भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११५० भैषज्यरत्नावली । [ मुखरोग-
नीलीवायसजङ्घास्नुग्दुग्धीनां तु मूलमेकैकम् । सञ्चर्व्य दशनविधृतं दशनकृमिशातनं प्राहुः ॥ २८ ॥ नीलवृक्ष, काकजंघा, थूहर और दुद्धी इनमेंसे प्रत्येककी जडको लेकर यथाक्रम चर्वणकर दाँतोंमें रखनेसे दाँतोंके कीडे गिरपडते हैं ॥ २८ ॥
चलमुद्धृत्य वा स्थानं दहेत्तु सुषिरस्य वा । हिलतेहुए दाँतको उखाडकर उस स्थानको और कीडेवाले दाँतके छेदको अग्निसे दग्ध करे ॥
हनुमोक्षे समुद्दिष्टा कार्या चार्दितवत् क्रिया ॥ २९ ॥ हनुमोक्षरोगमें अर्दितरोगके समान सम्पूर्ण क्रिया करे ॥ २९ ॥
कर्कटाङ्घ्रिक्षीरपक्वघृताभ्यङ्गेन नश्यति । दन्तशब्दः कर्कटाङ्घ्रिलेपाद्वा दन्तयोजितात् ॥३०॥ केंकडेके एक पैरको लेकर दूध और घृतमें मिलाकर विधिपूर्वक घृतको सिद्ध करे । इस घृतकी दाँतोंमें मालिश करनेसे अथवा केंकडेके पैरको पीसकर लेप करनेसे दाँतोंका कडकडशब्द होना दूर होता है ॥ ३० ॥
चरणौ कर्कटस्यापि गोक्षीरेण विपाचयेत् । घनतां च गते तस्मिन् रात्रौ चरणलेपनात् ॥ दन्तानां कङ्कमडीं हन्ति सत्यं सत्यं च पार्वति ॥ ३१ ॥ हे पार्वति ! केंकडेके दो पैरोंको पीसकर गौके दूधमें पकावे । पकते २ जब पाक गाढा होजाय तब उसको उतारलेवे, फिर रात्रिमें उसका चरणोंपर लेप करे तो इससे दाँतोंकी कडकडाहट दूर होती है । यह बिल्कुल सत्य है ॥ ३१ ॥
कृष्णवर्णाश्वपुच्छस्य सप्तकेशेन वेणिका । तां बद्ध्वा च गले दन्तकङ्कमडीं हन्ति मानवः ॥ ३२ ॥ काले रंगवाले घोडेकी पूँछके सात बालोंकी एक वेणी बनावे । उसको गलेमें बाँधनेसे दाँतोंका कडकडाना बन्द होता है ॥ ३२ ॥
जिह्वागत-मुखरोगकी चिकित्सा । ओष्ठकोपे त्वनिलजे यदुक्तं प्राक् चिकित्सितम् । कण्टकेष्वनिलोत्थेषु तत्कार्यं भिषजा खलु ॥ ३३ ॥ वातज ओष्ठरोगमें जो पूर्व चिकित्सा कहीगई है तदनुसारही वातजनित जिह्वाके काँटोंपर चिकित्सा करे ॥ ३३ ॥