हितो धूमो वैरेचनश्च यः ॥ १६ ॥
अधिमांसरोगमें पटोलपात, नीमके पत्ते और त्रिफला इनके क्वाथसे दन्तव्रणोंको धोवे और नस्य तथा कफनिस्सारक धूमपान करे ॥ १६ ॥
नाडीव्रणहरं कर्म्म दन्तनाडीषु कारयेत् ।
यं दन्तमधिजायेत नाडी तं दन्तमुद्धरेत् ॥ १७ ॥
छित्त्वा मांसानि शस्त्रेण यदि नोपरिजो भवेत् ।
शोधयित्वादहेच्चापि क्षारेण ज्वलनेन वा ॥ १८ ॥
दन्तनाडीरोगमें नाडीव्रणरोगकी समान चिकित्सा करे । और जिस दाँतमें नाडी उत्पन्न हुई हों उस दाँतको उखाड डाले । यदि नाडी बहुत भीतरको हो तो वहाँके मांसको शस्त्रसे काटकर पीव आदिको निकाल डाले, फिर क्षारसे अथवा अग्निसे उस घावको दग्ध करदेवे ॥ १७ ॥ १८ ॥
गतिर्हिनस्ति हन्वस्थि दशने समुपेक्षिते ।
तस्मात्समूलदशनं निर्हरेद्भग्नमस्थि च ॥ १९ ॥
नीचेके दाँतोंकी नाडीकी उपेक्षाकर दांतको नहीं उखाडे, किन्तु ठोडीकी अस्थि-तक शस्त्रसे चीर देवे । यदि दांत हड्डी और बीचमेंसे टूटगया हो तो उस हड्डीकों और दाँतको जडसहित निकाल डाले ॥ १९ ॥
उद्धृते तूत्तरे दन्ते शोणितं संप्रसिच्यते ।
रक्तात्तियोगात्पूर्वोक्ता घोरा रोगा भवन्ति च ॥
चलमप्युत्तरं दन्तमतो नोपहरेद्भिषक् ॥ २० ॥
ऊपर दाँतको उखाडनेसे रुधिर अधिक निकलता है । और अधिक रुधिरके निकलनेसे पूर्वोक्त भयङ्कररोग उत्पन्न होजाते हैं । इस कारण ऊपरका दाँत हिलता हो तो भी नहीं उखाडना चाहिये ॥ २० ॥
कषायं जातिमदनकटुकास्वादुकण्टकैः ।
लोध्रखादिरमञ्जिष्ठायष्ट्याहैश्चापि यत्कृतम् ॥
तैलं संशोधनं तद्धि हन्याद्दन्तगतां गतिम् ॥ २१ ॥
चमेलीके पत्ते, मदनवृक्षका काँटा, कुटकी और कण्टाई इनका क्वाथ बनाकर कवल धारण करे और लोध, खैर, मंजीठ तथा मुलहठी इनके कल्कद्वारा
चिकित्सा ] भाषाटीकासहितं । ११४९
यथाविधि तेलको सिद्ध करके दाँतोंको मर्जित करे इससे पीव आदि दूर होकर दन्तनाडीरोग नष्ट होता है ॥ २१ ॥
सुखोषणाः स्नेहकवलाः सर्पिषस्त्रैवृतस्य वा । निर्यूहाश्चानिलघ्नानां दन्तहर्षप्रमर्दनाः । स्नैहिकश्च हितो धूमो नस्यं स्नैहिकमेव च ॥ २२ ॥
दन्तहर्षरोगमें घी, तेल, चर्बी और मज्जा इनमेंसे किसी एक द्रव्यको कुछ गरम-कर निसोतके घृत अथवा वातनाशक औषधियोंके क्वाथमें मिलाकर कवल धारण करे । इसमें स्निग्धद्रव्योंका धूमपान तथा स्निग्धद्रव्योंका नस्य लेना हितकर है ॥ २२ ॥
अहिंसन् दन्तमूलानि शर्करामुद्धरेद्भिषक् । लाक्षाचूर्णैर्मधुयुतैस्ततस्तां प्रतिसारयेत् ॥ २३ ॥ दन्तहर्षक्रियां चापि कुर्यान्निरवशेषतः ॥ २४ ॥
दन्तशर्करामें वैद्य दाँतोंकी जडको नहीं चीरे, किन्तु शर्कराको चीरकर निकाल देवे । फिर लाखके चूर्णके साथ शहद मिलाकर उक्त स्थानपर घिसे । पश्चात् दन्तहर्ष रोगमें कहीहुई चिकित्साके अनुसार समस्त क्रिया करे ॥ २३ ॥ २४ ॥
कपालिका कृच्छ्रसाध्या तत्राप्येषा क्रिया हिता ॥
