भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११४२ भैषज्यरत्नावली । [ क्षुद्ररोग-
तैलको पकावे । पकते समय उसमें दूधमें पीसेहुए मंजीठ, पद्माख, लोध, चन्दन, गेरू, खिरेंटी, हल्दी, दारुहल्दी, नागकेशर, फूलप्रियंगु, मुलहठी, पुण्डरिया और अनन्तमूल इन औषधियोंके कल्कको डाल देवे । जब पाक अच्छे प्रकार सिद्ध होजाय तब उतारकर स्वच्छपात्रमें भरकर रख देवे । इस तेलको बालोंका गिरना, शिरोरोग, मन्यास्तम्भ, गलग्रह, शिर, कान और नेत्ररोगमें नस्य और अभ्यङ्गद्वारा प्रयोग करे । यह तेल बालोंको घुँघुरवाले, अत्यन्त स्निग्ध घने बनाता है तथा खालित्य और इन्द्रलुप्तरोगको शीघ्र नष्ट करता है ॥ ९४-९९ ॥
आदित्यपाकगुडूचीतैल ।
वटावरोहकेशिन्योश्चूर्णेनादित्यपाचितम् ।
गुडूचीस्वरसे तैलमभ्यङ्गात्केशरोपणम् ॥ १०० ॥
गिलोयके स्वरसमें बड़की दाढी और बालछड़का चूर्ण डालकर धूपमें रखकर उत्तमप्रकार तेलको पकावे । इस तेलकी मालिश करनेसे केश उत्पन्न होते हैं ॥
चन्दनाद्यतैल ।
चन्दनं मधुकं मूर्वा त्रिफला नीलमुत्पलम् ।
कान्ता वटावरोहश्च गुडूची बिसमेव च ॥ १०१ ॥
लौहचूर्णं तथा केशी शारिवे द्वे तथैव च ।
मार्कवस्वरसेनैव तैलं मृद्वग्निना पचेत् ॥ १०२ ॥
शिरस्युपचिताः केशा जायन्ते घनकुञ्चिताः ।
स्निग्धाश्च दृढमूलाश्च तथा भ्रमरसन्निभाः ॥
नस्येनाकालपलितं निहन्यात्तैलमुत्तमम् ॥ १०३ ॥
भाँगरेके रसमें रक्तचन्दन, मुलहठी, मूर्वा, त्रिफला, नीलकमल, फूलप्रियंगु, बड़की कोंपल, गिलोय, भसोंडा, लोहचूर्ण, भूतकेशी, उसवा और अनन्तमूल इनका समानभाग मिश्रित चूर्ण एवं तिलका तेल डालकर मन्दमन्द अग्निसे पकावे । इस तेलको शिरपर मलनेसे अत्यन्त घने और घुँघुरवाले बाल उत्पन्न होते हैं । एवं स्निग्ध दृढमूलवाले और भौंरेके समान काले होते हैं । इस तेलको सूंघनेसे असमय बालोंका पकना नष्ट होता है ॥ १०१-१०३ ॥
महानीलतैल ।
आदित्यवल्ल्या मूलानि कृष्णशैरीयकस्य च ।
सुरस्य चैव पत्राणि फलं कृष्णशणस्य च ॥ ४ ॥