भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1176
११४४भैषज्यरत्नावली ।[ क्षुद्ररोग-

कच्छू और अहिपूतनककी चिकित्सा ।

कासीसरोचनातुत्थहरितालरसाञ्जनैः ।
अम्लपिष्टैः प्रलेपोऽयं वृषणकच्छ्वहिपूतयोः ॥ १२ ॥
हीराक्सीस, गोरोचन, तूतिया, हरिताल और रसौंत इनको समानभाग लेकर काँजीमें पीसकर लेप करे। यह लेप वृषण कच्छू और अहिपूतनक रोगको नष्ट करता है ॥ १२ ॥

पटोलपत्रत्रिफलारसाञ्जनविपाचितम् ॥ १३ ॥
पटोलपात, हरड, बहेडा, आमला और रसौंत इनके द्वारा घृतको यथाविधि सिद्धकर पान करनेसे अहिपूतन रोग दूर होता है ॥ १३ ॥

शूकरदंष्ट्रकी चिकित्सा ।

रजनीमार्कवमूलं पिष्टं शीतेन वारिणा तुल्यम् ।
हन्ति विसर्पं लेपाद्वराहदशनाह्वयं घोरम् ॥ १४ ॥
हल्दी और भाँगरेकी जड इन दोनोंको बराबर भाग लेकर शीतल जलमें पीस-कर लेप करनेसे अत्यन्त घोर शूकरदंष्ट्र और विसर्परोग नष्ट होता है ॥ १४ ॥

नाडीबीजकल्कः पीतो गव्येन सर्पिषा प्रातः ।
शमयति शूकरदंष्ट्रं सदाहपाकज्वरं घोरम् ॥ १५ ॥
नारीशाकके बीजोंको पीसकर प्रातःकाल गौके घीमें मिलाकर सेवन करे। इससे दाह और पाकज्वरसहित भयङ्कर शूकरदंष्ट्ररोग शमन होता है ॥ १५ ॥

विसर्पोक्तप्रतीकारः कार्यः शूकरदंष्ट्रके ॥ १६ ॥
शूकरदंष्ट्ररोगमें विसर्परोगकी चिकित्साके अनुसार चिकित्सा करे ॥ १६ ॥

शय्यामूत्रकी चिकित्सा ।

कृतमूत्रार्द्रभूभागमृदमाकृष्य खोलके ।
संभर्ज्य मधुसर्पिर्भ्यां लेहयेन्मूत्रितं जनम् ॥
शय्यायां मूत्ररोधः स्यान्मूत्रितस्य न संशयः ॥ ११७ ॥
जो मनुष्य खाटपर मूते रहताहो उसको जहाँ उसने पेशाब किया हो उसी खाटके नीचेकी गीली मिट्टीको खुरचकर खोलमें भूनकर शहद और घीमें मिलाकर चटावे। इससे खाटपर मूतना निस्सन्देह बन्द होता है ॥ ११७ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां क्षुद्ररोग चिकित्सा ॥