भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1181

चिकित्सा ] भाषाटीकासहितं । ११४९

यथाविधि तेलको सिद्ध करके दाँतोंको मर्जित करे इससे पीव आदि दूर होकर दन्तनाडीरोग नष्ट होता है ॥ २१ ॥

सुखोषणाः स्नेहकवलाः सर्पिषस्त्रैवृतस्य वा । निर्यूहाश्चानिलघ्नानां दन्तहर्षप्रमर्दनाः । स्नैहिकश्च हितो धूमो नस्यं स्नैहिकमेव च ॥ २२ ॥

दन्तहर्षरोगमें घी, तेल, चर्बी और मज्जा इनमेंसे किसी एक द्रव्यको कुछ गरम-कर निसोतके घृत अथवा वातनाशक औषधियोंके क्वाथमें मिलाकर कवल धारण करे । इसमें स्निग्धद्रव्योंका धूमपान तथा स्निग्धद्रव्योंका नस्य लेना हितकर है ॥ २२ ॥

अहिंसन् दन्तमूलानि शर्करामुद्धरेद्भिषक् । लाक्षाचूर्णैर्मधुयुतैस्ततस्तां प्रतिसारयेत् ॥ २३ ॥ दन्तहर्षक्रियां चापि कुर्यान्निरवशेषतः ॥ २४ ॥

दन्तशर्करामें वैद्य दाँतोंकी जडको नहीं चीरे, किन्तु शर्कराको चीरकर निकाल देवे । फिर लाखके चूर्णके साथ शहद मिलाकर उक्त स्थानपर घिसे । पश्चात् दन्तहर्ष रोगमें कहीहुई चिकित्साके अनुसार समस्त क्रिया करे ॥ २३ ॥ २४ ॥

कपालिका कृच्छ्रसाध्या तत्राप्येषा क्रिया हिता ॥

कपालिकारोग कृच्छ्र साध्य है तथापि उसमें दन्तहर्षकी समान चिकित्सा करे ॥

जयेद्विस्रावणैश्छिन्नमचलं कृमिदन्तकम् । तथाऽवपीडैर्वातघ्नैः स्नेहगण्डूषधारणैः ॥ २५ ॥ भद्रदार्वादिवर्षाभूलेपैः स्निग्धैश्च भोजनैः । हिङ्गु सोष्णं तु मतिमान् कृमिदन्तेषु दापयेत् ॥ २६ ॥

अचलकृमिदन्तकनामरोगमें प्रथम स्वेद देकर रुधिर निकाले । फिर वातनाशक द्रव्योंसे नस्य देवे और स्नेहद्रव्योंके कुल्ले करवावे । तथा भद्रदारु आदि गणकी औषधों और पुनर्नवेका लेप करे एवं स्निग्धद्रव्योंका भोजन करे । कृमिदन्तरोगमें हींगको कुछ गरम करके डाढके नीचे दबानेसे विशेष लाभ होता है ॥

बृहतीभूमिकदम्बकपञ्चाङ्गुलकण्टकारिकाक्वाथः । गण्डूषस्तैलयुतः कृमिदन्तवेदनापहरः ॥ २७ ॥

बडी कटेरी, भुईकदम, अण्डकी जड और कटेरी इनका क्वाथ बनाकर उसमें कडवा तेल डालकर कुल्ले करे । इससे कृमिदन्तकी पीडा दूर होती है ॥ २७ ॥