भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1180

११४८ | भैषज्यरत्नावली । | [ मुखरोग-

पटोलनिम्बत्रिफलाकषायश्चात्र धावने ।
शिरोविरेकश्च हितो धूमो वैरेचनश्च यः ॥ १६ ॥
अधिमांसरोगमें पटोलपात, नीमके पत्ते और त्रिफला इनके क्वाथसे दन्तव्रणोंको धोवे और नस्य तथा कफनिस्सारक धूमपान करे ॥ १६ ॥

नाडीव्रणहरं कर्म्म दन्तनाडीषु कारयेत् ।
यं दन्तमधिजायेत नाडी तं दन्तमुद्धरेत् ॥ १७ ॥
छित्त्वा मांसानि शस्त्रेण यदि नोपरिजो भवेत् ।
शोधयित्वादहेच्चापि क्षारेण ज्वलनेन वा ॥ १८ ॥
दन्तनाडीरोगमें नाडीव्रणरोगकी समान चिकित्सा करे । और जिस दाँतमें नाडी उत्पन्न हुई हों उस दाँतको उखाड डाले । यदि नाडी बहुत भीतरको हो तो वहाँके मांसको शस्त्रसे काटकर पीव आदिको निकाल डाले, फिर क्षारसे अथवा अग्निसे उस घावको दग्ध करदेवे ॥ १७ ॥ १८ ॥

गतिर्हिनस्ति हन्वस्थि दशने समुपेक्षिते ।
तस्मात्समूलदशनं निर्हरेद्भग्नमस्थि च ॥ १९ ॥
नीचेके दाँतोंकी नाडीकी उपेक्षाकर दांतको नहीं उखाडे, किन्तु ठोडीकी अस्थि-तक शस्त्रसे चीर देवे । यदि दांत हड्डी और बीचमेंसे टूटगया हो तो उस हड्डीकों और दाँतको जडसहित निकाल डाले ॥ १९ ॥

उद्धृते तूत्तरे दन्ते शोणितं संप्रसिच्यते ।
रक्तात्तियोगात्पूर्वोक्ता घोरा रोगा भवन्ति च ॥
चलमप्युत्तरं दन्तमतो नोपहरेद्भिषक् ॥ २० ॥
ऊपर दाँतको उखाडनेसे रुधिर अधिक निकलता है । और अधिक रुधिरके निकलनेसे पूर्वोक्त भयङ्कररोग उत्पन्न होजाते हैं । इस कारण ऊपरका दाँत हिलता हो तो भी नहीं उखाडना चाहिये ॥ २० ॥

कषायं जातिमदनकटुकास्वादुकण्टकैः ।
लोध्रखादिरमञ्जिष्ठायष्ट्याहैश्चापि यत्कृतम् ॥
तैलं संशोधनं तद्धि हन्याद्दन्तगतां गतिम् ॥ २१ ॥
चमेलीके पत्ते, मदनवृक्षका काँटा, कुटकी और कण्टाई इनका क्वाथ बनाकर कवल धारण करे और लोध, खैर, मंजीठ तथा मुलहठी इनके कल्कद्वारा