भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1172, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1172

११४० भैषज्यरत्नावली । [ क्षुद्ररोग-


भाँगरके फूल और जवापुष्प इन दोनोंको भेडके दूधमें खरल करके फिर भेडके दूधमें मिलाकर लोहेके पात्रमें भरकर पृथ्वीमें गाड देवे । फिर एक सप्ताहके अनन्तर उसको निकालकर भाँगरके रसके साथ मिलाकर रात्रिके समय शिरपर मालिश कर केलेके कोमल पत्तोंको बाँधदेवे । पश्चात् प्रातःकाल पत्तोंको खोलकर त्रिफलेके क्वाथसे शिरको प्रक्षालन करे । इससे सम्पूर्ण केश कृष्णवर्ण होजाते हैं-। इसी प्रकार सिन्दूर, कच्चे आमकी गुठलीकी मींग और शंखचूर्ण इनको भाँगरके रसमें मिलाकर लेप करनेसे भी बाल काले होजाते हैं ॥

रसाञ्जनं शङ्खचूर्णंकाञ्जिकरससंयुक्तं हिसीसकं घृष्ट्वा । लेपात्कचानर्कदलावनद्धान शुभ्रान्करोति हि नीलतरान् ॥ ८७ ॥

रसौंत और शंखचूर्ण दोनोंको सीसेके पात्रमें काँजीके साथ घोटकर बालोंपर लेप करे और आकके पत्तोंको बाँधदेवे । यह योग सफेदबालोंको अत्यन्त कृष्णवर्णके करदेता है ॥ ८७ ॥

लौहमलामलकल्कैः सजवाकुसुमैर्नरः सदा स्नायी । पलितानीह न पश्यति गङ्गास्नायीव नरकाणि ॥ ८८ ॥

मण्डूर, आमले और गुड़हलके फूल इनको एकत्र पीसकर प्रतिदिन प्रातःसमय स्नान करके मस्तकपर लेप करे । इससे पलितरोग (बालोंका असमय पकना) इस प्रकार नष्ट होजाता है, जिस प्रकार गङ्गामें स्नान करनेवाला मनुष्य पाप दूर होजानेसे नरकको नहीं जाता है ॥ ८८ ॥

निम्बस्य बीजानिहि भावितानिभृङ्गस्य तोयेन तथा- ऽसनस्य । तैलं तु तेषांविनिहन्ति नस्याद्दुग्धान्नभोक्तुः पलितं समूलम् ॥ ८९ ॥

नीमके बीजोंको विजयसारके क्वाथ और भाँगरके रसमें यथाविधि सात दिनतक भावना देकर उनको निचोडकर तेल निकाललेवे । फिर इस तेलको नस्यद्वारा प्रयोग करे तो पलितरोग समूल नष्ट होजाता है । किन्तु, इसपर दूध और भातका भोजन करता रहे ॥ ८९ ॥

निम्बस्य तैलं प्रकृतिस्थमेव नस्तो निषिक्तं विधिना यथावत् । मासेन गोरक्षीभुजो नरस्य जराप्रभूतं पलितं निहन्ति ॥ ९० ॥

निरन्तर गौके दूधको पान करता हुआ मनुष्य यदि एक महीनेतक प्रकृतिस्थित नीमके तेलको विधिपूर्वक निकालकर नस्यद्वारा व्यवहार करे तो उसके प्रकृतिके अनुसार वृद्धावस्थाके प्रारम्भमें उत्पन्न हुआभी पलितरोग नष्ट होता है ॥