भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1179, कुल 1416 में से

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पृष्ठ 1179

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११४७

शौशिररोगमें जोंक लगवाकर रक्त निकलवावे। फिर लोध्र, नागरमोथा और रसौंत इनका चूर्ण करके शहदमें मिलाकर लेप करे। और गण्डूषमें वडआदि क्षीरीवृक्षों का क्वाथ प्रयोग करना हितकर कहा है ॥ १० ॥

क्रियां परिदरे कुर्याच्छीतादोक्तां विचक्षणः ॥

परिदर नामक दन्तरोगमें शीतादरोगमें कहीहुई विधिके अनुसार चिकित्सा करनी चाहिये ॥

संशोध्योभयतः कार्यं शिरश्चोपकुशे ततः ।
काकोदुम्बरिकागोज्ञीपत्रैर्विस्त्रावयेद्भिषक् ॥ ११ ॥
क्षौद्रयुक्तैश्च लवणैः सव्योषैः प्रतिसारयेत् ।
पिप्पल्यः सर्षपाः श्वेता नागरं नैचुलं फलम् ॥
सुखोदकेन संमर्द्य कवलं तस्य योजयेत् ॥ १२ ॥

उपकुशनामकदन्तरोगमें प्रथम वमन, विरेचन और नस्य देकर शरीरकी शुद्धि करे। पश्चात् गूलरके पत्ते और गोजियाके पत्तोंसे मसूड़ोंको घिसकर रुधिर निकाले। फिर पाँचोंनमक और त्रिकुटके चूर्णको शहदमें मिलाकर घिसे और पीपल, सफेद सरसों, सोंठ और समुद्रफल इनको एकत्र पीसकर किञ्चित् उष्ण जलके साथ मिश्रितकर रोगीको कवल धारण करनेके लिये देवे ॥ १२ ॥

शस्त्रेण दन्तवैदर्भे दन्तमूलानि शोधयेत् ।
ततः क्षारं प्रयुञ्जीत क्रियाः सर्वाश्च शीतलाः ॥ १३ ॥

दन्तवैदर्भ रोगमें शस्त्रसे दाँतोंकी जडमेंसे पीप आदिको निकालकर क्षार प्रयोग करे और सब शीतल क्रिया करे ॥ १३ ॥

उद्धृत्याधिकदन्तं तु ततोऽग्निमवचारयेत् ।
कृमिदन्तकवच्चात्र विधिः कार्यो विजानता ॥ १४ ॥

अधिकदन्तरोगमें अधिक दाँतको उखाडकर, व्रणस्थानको अग्निसे दग्ध कर देवे। फिर कृमिदन्तरोगकी समान सम्पूर्ण चिकित्सा करे ॥ १४ ॥

छित्त्वाऽधिमांसं सक्षौद्रैरेतैश्चूर्णैरुपाचरेत् ।
पाठावचातेजवतीसर्जिकायावशूकजैः ॥
क्षौद्रद्वितीयाः पिप्पल्यः कवलश्चात्र कीर्तितः ॥१५॥

दाँतोंके अधिकमांसको शस्त्रद्वारा काटकर पाठ, वच, चव्य, सज्जी और जवाखार इनके चूर्णको समानभाग लेकर शहदमें मिलाकर व्रणस्थानपर लगावे और पीपल के चूर्णको शहदके साथ मिलाकर कवल धारण करे ॥ १५॥

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