भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११४३

मार्कवः काकमाची च मधुकं देवदारु च ।
पृथक् दशपलांशानि पिप्पल्यस्त्रिफलाञ्जनम् ॥ ५ ॥
प्रपौण्डरीकं मञ्जिष्ठा लोध्रं कृष्णागुरूत्पलम् ।
आम्रास्थि कर्दमः कृष्णो मृणाली रक्तचन्दनम् ॥ ६ ॥
नीली भल्लातकास्थीनि कासीसं मदयन्तिका ।
सोमराज्यसनं शस्त्रं कृष्णौ पिण्डीतचित्रकौ ॥७॥
पुष्पाण्यर्जुनकाश्मर्योराम्रजम्बुफलानि च ।
पृथक् पञ्चपलैर्भागैः सुपिष्टैराढकं पचेत् ॥ ८ ॥
वैभीतकस्य तैलस्य धात्रीरसचतुर्गुणम् ।
कुर्यादादित्यपाकं वा यावच्छुष्को भवेद्रसः ॥ ९ ॥
लौहपात्रे ततः पूतं संशुद्धमुपयोजयेत् ।
पाने नस्ये क्रियायां च शिरोऽभ्यङ्गे तथैव च ॥ ११० ॥
एतच्चक्षुष्यमायुष्यं शिरसः सर्वरोगनुत् ।
महानीलमिति ख्यातं पलितघ्नमनुत्तमम् ॥ ११ ॥

सूर्यावर्त्त (हुलहुल) की जड, नीलापियाबाँसा, वनतुलसी, कालीसनक फल, भाँँगरा, मकोय, मुलहठी, देवदारु ये प्रत्येक औषधि दसदस पल, पीपल, त्रिफला, रसौंत, पुण्डरिया, मंजीठ, लोध, कालीअगर, नीलोत्पल, आमकी गुठली, कमलिनीकी जडकी कीचड, कमलनाल, लालचन्दन, नील, भिलावेकी मींग, कसीस, मोतिया, बावची, विजयसार, लोहचूर्ण, कृष्णचूडा (पुष्पवृक्ष विशेष), मैनफलकी छाल, चीतेकी जड, अर्जुन और कुम्हेरके फूल आम और जामुनके फल इन सबको पृथक् पृथक् पांच २ पल लेकर खूब बारीक कूट पीसकर चूर्ण करलेवे । बहेडेका तेल १ आढक और आंमलोंका रस ४ आढक परिमाण सबोंको यथाविधि मिलाकर जबतक रस न सूखजाय तबतक सूर्य तापद्वारा पाक करे । फिर उत्तम प्रकार सिद्ध होजानेपर उस तेलको वस्त्रमें छानकर लोहेके पात्रमें भरकर रखदेवे । इस तेलको पान, नस्य और शिरोमर्दनद्वारा प्रयोग करे । यह तेल नेत्रोंको हितकारी, आयुवर्द्धक और शिरके सम्पूर्णरोगोंको नष्ट करनेवाला है । यह महानील-तेल पलितरोगको नष्ट करनेके लिये सर्वोत्तम है ॥ १०४-१११ ॥