कपालिकारोग कृच्छ्र साध्य है तथापि उसमें दन्तहर्षकी समान चिकित्सा करे ॥
जयेद्विस्रावणैश्छिन्नमचलं कृमिदन्तकम् । तथाऽवपीडैर्वातघ्नैः स्नेहगण्डूषधारणैः ॥ २५ ॥ भद्रदार्वादिवर्षाभूलेपैः स्निग्धैश्च भोजनैः । हिङ्गु सोष्णं तु मतिमान् कृमिदन्तेषु दापयेत् ॥ २६ ॥
अचलकृमिदन्तकनामरोगमें प्रथम स्वेद देकर रुधिर निकाले । फिर वातनाशक द्रव्योंसे नस्य देवे और स्नेहद्रव्योंके कुल्ले करवावे । तथा भद्रदारु आदि गणकी औषधों और पुनर्नवेका लेप करे एवं स्निग्धद्रव्योंका भोजन करे । कृमिदन्तरोगमें हींगको कुछ गरम करके डाढके नीचे दबानेसे विशेष लाभ होता है ॥
बृहतीभूमिकदम्बकपञ्चाङ्गुलकण्टकारिकाक्वाथः । गण्डूषस्तैलयुतः कृमिदन्तवेदनापहरः ॥ २७ ॥
बडी कटेरी, भुईकदम, अण्डकी जड और कटेरी इनका क्वाथ बनाकर उसमें कडवा तेल डालकर कुल्ले करे । इससे कृमिदन्तकी पीडा दूर होती है ॥ २७ ॥
११५० भैषज्यरत्नावली । [ मुखरोग-
नीलीवायसजङ्घास्नुग्दुग्धीनां तु मूलमेकैकम् । सञ्चर्व्य दशनविधृतं दशनकृमिशातनं प्राहुः ॥ २८ ॥ नीलवृक्ष, काकजंघा, थूहर और दुद्धी इनमेंसे प्रत्येककी जडको लेकर यथाक्रम चर्वणकर दाँतोंमें रखनेसे दाँतोंके कीडे गिरपडते हैं ॥ २८ ॥
चलमुद्धृत्य वा स्थानं दहेत्तु सुषिरस्य वा । हिलतेहुए दाँतको उखाडकर उस स्थानको और कीडेवाले दाँतके छेदको अग्निसे दग्ध करे ॥
हनुमोक्षे समुद्दिष्टा कार्या चार्दितवत् क्रिया ॥ २९ ॥ हनुमोक्षरोगमें अर्दितरोगके समान सम्पूर्ण क्रिया करे ॥ २९ ॥
कर्कटाङ्घ्रिक्षीरपक्वघृताभ्यङ्गेन नश्यति । दन्तशब्दः कर्कटाङ्घ्रिलेपाद्वा दन्तयोजितात् ॥३०॥ केंकडेके एक पैरको लेकर दूध और घृतमें मिलाकर विधिपूर्वक घृतको सिद्ध करे । इस घृतकी दाँतोंमें मालिश करनेसे अथवा केंकडेके पैरको पीसकर लेप करनेसे दाँतोंका कडकडशब्द होना दूर होता है ॥ ३० ॥
चरणौ कर्कटस्यापि गोक्षीरेण विपाचयेत् । घनतां च गते तस्मिन् रात्रौ चरणलेपनात् ॥ दन्तानां कङ्कमडीं हन्ति सत्यं सत्यं च पार्वति ॥ ३१ ॥ हे पार्वति ! केंकडेके दो पैरोंको पीसकर गौके दूधमें पकावे । पकते २ जब पाक गाढा होजाय तब उसको उतारलेवे, फिर रात्रिमें उसका चरणोंपर लेप करे तो इससे दाँतोंकी कडकडाहट दूर होती है । यह बिल्कुल सत्य है ॥ ३१ ॥
कृष्णवर्णाश्वपुच्छस्य सप्तकेशेन वेणिका । तां बद्ध्वा च गले दन्तकङ्कमडीं हन्ति मानवः ॥ ३२ ॥ काले रंगवाले घोडेकी पूँछके सात बालोंकी एक वेणी बनावे । उसको गलेमें बाँधनेसे दाँतोंका कडकडाना बन्द होता है ॥ ३२ ॥
जिह्वागत-मुखरोगकी चिकित्सा । ओष्ठकोपे त्वनिलजे यदुक्तं प्राक् चिकित्सितम् । कण्टकेष्वनिलोत्थेषु तत्कार्यं भिषजा खलु ॥ ३३ ॥ वातज ओष्ठरोगमें जो पूर्व चिकित्सा कहीगई है तदनुसारही वातजनित जिह्वाके काँटोंपर चिकित्सा करे ॥ ३३ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११५१
