भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११९९

आमले और कच्चे आमका गूदा इनको एकत्र पीसकर लेप करनेसे बाल काले मजबूत और चिकने होजाते हैं ॥ ७९ ॥

त्रिफलाचूर्णसंयुक्तं लौहचूर्णं विनिक्षिपेत् । ईषत्पक्के नारिकेले भृङ्गराजरसान्विते ॥ ८० ॥ मासमेकं तु निक्षिप्य सम्यग्गर्त्तात्समुद्धरेत् । ततः शिरो मुण्डयित्वा लेपं दत्त्वा भिषग्वरः ॥ ८१ ॥ संवेष्ट्य कदलीपत्रैर्मोचयेत्सप्तमे दिने । क्षालयेत्त्रिफलाक्वाथैः क्षीरमांसरसाशनः ॥ कपालरञ्जनं चैतत्कृष्णीकरणमुत्तमम् ॥ ८२ ॥

हरड, बहेडा, आमला और लोहचूर्ण इनको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर भांगरेके रसमें डालकर कुछ थोडे पकेहुए नारियलमें भरदेवे फिर उसको एक महीनेतक रक्खा रहनेदेवे । पश्चात् शिरको मुँडवाकर उक्त औषधिका लेप करके केलेके कोमल पत्ते बाँधदेवे । फिर उनको सातवें दिन खोलकर त्रिफलेके क्वाथसें शिरको धोवे । इस औषधिका व्यवहार करते समय सात दिनतक दूध और मांस-रसका भोजन करे । यह प्रयोग शिरके सफेद बालोंको काला करनेके लिये सर्वोत्तम है ॥ ८०-८२ ॥

उत्पलं पयसा सार्द्धं मासं भूमौ निधापयेत् । केशानां स्नेहनं कृष्णीकरणं च विधीयते ॥ ८३ ॥

नीले कमलको दूधके साथ पीसकर लोहेके वर्त्तनमें भरकर भूमिमें गाडदेवे । फिर एक महीने पीछे निकालकर उसको शिरपर मले तो इससे बाल काले और चिकने होजाते हैं ॥ ८३ ॥

भृङ्गपुष्पं जवापुष्पं मेषदुग्धप्रपेषितम् । तेनैवालोडितं लौहपात्रस्थं भूम्यधःकृतम् ॥ ८४ ॥ सप्ताहादुद्धृतं पश्चाद्भृङ्गराजरसेन तु । आलोड्याभ्यज्य च शिरो वेष्टयित्वा वसेन्निशाम् ॥ ८५ ॥ प्रातस्तु क्षालनं कार्यमेवं स्यान्मूर्द्धरञ्जनम् । एवं सिन्दूरबालाम्रशङ्खभृङ्गरसैः क्रिया ॥ ८६ ॥