पित्तेजेषु निधृष्टेषु निःसृते दुष्टशोणिते ।
प्रतिसारणगण्डूषनस्यं च मधुरं हितम् ॥ ३४ ॥
पित्तजजिह्वारोगमें सिहोडा आदिके कैडे पत्तोंसे जिह्वाको घिसकर दूषित रक्त निकाल देवे । फिर काकोल्यादिगणकी औषधियोंके चूर्णसे प्रतिसारण, गण्डूष और नास ग्रहण करे ॥ ३४ ॥
कण्टकेषु कफोत्थेषु लिखितेष्वसृजः क्षये ।
पिप्पल्यादिर्मधुयुतः कार्यं तु प्रतिसारणम् ॥ ३५ ॥
कफजनित कण्टकरोगमें काँटोंको शस्त्रसे कटवाकर उनका रुधिर निकलवादे । फिर पिप्पल्यादिगणकी औषधियोंके चूर्णको शहदमें मिलाकर जिह्वापर घिसे ३५
गृह्णीयात्कवलान्वापि गौरसर्षपसैन्धवैः ।
पटोलनिम्बवार्त्ताकुक्षारयुक्तैश्च भोजयेत् ॥ ३६ ॥
सफेद सरसों और सेंधानमकको एकत्र पीसकर उष्णजलमें मिलाकर इनका कवल धारण करे । अथवा पटोलपात, नीमके पत्ते, बैंगन और क्षार इनको मिला- कर कुलथी आदिका यूष भोजन करे ॥ ३६ ॥
जिह्वाजाड्यं चिरजं माणकभस्मलवणतैलघर्षणं हन्ति ।
ईषत्स्नुक्क्षीराक्तं जम्बीराद्यम्लचर्वणं वापि ॥ ३७ ॥
मानकन्दकी भस्म, सेंधानमक और तेल इनको एकत्र मिलाकर जिह्वापर घर्षण करे । अथवा जम्बीरीनींबूकी केशरमें कुछ थोडासा थूहरका दूध मिलाकर चर्वण करे । इससे जिह्वाकी जडता नष्ट होती है ॥ ३७ ॥
उपजिह्वां तु संलिख्य क्षारेण प्रतिसारयेत् ।
शिरोविरेकगण्डूषधूमैश्चैनामुपाचरेत् ॥ ३८ ॥
उपजिह्वा ( काग ) को सिहोरा आदिके पत्तोंसे खुरचकर उसपर जवाखारको घिसे । फिर नस्य, गण्डूष और धूमपान आदि उपचारोंको करके उपजिह्वारोगको जीते ॥ ३८ ॥
व्योषक्षाराभयावह्निचूर्णमेतत्प्रघर्षणम् ।
उपजिह्वाप्रशान्त्यर्थमेतैस्तैलं विपाचयेत् ॥ ३९ ॥
सोंठ, मिरच, पीपल, जवाखार, हरड और चीतामूल इनके चूर्णको जिह्वा पर घिसे । अथवा उक्त औषधियोंके चूर्णद्वारा तेलको पकाकर वह तेल मर्दन करे तो उपजिह्वारोग शमन होता है ॥ ३९ ॥
११५२ भैषज्यरत्नावली। [ मुखरोग-
तालुगत-मुखरोगकी चिकित्सा।
छित्त्वा घर्षेद्गलशुण्ठीं व्योषोग्राक्षौद्रसिन्धुजैः।
कुष्ठोषणवचासिन्धुकणापाठाप्लवैरपि॥
सक्षौद्रैर्भिषजा कार्यं गलशुण्ठ्याः प्रघर्षणम्॥ ४०॥
गलशुण्ठी (कण्ठशुण्ठी) रोगको शस्त्रसे काटकर सोंठ, मिरच, पीपल, वच और सैंधेनमकके चूर्णको शहदमें मिलाकर अथवा कुठ, कालीमिरच, वच, सेन्धानमक, पीपल, पाठ और नागरमोथा इनके समानभाग चूर्णको शहदमें मिश्रितकर गलशुण्डीपर घिसे॥ ४०॥
उपनासाव्यधो हन्ति गलशुण्ठ्या विशेषतः।
गलशुण्ठीहरं तद्वच्छेफालीमूलचर्वणम्॥ ४१॥
नासिकाके समीपकी चौथी शिराको छोडकर अन्य शिराको वेधे। अथवा निर्गुण्डीकी जडको चावे तो गलशुण्ठीरोग दूर होता है॥ ४१॥
वचामतिविषां पाठां रास्नां कटुकरोहिणीम्।
निःक्वाथ्य पिचूमर्दे च कवलं तत्र योजयेत्॥ ४२॥
वच, अतीस, पाठ, रास्ना, कुटकी और नीमकी छाल इनका क्वाथ बनाकर उसका कवल धारण करे॥ ४२॥
क्षारसिद्धेषु मुद्गेषु यूषश्चाप्यशने हितः।
तुण्डिकेर्यध्रुषे कूर्मसंघाते तालुपुप्पुटे॥
एष एव विधिः कार्यो विशेषः शस्त्रकर्मणि॥ ४३॥
तुण्डिकेरी, अध्रुव, कूर्मसंघात और तालुपुप्पुटरोगमें जवाखारआदिक्षारद्रव्योंके द्वारा सिद्ध किया हुआ मूँगका यूष भोजन करे। इन समस्तरोगोंमें गलशुण्ठी रोगके समान चिकित्सा करे और विशेषकर शस्त्रक्रिया करे॥ ४३॥
तालुपाके तु कर्त्तव्यं विधानं पित्तनाशनम्।
स्नेहस्वेदौ तालुशोषे विधिश्चानिलनाशनः॥ ४४॥
तालुपाकरोगमें पित्तनाशकचिकित्सा करनी चाहिये और तालुशोषरोगमें स्नेह तथा स्वेद प्रयोगकर वातनाशकक्रिया करनी चाहिये॥ ४४॥
कण्ठगत-मुखरोगकी चिकित्सा।
साध्यानां रोहिणीनां तु हितं शोणितमोक्षणम्।
छर्दनं धूमपानं च गण्डूषो नस्यकर्म च॥ ४५॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११५३
चिकित्सासाध्य रोहिणीरोगमें रक्तमोक्षण, वमन, धूमपान, गण्डूष और नस्य इत्यादि प्रयोग करने हितकारी हैं ॥ ४५ ॥
वातिकीं तु हृते रक्ते लवणैः प्रतिसारयेत् ।
सुखोष्णांस्तैलकवलान् धारयेच्चाप्यभीक्ष्णशः ॥ ४६ ॥
वातज रोहिणीमें पहले रक्तमोक्षण कर फिर पञ्चलवण द्वारा घर्षण करे और निरन्तर मन्दोष्ण तेलके कवल धारण करे ॥ ४६ ॥
पत्तङ्गरशर्कराक्षौद्रैः पैत्तिकीं प्रतिसारयेत् ।
द्राक्षापरूषकक्वाथो हितश्च कवलग्रहे ॥ ४७ ॥
पित्तकी रोहिणीमें लालचन्दन, चीनी और शहद इनको एकत्र मिलाकर प्रतिसारण करे। एवं दाख और फालसोंका क्वाथ बनाकर कवल धारण करे ॥
आगारधूमकटुकैः कफजां प्रतिसारयेत् ।
श्वेताविडङ्गदन्तीषु सिद्धं तैलं ससैन्धवम् ॥
नस्यकर्मणि दातव्यं कवलं च कफोच्छ्रये ॥ ४८ ॥
कफजनित रोहिणीरोगमें घरके धुएँ और कुटकीके चूर्णको घिसे । एवं श्वेत अपराजिता, वायविडङ्ग, दन्तीकी जड और सैंधानमक इनके कल्कद्वारा सिद्ध कियाहुआ तेल नस्यकर्ममें और कवलधारण करनेमें प्रयोग करे ॥ ४८ ॥
पित्तवत्साधयेद्वैद्यो रोहिणीं रक्तसम्भवाम् ॥ ४९ ॥
रक्तसे उत्पन्नहुए रोहिणीरोगकी पित्तजरोहिणाके समान चिकित्सा करे ॥
विस्राव्य कण्ठशालूकं साधयेत्तुण्डिकेरीवत् ।
एककालं यवान्नं च भुञ्जीत स्निग्धमल्पशः ॥ ५० ॥
कण्ठशालूकरोगमें अल्प रक्तमोक्षण कराकर तुण्डिकेरीरोगके समान चिकित्सा करे और एक वक्तमें थोडासा जौका बना स्निग्ध अन्न भोजन करे ॥ ५० ॥
उपजिह्विकवच्चापि साधयेदिरिवेल्लिकाम् ॥ ५१ ॥
इरिवेल्लिकारोगकी उपजिह्विकरोगके समान चिकित्सा करे ॥ ५१ ॥
उन्नाम्य जिह्वामाकृष्य बडिशेनाधिजिह्वकम् ।
छेदयेन्मण्डलाग्रेण तीक्ष्णोष्णैर्घर्षणादिभिः ॥ ५२ ॥
अधिजिह्वारोगमें जिह्वाको ऊपरको उठाकर और बडिशयन्त्र (संडासी) से अधिजिह्वाको खींचकर मण्डलाग्रशस्त्रसे छेदन करे । फिर तीक्ष्ण और गरम औषधियोंसे घिसकर थोडासा रक्त निकालकर संशोधनक्रिया करे ॥ ५२ ॥
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